नई गाड़ी खरीदते वक्त शोरूम पर ही महंगा मोटर बीमा खरीदने की मजबूरी जल्द खत्म हो सकती है। भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण यानी इरडा ने वाहन बीमा से जुड़े मौजूदा तौर-तरीकों को पूरी तरह बदलने का मसौदा तैयार किया है। नियामक की योजना ग्राहकों को डीलरशिप के एकाधिकार से बाहर निकालने और 'बीमा सुगम' जैसे डिजिटल माध्यमों से सीधे पॉलिसी चुनने की आजादी देने की है। अनिवार्य थर्ड-पार्टी बीमा पर कमीशन की दरों को सीमित कर पॉलिसी की लागत घटाने और समूची प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की तैयारी चल रही है। वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2023 से लेकर वित्त वर्ष 2025 के बीच कुल मोटर इंश्योरेंस प्रीमियम संग्रह में 34 प्रतिशत का इजाफा हुआ, मगर इसी दौरान बीमा वितरण पर चुकाया जाने वाला कमीशन 259 प्रतिशत तक उछल गया।
कमीशन का गणित और डीलरों की कमाई
वित्त वर्ष 2025 के दौरान बीमा बाजार में औसत कमीशन करीब 24 प्रतिशत दर्ज किया गया, जिसकी दर अलग-अलग मामलों में 13 प्रतिशत से लेकर 50 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। वाहन निर्माता ब्रोकरों (ओईएम ब्रोकर्स) और मोटर इंश्योरेंस सर्विस प्रोवाइडर्स (एमआईएसपी) की कुल बाजार हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत रही। इन दोनों माध्यमों ने मिलकर करीब 29,000 करोड़ रुपये का सकल प्रीमियम जुटाया और करीब 7,050 करोड़ रुपये कमीशन के तौर पर हासिल किए। आंकड़ों के मुताबिक, नए वाहनों की बिक्री पर ओईएम को औसतन 27 प्रतिशत और एमआईएसपी को 38 प्रतिशत तक का भारी कमीशन मिला। इसके उलट पुरानी गाड़ियों के सौदों में एमआईएसपी का कमीशन केवल 12 प्रतिशत रहा। नियामक का मानना है कि नए वाहन का अनिवार्य थर्ड-पार्टी कवर बेचने में लगभग कोई मशक्कत नहीं लगती, इसलिए इसे बिना मेहनत वाला उत्पाद माना गया है, जबकि ओन-डैमेज और व्यापक (कॉम्प्रिहेंसिव) पॉलिसियों को कम मेहनत वाली श्रेणी में रखा गया है।
बीमा सुगम और क्यूआर कोड का सीधा विकल्प
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत नए और पुराने दोनों प्रकार के वाहनों के लिए मोटर इंश्योरेंस बीमा सुगम जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराया जाना जरूरी होगा। शोरूम या डीलरशिप परिसर में ग्राहकों के सामने यह विकल्प प्रमुखता से प्रदर्शित करना होगा। इसके लिए बाकायदा क्यूआर कोड लगाए जाएंगे, ताकि कोई भी ग्राहक अपने फोन से स्कैन करके घर बैठे या शोरूम में खड़े-खड़े अपनी पसंद की कंपनी से डिजिटल पॉलिसी ले सके। डीलर के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह गाड़ी खरीदने वाले को इस स्वतंत्र विकल्प की पूरी जानकारी दे। इस प्रकार के गैर-लाभकारी (नॉट-फॉर-प्रॉफिट) प्लेटफॉर्म की अधिकतम फीस प्रीमियम राशि के 5 प्रतिशत से ज्यादा नहीं रखी जा सकेगी, जिससे ग्राहकों की डीलर नेटवर्क पर निर्भरता काफी घट जाएगी।
डीलर नेटवर्क के नियमन में बदलाव
नए मसौदे में व्यवस्था की गई है कि जो वाहन डीलर इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन एंटिटी (आईडीई) के तय मानकों को पूरा करेंगे, उन्हें आईडीई के रूप में सीधे पंजीकरण कराना होगा। जो डीलर इन मानकों पर खरे नहीं उतरेंगे, उन्हें किसी पंजीकृत आईडीई के पॉइंट ऑफ सेल्स पर्सन (पीओएसपी) या फिर किसी एक चुनिंदा बीमा कंपनी के अधिकृत एसोसिएट के तौर पर जुड़ना पड़ेगा। नियामक ने यह भी स्पष्ट किया है कि पॉलिसीधारकों के हितों के खिलाफ जाने वाली किसी भी प्रोत्साहन योजना, जैसे टारगेट या परफॉर्मेंस-लिंक्ड इंसेंटिव, को आगे जारी रखने की अनुमति नहीं होगी। इससे ग्राहकों पर एक खास महंगी पॉलिसी थोपने का अनुचित दबाव खत्म होगा।
कैशलेस मरम्मत की सुविधा और डिजिटल ट्रैकिंग
अक्सर देखा गया है कि बाहर से बीमा कराने पर वाहन डीलरों की तरफ से सहयोग न मिलने की शिकायतें आती हैं। नए प्रस्ताव के तहत अगर ग्राहक डीलरशिप से बीमा नहीं भी खरीदता है, तब भी अधिकृत डीलर या सर्विस सेंटर उसे कैशलेस क्लेम और मरम्मत सेवा देने से इनकार नहीं कर सकेगा। सुरक्षा के लिहाज से ग्राहक का पंजीकृत मोबाइल नंबर पॉलिसी इश्यूएंस रिक्वेस्ट (पीआईआर) के साथ साझा किया जाएगा, जिसका मिलान सीधे सरकारी 'वाहन' (VAHAN) डेटाबेस से होगा। पुष्टि होते ही ग्राहक को तत्काल एक कन्फर्मेशन मैसेज भेजा जाएगा, जिससे बीमा रिकॉर्ड सुरक्षित और पूरी तरह ट्रैक करने योग्य बन जाएगा।
थर्ड-पार्टी बीमा की लागत कम होने की उम्मीद
सड़क पर वाहन उतारने के लिए अनिवार्य थर्ड-पार्टी कवर पर कमीशन पहले 4.3 प्रतिशत से बढ़कर 22 प्रतिशत के स्तर तक पहुंच गया था। नियामक का इरादा इस कमीशन को काफी नीचे लाने का है, जिसका सीधा फायदा वाहन मालिक को मिलेगा और नई गाड़ी की कुल ऑन-रोड लागत कम हो सकेगी। ध्यान रहे कि ये सभी प्रावधान अभी विमर्श और परामर्श के स्तर पर हैं, जिन्हें सभी पक्षों और हितधारकों की प्रतिक्रिया मिलने के बाद अंतिम रूप दिया जाएगा।



















