असम की जेलों की दयनीय स्थिति और कैदियों के मानवाधिकारों से जुड़े गंभीर मामलों पर गुवाहाटी हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य के कारागारों में एचआईवी संक्रमण के फैलने, भारी भीड़भाड़, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव, कैदियों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं और सजा माफी के आवेदनों में हो रही भारी देरी को लेकर गहरी चिंता जताई है। इस मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर 2026 को तय की गई है।
गुवाहाटी सेंट्रल जेल में एचआईवी और भीड़भाड़ की स्थिति
मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत के सामने पेश की गई रिपोर्टों के अनुसार, गुवाहाटी सेंट्रल जेल में 38 कैदी, जिनमें पांच महिलाएं भी शामिल हैं, एचआईवी से संक्रमित पाए गए हैं। हालांकि अदालत ने माना कि संक्रमण के सटीक कारणों का तुरंत पता नहीं चल पाया है, लेकिन कुछ मामलों में संक्रमित सुइयों के साझा किए जाने का संदेह जताया गया है। प्रभावित कैदियों का इलाज गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में एंटीरेट्रोवाइरल थेरेपी के जरिए किया जा रहा है। इसके अलावा, कामरूप (मेट्रो) के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 2 अगस्त को किए गए निरीक्षण में पता चला कि 1,400 कैदियों की क्षमता वाली इस जेल में 1,672 कैदियों को रखा गया है, जिसमें 77 महिलाएं भी शामिल हैं। इसी निरीक्षण के दौरान 31 एचआईवी पॉजिटिव कैदी, एक तपेदिक यानी टीबी का मरीज और 19 कैदी मानसिक इलाज लेते हुए पाए गए थे।
राज्यभर की अन्य जेलों में बदहाली और आत्महत्या के मामले
असम स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी के सदस्य सचिव द्वारा प्रस्तुत निरीक्षण रिपोर्ट में राज्य की कई अन्य जेलों में भी गंभीर भीड़भाड़ का खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ छोटी कोठरियों में 42 से 45 कैदियों को केवल एक शौचालय के सहारे रहना पड़ रहा है। नलबाड़ी, धुबरी, हैलाकांडी और श्रीभूमि की जिला जेलों में यह स्थिति विशेष रूप से गंभीर पाई गई है। इसके अलावा, सिवासागर और धुबरी जेलों में बंद दूसरे राज्यों के कैदियों को अपने परिजनों से फोन पर बात करने की अनुमति न मिलने और वैकल्पिक संचार सुविधाएं न होने की बात भी सामने आई है। हाईकोर्ट ने जेलों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की नाकाफी व्यवस्था पर भी नाराजगी जताई है, क्योंकि मनोचिकित्सकों के दौरे नियमित नहीं होते हैं। इसके साथ ही, जेलों में आत्महत्या और अन्य असामान्य मौतों के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। नलबाड़ी जिला जेल में तीन दोषियों द्वारा आत्महत्या करने की बात सामने आई है, जबकि ऐसी ही घटनाएं उदलगुरी जेल से भी रिपोर्ट की गई हैं। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में असम की जेलों में 27 असामान्य मौतें और आत्महत्याएं दर्ज की गई हैं।
सजा माफी के आवेदनों में लंबी देरी और सरकारी जवाब
न्यायालय ने उम्रकैद की सजा काट रहे कैदियों की समयपूर्व रिहाई या माफी के आवेदनों पर फैसले में हो रही अत्यधिक देरी पर भी कड़ा रुख अपनाया है। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, कई कैदियों ने शिकायत की थी कि उनके माफी के आवेदन पिछले दो से तीन साल से रिमिशन बोर्ड के पास धूल फांक रहे हैं। 19 मार्च 2026 को हुई स्टेट लीगल रिव्यू बोर्ड की बैठक के दस्तावेजों से पता चला कि 2025 में भेजे गए 32 रिमिशन प्रस्तावों को लौटा दिया गया था, जबकि उम्रकैद के 58 मामलों में से केवल एक को मंजूरी मिली थी। इन सभी प्रशासनिक और स्वास्थ्य संबंधी खामियों को देखते हुए, खंडपीठ ने संबंधित विभागों को एक व्यापक हलफनामा सौंपने का आदेश दिया है, जिसमें अब तक उठाए गए कदमों और आगे की योजनाओं का ब्योरा हो। कारागार प्रशासन और स्वास्थ्य विभागों की ओर से पेश हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता पी.एन. गोस्वामी और बी. गोगोई को इस मामले में सरकार का पक्ष रखने को कहा गया है।
राज्य में एचआईवी के व्यापक आंकड़े और ड्रग्स का कनेक्शन
हाईकोर्ट का यह कड़ा हस्तक्षेप ऐसे समय में सामने आया है जब पूरे असम में जेलों के भीतर एचआईवी संक्रमण के आंकड़े डरा रहे हैं। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच राज्य की 31 जेलों में बंद 226 कैदी एचआईवी पॉजिटिव पाए गए थे। हालांकि अधिकारियों का यह भी कहना है कि इनमें से करीब 95 प्रतिशत मामले नशीली दवाओं के इंजेक्शन के इस्तेमाल से जुड़े कारकों की वजह से सामने आए हैं, न कि यह साबित हुआ है कि संक्रमण जेल के अंदर ही फैला है। अदालत इन तमाम पहलुओं की गहराई से जाँच कर रही है ताकि कैदियों के जीवन और सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सके।
























