लोक आस्था के महापर्व छठ पर पारंपरिक गीतों की गूंज हर ओर सुनाई देती है। घाटों पर बजने वाले सुरों के बीच पद्म भूषण से सम्मानित प्रसिद्ध लोक गायिका शारदा सिन्हा का एक ऐसा भक्ति गीत आज भी करोड़ों दिलों को छू रहा है, जिसमें भक्त अपने आराध्य सूर्य देव से प्रेमपूर्वक शिकायत दर्ज कराता है। इंटरनेट के डिजिटल मंच यूट्यूब पर इस पारंपरिक लोक रचना को अब तक 4.3 करोड़, यानी 43 मिलियन से भी अधिक बार सुना और देखा जा चुका है। आधुनिक दौर के नए संगीत और फ्यूजन धुनों की भीड़ में भी यह गीत लोक संस्कृति की जीवंत जड़ों और शाश्वत आकर्षण का सशक्त प्रमाण बनकर उभरा है।
भक्त और भगवान भास्कर के बीच अनोखा संवाद
शारदा सिन्हा के लोकप्रिय एलबम 'छठ मईया' में शामिल यह मैथिली और भोजपुरी रचना 'सोना सट कुनिया हो दीनानाथ' बोल से आरंभ होती है। इस पूरे लोकगीत का ताना-बाना एक बेहद आत्मीय और भावपूर्ण संवाद पर आधारित है, जहां भक्त किसी दूरी या भय के बिना सीधे सूर्य नारायण से मुखातिब होता है।
गीत के शुरुआती हिस्से में अर्घ्य देने के लिए जल में खड़े श्रद्धालु भगवान भास्कर से पूछते हैं कि जब वे संसार के हर कोने में सामान्य दिनों पर भोर होते ही निकल आते हैं, तो फिर आज पूजा के विशेष दिन उनके उदय में इतना विलंब क्यों हो रहा है? भक्त की यह शिकायत किसी नाराजगी से नहीं, बल्कि प्रतीक्षा और अनन्य श्रद्धा के गहरे भाव से उपजी है।
देरी के पीछे सूर्य देव का करुणा भरा उत्तर
इस अनूठी रचना में केवल भक्त का सवाल ही दर्ज नहीं है, बल्कि सूर्य देव की ओर से दिया गया स्नेहिल स्पष्टीकरण भी बड़े मार्मिक ढंग से पिरोया गया है। भगवान भास्कर अपनी भक्त से कहते हैं कि संसार के कष्टों को दूर करने के कारण ही उन्हें घाट तक पहुंचने में समय लग गया।
सूर्य देवता के कथन के अनुसार, पथ पर आगे बढ़ते समय उन्हें एक दृष्टिहीन व्यक्ति मिला, जिसकी आंखों को वे रोशनी का उपहार दे रहे थे। इसके उपरांत संतान की चाह रखने वाली एक व्यथित स्त्री की प्रार्थना सुनकर उसे मातृत्व का सुख प्रदान किया। आगे चलकर एक गंभीर व्याधि से ग्रस्त व्यक्ति के पास रुककर उसके शरीर को निरोगी और कष्टमुक्त बनाया। इन सभी दीन-दुखियों के जीवन में खुशियां बांटने के पुण्य कार्य में उलझ जाने की वजह से ही आज का सूर्योदय कुछ देर से हुआ।
पारंपरिक लोक संगीत की अटूट लोकप्रियता
शारदा सिन्हा की खनकती और भावपूर्ण आवाज ने इस गीत के हर शब्द को अमर बना दिया है। छठ पर्व की स्मृतियों और गांव-घर की मिट्टी की महक को समेटे यह रचना श्रोताओं को अपनी सांस्कृतिक धरोहर से सीधे जोड़ती है।
वर्तमान समय में जब संगीत के रुझान बड़ी तेजी से बदल रहे हैं, तब भी चार करोड़ तीस लाख से ज्यादा बार सुना जाना यह साबित करता है कि पारंपरिक लोक गीतों की सादगी और आध्यात्मिक गहराई का स्थान कोई दूसरा नहीं ले सकता। आस्था और करुणा से भरा यह संवाद आज भी महापर्व के अवसर पर हर पीढ़ी को समान रूप से भावविभोर कर देता है।



















