राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में जहरीली हवा पर लगाम कसने के मकसद से तैयार की गई एक व्यापक कार्ययोजना के तहत पारंपारिक ईंधन वाली गाड़ियों को चरणबद्ध तरीके से हटाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) को सौंपी गई विशेषज्ञ समिति की अंतरिम रिपोर्ट में साफ किया गया है कि केवल पुराने प्रदूषण मानकों वाले वाहनों पर पाबंदी लगाना पर्याप्त नहीं है। इस नई नीति के तहत सबसे आधुनिक तकनीक मानी जाने वाली बीएस-6 ईंधन वाली गाड़ियों को भी भविष्य में सड़कों से अलविदा कहना पड़ेगा। इस बदलाव के पूर्ण होने पर राजधानी और इसके आसपास के क्षेत्रों में केवल बैटरी से चलने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों के नए पंजीकरण की अनुमति रहेगी।
वाहनों को सड़कों से हटाने की चरणबद्ध समयसीमा
पैनल की रूपरेखा के मुताबिक, सड़कों पर मौजूद पेट्रोल और डीजल से चलने वाले दोपहिया वाहनों को 2035 तक पूरी तरह चलन से बाहर करने का लक्ष्य तय किया गया है। इसके बाद निजी कारों और चार पहिया वाहनों को हटाने के लिए 2040 तक का समय निर्धारित करने का सुझाव दिया गया है। इन तय वर्षों के बाद केवल इलेक्ट्रिक मॉडल ही पंजीकृत किए जा सकेंगे। आंकड़ों के विश्लेषण से सामने आया है कि वर्तमान में एनसीआर की सड़कों पर लगभग 2.21 करोड़ सक्रिय और फिटनेस छूट प्राप्त वाहन मौजूद हैं। इनमें आधुनिक बीएस-6 श्रेणी के वाहनों की तादाद लगभग 41 प्रतिशत बैठती है, जिनका कुल पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) उत्सर्जन में हिस्सा लगभग 7 प्रतिशत ही दर्ज किया गया है। हालांकि दीर्घकालिक लक्ष्य शत प्रतिशत शून्य उत्सर्जन हासिल करना है, इसलिए इन्हें भी एक तय मियाद के बाद हटाना आवश्यक माना गया है।
बीएस-4 और पुराने मॉडलों पर त्वरित कार्रवाई
पुरानी तकनीक वाले वाहनों से होने वाले भारी नुकसान को देखते हुए समिति ने बेहद सख्त कदम उठाने की वकालत की है। बीएस-1, बीएस-2 और बीएस-3 मानकों वाली सभी गाड़ियों को सड़कों से तुरंत प्रभाव से हटाने का परामर्श दिया गया है। इन श्रेणियों की हिस्सेदारी कुल गाड़ियों में 19 प्रतिशत है, मगर यह बेड़ा कुल उत्सर्जन का 30 प्रतिशत हिस्सा अकेले पैदा करता है। वहीं बीएस-4 वाहनों की बात करें तो ये कुल सक्रिय बेड़े का लगभग 30 प्रतिशत हैं, लेकिन इनके धुएं से होने वाला उत्सर्जन 74 प्रतिशत के उच्च स्तर तक पहुंच जाता है। इसी वजह से मौजूदा सर्दी के मौसम से ही बीएस-4 गाड़ियों पर अस्थायी रोक लगाने का विचार रखा गया है। इसके लिए 1 नवंबर से 31 जनवरी की अवधि में एक परीक्षण योजना चलाने की सलाह दी गई है, जिसे 2026 की सर्दियों से व्यापक पैमाने पर लागू किया जा सकता है। अंतिम लक्ष्य के तौर पर 2030 तक इन गाड़ियों को पूर्ण रूप से बाहर का रास्ता दिखाने का प्रस्ताव है।
इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने के लिए वित्तीय मदद और चार्जिंग के अधिकार
जीवाश्म ईंधन से इलेक्ट्रिक तकनीक की ओर लोगों को आकर्षित करने के उद्देश्य से विशेषज्ञ पैनल ने आकर्षक वित्तीय सब्सिडी देने की सिफारिश भी की है। इसके तहत इलेक्ट्रिक ऑटो रिक्शा की खरीद पर 50 हजार रुपये और दोपहिया वाहनों पर 30 हजार रुपये की सीधी वित्तीय सहायता देने का प्रावधान रखा गया है। वहीं निजी उपयोग की इलेक्ट्रिक कार या वाणिज्यिक इलेक्ट्रिक टैक्सी खरीदने वाले ग्राहकों को एक लाख रुपये तक की छूट मिल सकती है। यदि कोई ग्राहक अपनी पुरानी प्रदूषण फैलाने वाली गाड़ी को स्क्रैप कराने का विकल्प चुनता है, तो उसे 10 हजार रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक की अतिरिक्त राहत दी जाएगी। जो लोग अपने मौजूदा पेट्रोल या डीजल वाहन को रेट्रोफिटिंग के जरिए इलेक्ट्रिक में बदलना चाहते हैं, उनके लिए दोपहिया पर 20 हजार और तिपहिया पर 40 हजार रुपये तक की प्रोत्साहन राशि सुझाई गई है। इसके अतिरिक्त आवासीय सोसायटियों और दफ्तरों के परिसरों में बिना तय पार्किंग वाले स्थानों पर कम से कम 20 प्रतिशत पार्किंग क्षेत्र में साझा चार्जिंग की व्यवस्था अनिवार्य करने के लिए एक विशेष 'राइट टू चार्ज' कानून बनाने का मसौदा भी तैयार किया गया है।
प्रशासनिक मशीनरी और औद्योगिक गतिविधियों का कायाकल्प
सरकारी कामकाज में इस्तेमाल होने वाले वाहनों को पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए 1 अप्रैल 2027 की तारीख तय करने का प्रस्ताव है, जिसके बाद सरकारी दफ्तरों के लिए केवल शून्य उत्सर्जन वाली गाड़ियां ही खरीदी या पट्टे पर ली जा सकेंगी। स्थानीय नगर निकायों की समूची गाड़ियों को 2030 तक अनिवार्य रूप से इलेक्ट्रिक में तब्दील करने का रोडमैप रखा गया है। निर्माण कार्यों में प्रयुक्त होने वाले यंत्रों को 2028 तक और खदानों व भारी मिट्टी हटाने वाले बड़े उपकरणों को 2030 तक इलेक्ट्रिक शक्ति से चलाने की योजना है। इसके साथ ही वायु प्रदूषण के अन्य स्रोतों पर काबू पाने के लिए सड़कों की वैक्यूम सफाई, जल छिड़काव, खुले में कूड़ा जलाने पर सख्त पाबंदी, निर्माण क्षेत्रों की अनिवार्य घेराबंदी, औद्योगिक भट्टियों में इलेक्ट्रिक हीटिंग तकनीक और पराली से निपटने के लिए संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी) संयंत्रों को व्यापक बढ़ावा देने पर बल दिया गया है।
ऑटो रिक्शा और मालवाहक गाड़ियों के लिए अलग नियम
राजधानी दिल्ली में 1 जनवरी 2027 से नए ऑटो रिक्शा और 3.5 टन वजन तक के हल्के मालवाहक वाहनों का पंजीकरण केवल इलेक्ट्रिक श्रेणी में करने की सिफारिश की गई है। गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत, गाजियाबाद तथा गौतमबुद्ध नगर जैसे नजदीकी शहरों में यही नियम 1 जनवरी 2028 से और शेष एनसीआर में 1 जनवरी 2029 से प्रभावी होगा। मध्यम क्षमता यानी 3.5 से 7.5 टन वजन वाले हल्के मालवाहकों के लिए दिल्ली में 1 जनवरी 2028, घने वाहन घनत्व वाले पड़ोसी जिलों में 1 जुलाई 2028 और बाकी एनसीआर में 1 जनवरी 2029 से केवल इलेक्ट्रिक पंजीकरण की बाध्यता लागू की जाएगी। समिति ने स्पष्ट किया है कि सीएनजी तकनीक ने डीजल की तुलना में धुआं घटाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी, लेकिन दीर्घकालिक स्वच्छ हवा के लिए सीएनजी ऑटो पर निर्भरता जारी रखना सही नहीं है। बाजार में नए ऑटो की बिक्री में इलेक्ट्रिक मॉडल की हिस्सेदारी अभी मात्र 2.2 प्रतिशत के आसपास है, जबकि नए वाहनों से निकलने वाले कुल पीएम 2.5 कणों में इनका योगदान लगभग 19 प्रतिशत रहता है। दिल्ली में यह आंकड़ा 37 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। समिति के अध्ययन का निष्कर्ष है कि नए ऑटो को पूरी तरह इलेक्ट्रिक में बदलने से हर वर्ष तकरीबन 5.5 टन पीएम 2.5 उत्सर्जन कम किया जा सकेगा। इसके अतिरिक्त मालवाहक श्रेणी में डीजल वाहनों पर पहले कार्रवाई की मांग की गई है क्योंकि डीजल संचालित हल्के मालवाहक सीएनजी की तुलना में लगभग दोगुना प्रदूषण फैलाते हैं।


















