रेशम, मंजूषा कला और विशिष्ट जर्दालू आम की विरासत समेटे भागलपुर की कृषि पहचान को अब एक नया मुकाम मिलने जा रहा है। जिले में जर्दालू आम की खेती और उत्पादन क्षमता को बड़े पैमाने पर विस्तार देने के लिए एक पूरे गांव को समर्पित मैंगो विलेज के रूप में तैयार करने की परियोजना पर काम शुरू हो चुका है। भागलपुर के लगभग हर हिस्से में इस महकदार फल की मौजूदगी पारंपरिक रूप से देखने को मिलती है, किंतु अब बिहार कृषि विश्वविद्यालय ने एक सुव्यवस्थित पहल के तहत इसे एक केंद्रीय उत्पादन केंद्र में बदलने का खाका तैयार किया है। इस विशेष योजना का मूल उद्देश्य आगंतुकों और व्यापारियों को एक ही स्थान पर सघन बागवानी दिखाना तथा फल के कुल उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हासिल करना है।
सबौर के सिंदूर ग्राम के सफल प्रयोग के बाद नई पहल
बिहार कृषि विश्वविद्यालय इससे पूर्व भी इस प्रारूप पर सफल कार्य कर चुका है। विश्वविद्यालय की ओर से सबौर क्षेत्र में पहले ही एक सिंदूर ग्राम विकसित किया गया था, जहां एक ही गांव की परिधि में 1,000 से अधिक सिंदूर के पौधे रोपे गए थे और उनकी वैज्ञानिक देखभाल की जा रही है। उसी तर्ज पर अब भागलपुर में जर्दालू आम का एक सघन क्लस्टर तैयार किया जा रहा है। बीएयू के जनसंपर्क अधिकारी डॉ राजेश कुमार के अनुसार विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ डी आर सिंह की मंशा ग्रामीण आबादी की आय बढ़ाने और गांवों के सतत विकास को गति देने की है। इसी सोच के तहत स्थानीय कृषि उत्पादों के रकबे और उत्पादन तंत्र का विस्तार किया जा रहा है।
सप्लाई और निर्यात की चुनौतियों का समाधान
बाजार में जर्दालू आम की मांग लगातार बढ़ रही है, किंतु मौजूदा उत्पादन क्षमता इस भारी मांग को पूरा करने के लिए अपर्याप्त साबित हो रही है। जब एक ही गांव पूरी तरह जर्दालू के बागानों से आच्छादित होगा, तो वहां से फल की तुड़ाई, छंटाई और दूसरे राज्यों या अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात की प्रक्रिया अत्यंत सुगम हो जाएगी। प्रस्तावित गांव में 500 से अधिक उन्नत जर्दालू पौधे लगाए जाने हैं, ताकि संबंधित गांव आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सके और फल उत्पादकों को सीधा वाणिज्यिक लाभ प्राप्त हो।
मैंगो मैन अशोक चौधरी के मार्गदर्शन में तैयार होंगे बाग
इस पूरे सघन पौधारोपण और संरक्षण अभियान का नेतृत्व आम विशेषज्ञ के रूप में विख्यात मैंगो मैन अशोक चौधरी करेंगे। उनकी बागवानी विशेषज्ञता और अनुभव को ध्यान में रखते हुए इस परियोजना की तकनीकी देखरेख का दायित्व उन्हें सौंपा गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि जर्दालू गांव का निर्माण पूर्ण होने पर स्थानीय ग्रामीणों और कामगारों को आजीविका की तलाश में भटकना नहीं पड़ेगा, बल्कि यह पूरा क्षेत्र रोजगार, फल व्यापार और ग्रामीण पर्यटन का एक सशक्त केंद्र बनकर उभरेगा।
























