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1948 में कलात के शासक ने भेजा था भारत में विलय का प्रस्ताव, नेहरू ने ठुकराया तो पाकिस्तान के हाथ लगा ग्वादरबिहार
2 घंटे पहले· 0

1948 में कलात के शासक ने भेजा था भारत में विलय का प्रस्ताव, नेहरू ने ठुकराया तो पाकिस्तान के हाथ लगा ग्वादर

1948 में बलूचिस्तान की रियासत कलात के शासक मीर अहमद यार खान ने भारत में विलय का गुप्त प्रस्ताव भेजा था, लेकिन नेहरू सरकार ने भौगोलिक और सामरिक कारणों से इसे ठुकरा दिया, जिसके बाद कलात पाकिस्तान का हिस्सा बन गया.

1947 का बंटवारा सिर्फ नक्शे पर खिंची एक लकीर भर नहीं था, वो लाखों परिवारों के उजड़ने, कत्लेआम में मारे गए बेगुनाहों और उन नेताओं की मजबूरियों की भी कहानी है जिन्हें एक साथ कई मोर्चों पर फैसले लेने थे. इसी दौर की एक कम चर्चित लेकिन बेहद अहम घटना बलूचिस्तान की सबसे बड़ी रियासत कलात से जुड़ी है. आजादी के महज कुछ महीने बाद 1948 में कलात के शासक मीर अहमद यार खान की तरफ से भारत सरकार के पास एक गुप्त प्रस्ताव पहुंचा था, जिसमें अपनी रियासत को भारत में मिलाने की इच्छा जताई गई थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने आखिरकार इस पेशकश को ठुकरा दिया, और यही फैसला आज भी इतिहासकारों के बीच बहस का विषय बना हुआ है.

कलात की अलग पहचान क्यों थी

बंटवारे के दौर में कलात की स्थिति बाकी देसी रियासतों जैसी नहीं थी. अंग्रेजी हुकूमत के वक्त कलात का ब्रिटिश क्राउन के साथ रिश्ता स्वायत्त यानी ऑटोनोमस किस्म का हुआ करता था, सीधी अधीनता वाला नहीं. इसका मतलब यह था कि कलात अपने आंतरिक मामलों में काफी हद तक खुद फैसले लेने के लिए स्वतंत्र था और उसे बाकी छोटी-बड़ी रियासतों जैसा सीधा दर्जा नहीं दिया गया था. कलात के खान का हमेशा से यही तर्क रहा कि उनकी रियासत नेपाल और अफगानिस्तान जैसी एक स्वतंत्र और संप्रभु इकाई है, न कि ब्रिटिश भारत की आम रियासतों में से एक. यह भी बताया जाता है कि 11 अगस्त 1947 को हुए एक अलग करार में कलात की इसी स्वतंत्र हैसियत को मान्यता भी दी गई थी. अपनी इसी स्वायत्तता को बचाए रखने की कोशिश में मीर अहमद यार खान ने नई दिल्ली से नाता जोड़ने का रास्ता चुना और कहा जाता है कि गुप्त दूतों के मार्फत भारत सरकार तक विलय की पेशकश पहुंचाई.

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भारत के सामने भूगोल और सुरक्षा की बड़ी चुनौती

भारत सरकार ने इस पेशकश को हल्के में नहीं लिया, बल्कि इसके सैन्य और कूटनीतिक पहलुओं को बारीकी से परखा. लेकिन सबसे बड़ी अड़चन भूगोल ही निकली, कलात की कोई सीधी जमीनी सरहद भारत से नहीं जुड़ती थी, दोनों के बीच पाकिस्तान का विशाल इलाका पड़ता था. जानकारों की मानें तो इतनी दूर बसे इलाके में प्रशासन चलाना, फौज भेजना और रसद पहुंचाना उस वक्त के भारत के लिए लगभग नामुमकिन जैसा काम था, क्योंकि किसी भी संकट में सेना और साजो-सामान को पाकिस्तान की जमीन को पार किए बगैर वहां तक पहुंचाना मुमकिन ही नहीं था. इस पर मुश्किल यह भी थी कि मार्च 1948 तक भारत खुद जम्मू-कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के साथ पहली जंग में उलझा हुआ था, और साथ ही हैदराबाद, जूनागढ़ जैसी रियासतों को देश में मिलाने का काम भी जोरों पर चल रहा था. इतने मोर्चों के बीच एक और दूर-दराज इलाके की जिम्मेदारी उठाना नई-नवेली सरकार के लिए बेहद भारी साबित होता. यह भी कहा जाता है कि नेहरू को इस बात की आशंका थी कि अगर भारत कलात की पेशकश स्वीकार करता है तो पाकिस्तान इसे सीधी उकसावे वाली कार्रवाई मान लेगा, जिससे दोनों मुल्कों के दरमियान एक लंबा और बहुमोर्चा टकराव छिड़ सकता था. साथ ही, उस दौर में भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पश्चिमी देशों के सहयोग की भी दरकार थी, इसलिए नई सरकार किसी बड़े कूटनीतिक बवाल में फंसने से बचना चाहती थी.

वीपी मेनन के खुलासे के बाद पाकिस्तान की तेज कार्रवाई

27 मार्च 1948 को उस दौर में राज्य मंत्रालय के सचिव रहे वीपी मेनन ने एक प्रेस वार्ता के दौरान यह बात सार्वजनिक कर दी कि कलात के खान ने भारत से विलय की मांग रखी थी, मगर भौगोलिक वजहों के चलते भारत ने इसे नामंजूर कर दिया. यही जानकारी बाद में ऑल इंडिया रेडियो से भी प्रसारित हुई. इस खुलासे का नतीजा फौरन सामने आया. अगले ही दिन, यानी 28 मार्च 1948 को पाकिस्तानी फौज कलात की तरफ कूच कर गई. भारी सैन्य दबाव के आगे मीर अहमद यार खान को झुकना पड़ा और उन्होंने पाकिस्तान के साथ विलय के दस्तावेजों पर दस्तखत कर दिए. इस तरह कलात औपचारिक तौर पर पाकिस्तान का हिस्सा बन गया, और भारत की तरफ से मिलने वाला मौका हमेशा के लिए हाथ से निकल गया.

अगर फैसला दूसरा होता तो क्या बदलता

इस पूरे प्रकरण को लेकर इतिहासकारों और जानकारों के बीच आज भी दो राय कायम हैं. एक धड़े का मानना है कि अगर भारत ने उस वक्त यह पेशकश मान ली होती तो देश को अरब सागर तक एक सीधी और बेहद अहम सामरिक पहुंच मिल जाती, साथ ही मध्य एशिया के करीब एक रणनीतिक ठिकाना भी हाथ लग जाता. गौर करने वाली बात यह है कि आज का ग्वादर बंदरगाह उस दौर में कलात रियासत के ही अधीन आता था, और यही ग्वादर आज चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी सीपीईसी की धुरी माना जाता है, जिसके जरिए चीन को अरब सागर तक सीधी पहुंच मिलती है. वहीं दूसरा धड़ा इस राय से सहमत नहीं है. उनकी दलील है कि उस वक्त भारत के पास न तो इतनी सैन्य ताकत थी और न ही भौगोलिक सहूलियत, जिसके बूते इतने दूर बसे इलाके की हिफाजत और प्रशासन को असरदार ढंग से संभाला जा सके. यही वजह है कि नेहरू के इस फैसले को उस दौर के हालात के हिसाब से एक व्यावहारिक और मजबूरी भरा कदम भी माना जाता है.

बलूचिस्तान से भारत का पुराना नाता

बलूचिस्तान का यह इलाका भारत के लिए महज सामरिक नजरिए से ही नहीं, बल्कि आस्था के लिहाज से भी अहमियत रखता है. यहां मौजूद श्री हिंगलाज माता मंदिर दुनियाभर के लाखों-करोड़ों हिन्दुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र माना जाता है. यह मंदिर इस बात की भी याद दिलाता है कि बंटवारे की सियासी लकीरों से परे इस इलाके का भारत के साथ सांस्कृतिक और धार्मिक नाता कितना पुराना और गहरा रहा है. सत्तर से ज्यादा साल बीत जाने के बाद भी कलात का यह किस्सा इस बात की मिसाल बना हुआ है कि आजादी के उस नाजुक दौर में लिए गए फैसले किस तरह आज तक के भू-राजनीतिक हालात को प्रभावित करते हैं.

सवाल-जवाब

कलात रियासत के शासक कौन थे जिन्होंने भारत में विलय का प्रस्ताव भेजा था?
कलात रियासत के शासक मीर अहमद यार खान ने भारत सरकार को गुप्त रूप से अपनी रियासत के विलय का प्रस्ताव भेजा था.
भारत ने कलात के विलय प्रस्ताव को क्यों ठुकराया?
कलात की भारत से कोई सीधी जमीनी सरहद नहीं जुड़ती थी, उस वक्त भारत जम्मू-कश्मीर युद्ध और हैदराबाद-जूनागढ़ के एकीकरण में उलझा था, इसलिए नेहरू सरकार ने भौगोलिक और सामरिक कारणों से इसे नामंजूर कर दिया.
वीपी मेनन ने कलात के विलय प्रस्ताव की जानकारी कब सार्वजनिक की?
वीपी मेनन ने 27 मार्च 1948 को एक प्रेस वार्ता में यह जानकारी सार्वजनिक की थी, जो बाद में ऑल इंडिया रेडियो से भी प्रसारित हुई.
कलात कब पाकिस्तान का हिस्सा बना?
28 मार्च 1948 को पाकिस्तानी सेना के भारी दबाव में कलात के खान ने विलय दस्तावेजों पर दस्तखत किए, जिसके बाद कलात पाकिस्तान का हिस्सा बन गया.
आज का ग्वादर बंदरगाह पहले किसके अधीन था?
आज का ग्वादर बंदरगाह उस वक्त बलूचिस्तान की कलात रियासत के ही अधीन आता था.
कलात रियासत ब्रिटिश शासन के दौरान बाकी रियासतों से अलग क्यों मानी जाती थी?
क्योंकि कलात का ब्रिटिश क्राउन के साथ रिश्ता स्वायत्त था और 11 अगस्त 1947 के एक अलग करार में उसकी स्वतंत्र हैसियत को मान्यता दी गई थी.
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