जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने और राज्य में ऊर्जा की बढ़ती जरूरतों को संतुलित करने की दिशा में असम सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। राज्य में कूलिंग की बढ़ती जरूरतों को पर्यावरण के अनुकूल और ऊर्जा-कुशल तरीकों से पूरा करने के लिए 'असम स्टेट कूलिंग एक्शन प्लान' (ACAP) को औपचारिक रूप से लॉन्च किया गया है। असम के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री जयंत मल्लाबरुआ ने गुवाहाटी के खानापारा स्थित असम प्रशासनिक स्टाफ कॉलेज में आयोजित राज्य स्तरीय विश्व ओजोन दिवस 2026 कार्यक्रम के दौरान इस विशेष योजना की शुरुआत की। इस साल के कार्यक्रम का मुख्य विषय "ग्लोबल एक्शन फॉर अ कूलर प्लैनेट" रखा गया था, जो वैश्विक स्तर पर बढ़ते तापमान को नियंत्रित करने की आवश्यकता पर बल देता है।
चार प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित एक अनूठी पहल
असम देश के उन शुरुआती राज्यों में शामिल हो गया है जिसने राज्य स्तर पर एक एकीकृत कूलिंग एक्शन प्लान तैयार किया है। यह नई रणनीति मुख्य रूप से चार सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को ध्यान में रखकर बनाई गई है, जिनमें भवन निर्माण (बिल्डिंग्स), कोल्ड चेन, उद्योग और परिवहन क्षेत्र शामिल हैं। यह योजना राष्ट्रीय स्तर के 'इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान' के उद्देश्यों को असम की स्थानीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने का काम करती है। इसे तकनीकी स्तर पर वैश्विक शोध संस्थान WRI इंडिया के सहयोग से असम क्लाइमेट चेंज मैनेजमेंट सोसाइटी (ACCMS) द्वारा तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य सरकारी विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना, ऊर्जा दक्षता में सुधार करना और पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाने वाली तकनीकों के उपयोग को बढ़ावा देना है।
2040 तक दोगुनी से अधिक हो जाएगी बिजली की मांग
इस कूलिंग एक्शन प्लान में जारी किए गए आंकड़े बताते हैं कि आने वाले समय में असम को बिजली की भारी मांग का सामना करना पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, कूलिंग यानी घरों और उद्योगों को ठंडा रखने वाले उपकरणों के कारण होने वाली बिजली की मांग वर्ष 2040 तक दोगुनी से भी अधिक होने का अनुमान है। यह मांग वर्तमान के 3,576 GWh से बढ़कर 8,445 GWh तक पहुंच सकती है। इस भारी मांग को नियंत्रित करने और बिजली ग्रिड पर दबाव कम करने के लिए ही इस योजना के तहत रेफ्रिजरेंट्स का जिम्मेदारी से प्रबंधन करने और कम बिजली खपत वाले उपकरणों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है।
पर्यावरण संरक्षण और तकनीकी विकास का तालमेल
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वन मंत्री जयंत मल्लाबरुआ ने कहा कि असम की विकास यात्रा को पर्यावरण की सुरक्षा के साथ जोड़कर देखना बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि यह कूलिंग एक्शन प्लान भविष्य की चुनौतियों के लिए राज्य को तैयार करने वाला एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सभी सरकारी विभाग मिलकर जमीनी स्तर पर इसे कितनी प्रभावी ढंग से लागू करते हैं।
मंत्री ने आधुनिक तकनीकी समाधानों के साथ-साथ प्राकृतिक तरीकों से तापमान को नियंत्रित करने पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि केवल तकनीक के भरोसे रहने के बजाय हमें राज्य के हरित क्षेत्र को बढ़ाना होगा और प्राकृतिक जल स्रोतों व जंगलों की रक्षा करनी होगी। बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण ही आने वाली पीढ़ियों के लिए इस धरती को रहने योग्य बना सकते हैं।
जनभागीदारी और जन आंदोलन पर विशेष ध्यान
इस दिशा में राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे अभियानों का जिक्र करते हुए जयंत मल्लाबरुआ ने 'अमृत वृक्ष आंदोलन' और 'वृक्ष बंधु' जैसी बड़ी योजनाओं की चर्चा की। इन पहलों के तहत छात्रों, स्वयं सहायता समूहों, वन सुरक्षा बल और विभिन्न सामाजिक संगठनों के सहयोग से बड़े पैमाने पर पेड़ लगाए जा रहे हैं। वन मंत्री ने कहा कि जब देश के युवा और आम नागरिक खुद पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने की जिम्मेदारी लेते हैं, तो उन पेड़ों के जीवित रहने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। उन्होंने राज्य के लोगों से अपील की कि वे अपने घरों और कार्यस्थलों पर भी पर्यावरण के अनुकूल आदतों को अपनाएं और बिजली बचाने वाले उपकरणों का इस्तेमाल करें।
अंतरराष्ट्रीय संधियों के क्रियान्वयन और प्रमुख हस्तियों की उपस्थिति
इस कार्यक्रम के दौरान ओजोन परत के संरक्षण से जुड़े वैश्विक समझौतों जैसे मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की सफलता और किगाली संशोधन के 10 वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक सफर को भी रेखांकित किया गया। इस महत्वपूर्ण अवसर पर असम सरकार के कई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और पर्यावरण विशेषज्ञ मौजूद रहे। इनमें विशेष मुख्य सचिव महेंद्र कुमार यादव, वन बल के प्रमुख और प्रधान मुख्य वन संरक्षक संदीप कुमार, पर्यावरण एवं वन विभाग के आयुक्त और सचिव डॉ ओम प्रकाश, पीसीसीएफ (वन्यजीव) और मुख्य वन्यजीव वार्डन डॉ विनय गुप्ता, ACCMS के सीईओ डॉ सत्येंद्र सिंह और WRI इंडिया के ऊर्जा कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक भरत जयराज प्रमुख रूप से शामिल थे। इसके अलावा विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधकर्ता, छात्र, उद्योग जगत के प्रतिनिधि और पर्यावरण कार्यकर्ता भी कार्यक्रम का हिस्सा बने।



















