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असम की जेलों के हालात पर गुवाहाटी हाईकोर्ट सख्त, एचआईवी और आत्महत्या के मामलों पर माँगा जवाबअसम
17 सित॰ 2026, 12:22 pm (6 घंटे पहले)· 1

असम की जेलों के हालात पर गुवाहाटी हाईकोर्ट सख्त, एचआईवी और आत्महत्या के मामलों पर माँगा जवाब

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम की जेलों में कैदियों की भारी भीड़, एचआईवी संक्रमण के मामलों, मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और आत्महत्या की घटनाओं पर स्वतः संज्ञान लिया है। अदालत ने राज्य सरकार को इस संबंध में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।

असम की जेलों की दयनीय स्थिति और कैदियों के मानवाधिकारों से जुड़े गंभीर मामलों पर गुवाहाटी हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य के कारागारों में एचआईवी संक्रमण के फैलने, भारी भीड़भाड़, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव, कैदियों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं और सजा माफी के आवेदनों में हो रही भारी देरी को लेकर गहरी चिंता जताई है। इस मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर 2026 को तय की गई है।

गुवाहाटी सेंट्रल जेल में एचआईवी और भीड़भाड़ की स्थिति

मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत के सामने पेश की गई रिपोर्टों के अनुसार, गुवाहाटी सेंट्रल जेल में 38 कैदी, जिनमें पांच महिलाएं भी शामिल हैं, एचआईवी से संक्रमित पाए गए हैं। हालांकि अदालत ने माना कि संक्रमण के सटीक कारणों का तुरंत पता नहीं चल पाया है, लेकिन कुछ मामलों में संक्रमित सुइयों के साझा किए जाने का संदेह जताया गया है। प्रभावित कैदियों का इलाज गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में एंटीरेट्रोवाइरल थेरेपी के जरिए किया जा रहा है। इसके अलावा, कामरूप (मेट्रो) के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 2 अगस्त को किए गए निरीक्षण में पता चला कि 1,400 कैदियों की क्षमता वाली इस जेल में 1,672 कैदियों को रखा गया है, जिसमें 77 महिलाएं भी शामिल हैं। इसी निरीक्षण के दौरान 31 एचआईवी पॉजिटिव कैदी, एक तपेदिक यानी टीबी का मरीज और 19 कैदी मानसिक इलाज लेते हुए पाए गए थे।

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राज्यभर की अन्य जेलों में बदहाली और आत्महत्या के मामले

असम स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी के सदस्य सचिव द्वारा प्रस्तुत निरीक्षण रिपोर्ट में राज्य की कई अन्य जेलों में भी गंभीर भीड़भाड़ का खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ छोटी कोठरियों में 42 से 45 कैदियों को केवल एक शौचालय के सहारे रहना पड़ रहा है। नलबाड़ी, धुबरी, हैलाकांडी और श्रीभूमि की जिला जेलों में यह स्थिति विशेष रूप से गंभीर पाई गई है। इसके अलावा, सिवासागर और धुबरी जेलों में बंद दूसरे राज्यों के कैदियों को अपने परिजनों से फोन पर बात करने की अनुमति न मिलने और वैकल्पिक संचार सुविधाएं न होने की बात भी सामने आई है। हाईकोर्ट ने जेलों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की नाकाफी व्यवस्था पर भी नाराजगी जताई है, क्योंकि मनोचिकित्सकों के दौरे नियमित नहीं होते हैं। इसके साथ ही, जेलों में आत्महत्या और अन्य असामान्य मौतों के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। नलबाड़ी जिला जेल में तीन दोषियों द्वारा आत्महत्या करने की बात सामने आई है, जबकि ऐसी ही घटनाएं उदलगुरी जेल से भी रिपोर्ट की गई हैं। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में असम की जेलों में 27 असामान्य मौतें और आत्महत्याएं दर्ज की गई हैं।

सजा माफी के आवेदनों में लंबी देरी और सरकारी जवाब

न्यायालय ने उम्रकैद की सजा काट रहे कैदियों की समयपूर्व रिहाई या माफी के आवेदनों पर फैसले में हो रही अत्यधिक देरी पर भी कड़ा रुख अपनाया है। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, कई कैदियों ने शिकायत की थी कि उनके माफी के आवेदन पिछले दो से तीन साल से रिमिशन बोर्ड के पास धूल फांक रहे हैं। 19 मार्च 2026 को हुई स्टेट लीगल रिव्यू बोर्ड की बैठक के दस्तावेजों से पता चला कि 2025 में भेजे गए 32 रिमिशन प्रस्तावों को लौटा दिया गया था, जबकि उम्रकैद के 58 मामलों में से केवल एक को मंजूरी मिली थी। इन सभी प्रशासनिक और स्वास्थ्य संबंधी खामियों को देखते हुए, खंडपीठ ने संबंधित विभागों को एक व्यापक हलफनामा सौंपने का आदेश दिया है, जिसमें अब तक उठाए गए कदमों और आगे की योजनाओं का ब्योरा हो। कारागार प्रशासन और स्वास्थ्य विभागों की ओर से पेश हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता पी.एन. गोस्वामी और बी. गोगोई को इस मामले में सरकार का पक्ष रखने को कहा गया है।

राज्य में एचआईवी के व्यापक आंकड़े और ड्रग्स का कनेक्शन

हाईकोर्ट का यह कड़ा हस्तक्षेप ऐसे समय में सामने आया है जब पूरे असम में जेलों के भीतर एचआईवी संक्रमण के आंकड़े डरा रहे हैं। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच राज्य की 31 जेलों में बंद 226 कैदी एचआईवी पॉजिटिव पाए गए थे। हालांकि अधिकारियों का यह भी कहना है कि इनमें से करीब 95 प्रतिशत मामले नशीली दवाओं के इंजेक्शन के इस्तेमाल से जुड़े कारकों की वजह से सामने आए हैं, न कि यह साबित हुआ है कि संक्रमण जेल के अंदर ही फैला है। अदालत इन तमाम पहलुओं की गहराई से जाँच कर रही है ताकि कैदियों के जीवन और सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सके।

सवाल-जवाब

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने किस मामले पर स्वतः संज्ञान लिया है?
असम की जेलों में एचआईवी संक्रमण, भारी भीड़भाड़, आत्महत्याओं और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी पर हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया है।
गुवाहाटी सेंट्रल जेल में कितने कैदी एचआईवी पॉजिटिव पाए गए हैं?
अदालत में पेश रिपोर्ट के मुताबिक गुवाहाटी सेंट्रल जेल में 38 कैदी, जिनमें पाँच महिलाएं शामिल हैं, एचआईवी से संक्रमित पाए गए हैं।
इस मामले की अगली सुनवाई कब होगी?
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 8 अक्टूबर 2026 की तारीख तय की है।
किन जिला जेलों में सबसे अधिक भीड़भाड़ पाई गई है?
निरीक्षण रिपोर्ट के अनुसार नलबाड़ी, धुबरी, हैलाकांडी और श्रीभूमि की जिला जेलों में भीड़भाड़ की स्थिति सबसे गंभीर पाई गई है।
असम की जेलों में एचआईवी के कुल कितने मामले सामने आए थे?
अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच राज्य की 31 जेलों में कुल 226 कैदी एचआईवी पॉजिटिव पाए गए थे।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Sandeep Yadav@sandeep-yadav·4 घंटे पहले

यह रिपोर्ट कारागार प्रशासन की बुनियादी व्यवस्थाओं और मानवाधिकारों की उपेक्षा को स्पष्ट रूप से उजागर करती है। जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों का होना और एचआईवी जैसी गंभीर बीमारियों का प्रसार एक बड़े प्रशासनिक संकट की ओर इशारा करता है। उच्च न्यायालय का स्वतः संज्ञान लेना इस बात का संकेत है कि जब तक न्यायिक निगरानी सख्त नहीं होगी, तब तक जेल सुधार केवल कागज़ों तक सीमित रहेंगे। सरकार द्वारा समय पर कदम न उठाना स्थिति को और अधिक चिंताजनक बना सकता है।

Divya Reddy@divya-reddy·4 घंटे पहले

संदीप की बात से आगे बढ़ते हुए, कारागारों में सुधार के लिए केवल ढांचागत बदलाव पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य जागरूकता और कौशल विकास के दीर्घकालिक कार्यक्रमों की सख्त जरूरत है। एचआईवी और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं कैदियों में बुनियादी जागरूकता और सुधारात्मक गतिविधियों के अभाव को दर्शाती हैं। अगर जेल प्रशासन शैक्षणिक सत्रों, व्यावसायिक प्रशिक्षण और नियमित काउंसलिंग को अनिवार्य बनाए, तो कैदियों का मानसिक स्वास्थ्य सुधरेगा और आत्महत्या जैसी दुखद घटनाओं पर रोक लग सकेगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·5 घंटे पहले

गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा असम की जेलों के हालातों पर लिया गया स्वतः संज्ञान हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली के भीतर प्रशासनिक लापरवाही और मानवाधिकार संकट को उजागर करता है। जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों का होना, एचआईवी संक्रमण और आत्महत्या की घटनाएँ दर्शाती हैं कि सुधारात्मक और स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। यदि राज्य सरकार अदालत के निर्देशों के बाद भी मेडिकल स्क्रीनिंग, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और समयपूर्व रिहाई के आवेदनों में ठोस सुधार नहीं लाती, तो यह विचाराधीन और सजायाफ्ता कैदियों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बना रहेगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 घंटे पहले

करण की बात को आगे बढ़ाते हुए, यह मामला केवल जेल प्रशासन की विफलता नहीं है, बल्कि राज्य नीति और कार्यकारी जवाबदेही का एक बड़ा संकट दिखाता है। जब कारागारों में स्वास्थ्य और मूलभूत संचार जैसी बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं होतीं, तो यह लोक नीति के क्रियान्वयन में गहरी सुस्ती को दर्शाता है। राज्य सरकार को इसे केवल कानून-व्यवस्था का विषय न मानकर, जेल सुधार और बजट आवंटन की प्राथमिकताओं को तुरंत दुरुस्त करना होगा। नीतिगत स्तर पर समयबद्ध सुधार के बिना अदालत के निर्देशों का असर भी सीमित रह जाएगा।

Ravikash Gupta@ravikash·5 घंटे पहले

कारागार केवल कैदियों को निरुद्ध करने के स्थान नहीं बल्कि सुधार गृह होने चाहिए। असम की जेलों में अत्यधिक भीड़, एचआईवी का प्रसार और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव एक गंभीर संस्थागत विफलता को दर्शाता है। जब बुनियादी स्वास्थ्य देखभाल और कानूनी राहत की प्रक्रियाओं में लंबा विलंब होता है, तो यह मानवाधिकार संकट के साथ-साथ राज्य के प्रशासनिक ढाँचे और बजटीय प्राथमिकताओं पर बड़े सवाल खड़े करता है। इस संकट को दूर करने के लिए कारागार प्रबंधन के तत्काल आधुनिकीकरण, नियमित स्वास्थ्य ऑडिट और विचाराधीन कैदियों के मामलों की त्वरित समीक्षा अत्यंत आवश्यक है।

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