सिलचर में पहली बार होने वाले नगर निगम चुनाव से कुछ हफ्ते पहले रविवार को असम के कछार जिले में तृणमूल कांग्रेस को बड़ा झटका लगा। पार्टी के जिला अध्यक्ष सहित कुल 50 नेता और कार्यकर्ता भाजपा में शामिल हो गए।
50 नेताओं ने छोड़ा तृणमूल का साथ
भाजपा में शामिल होने वालों में कछार जिला तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष राजेश देब और वरिष्ठ नेता मोहन लाल दास प्रमुख हैं। इनके साथ पार्टी के 48 अन्य नेता और कार्यकर्ता भी भाजपा में चले गए, जिससे कुल संख्या 50 पहुंच गई। इस सामूहिक पलायन से कछार में तृणमूल कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा एक झटके में कमजोर पड़ गया, ठीक उसी वक्त जब जिला एक अहम नगर निकाय चुनाव की तैयारी में जुटा है।
भाजपा कार्यालय में हुआ औपचारिक स्वागत
असम भाजपा अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने कछार जिला कार्यालय में इन सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं का औपचारिक रूप से पार्टी में स्वागत किया। इस मौके पर राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव भी मौजूद रहीं।
सैकिया ने इस शामिल होने को भाजपा के संगठनात्मक परिवार के विस्तार के रूप में बताया और कहा कि नए सदस्यों की एंट्री से क्षेत्र में पार्टी का नेटवर्क और मजबूत होगा। उन्होंने कहा कि पार्टी कार्यकर्ता अब मिलकर बराक घाटी क्षेत्र, असम और देश के विकास के लिए काम करेंगे।
सुष्मिता देव के भाजपा प्रवेश से बनी जमीन
सैकिया ने सुष्मिता देव के पश्चिम बंगाल से राज्यसभा पहुंचने का जिक्र करते हुए कहा कि संसद में बंगाल का प्रतिनिधित्व करने के बावजूद उनकी राजनीतिक सक्रियता असम और बराक घाटी के विकास से जुड़ी रहेगी। सुष्मिता देव खुद जून में तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुई थीं, और उस वक्त इसे बराक घाटी की राजनीति में एक बड़ा बदलाव माना गया था। रविवार को हुआ यह सामूहिक पलायन उसी कड़ी का अगला हिस्सा नजर आता है, जो बताता है कि सुष्मिता देव के जाने के बाद भी तृणमूल कांग्रेस की मुश्किलें कम नहीं हुईं।
3 अक्टूबर से पहले भाजपा को मिली मजबूती, तृणमूल को झटका
इस घटनाक्रम का समय बेहद अहम है। सिलचर में 3 अक्टूबर को पहली बार नगर निगम चुनाव होने जा रहा है, और ऐसे में 50 नेताओं और कार्यकर्ताओं के भाजपा में शामिल होने से पार्टी को शहर में अपनी जमीनी पकड़ मजबूत करने में बड़ी मदद मिलने की उम्मीद है।
वहीं तृणमूल कांग्रेस के लिए जिला अध्यक्ष और दर्जनों वरिष्ठ नेताओं का साथ छोड़ना एक नई संगठनात्मक चुनौती बनकर सामने आया है। पार्टी को अब कम समय में अपने स्थानीय नेतृत्व ढांचे को फिर से खड़ा करना होगा, और नजदीक आ रहा नगर निकाय चुनाव इस काम को और मुश्किल बना सकता है। जाहिर है, इससे सिलचर में पार्टी की राजनीतिक और चुनावी मौजूदगी बनाए रखने की कोशिशों पर असर पड़ सकता है।



















