नवादा के वारिसलीगंज से निकले मेधावी आयुष भलोटिया ने री-नीट में देश में चौथा स्थान हासिल कर बिहार में भी टॉप कियाबलूचिस्तान में बीएलए के हमले ने पाकिस्तानी सेना के 45 जवानों को निगला, मस्तुंग में घात का पूरा सचसीलमपुर में तीसरी मंजिल से मिला महिला का शव, पति की तलाश में जुटी पुलिससत्ता परिवर्तन के बाद पहली बार पश्चिम बंगाल के तीन दिन के दौरे पर निकले अमित शाहरांची में झमाझम बारिश का अलर्ट, चतरा-गढ़वा में सूखे जैसे हालात बरकरारहरियाणा के जींद से आज दौड़ेगी देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन, न धुआं न राख, सिर्फ पानी छोड़ेगी17 जुलाई को उत्तराखंड में झमाझम बारिश का दौर, पहाड़ से मैदान तक आकाशीय बिजली का अलर्ट जारीकार्डिफ में 233 पर सिमटी टीम इंडिया, गिल ने निचले क्रम की बल्लेबाजी पर उठाए सवालमध्य प्रदेश में थमी बारिश जल्द लौटेगी, आज बालाघाट-डिंडौरी में तेज बरसात का खतरामानसून में पिल्लों की जान ले रहा है यह खतरनाक वायरस, समय रहते पहचानें ये लक्षण
बलूचिस्तान में बीएलए के हमले ने पाकिस्तानी सेना के 45 जवानों को निगला, मस्तुंग में घात का पूरा सचपाकिस्तान
2 घंटे पहले· 5

बलूचिस्तान में बीएलए के हमले ने पाकिस्तानी सेना के 45 जवानों को निगला, मस्तुंग में घात का पूरा सच

बलूचिस्तान के मस्तुंग जिले में बीएलए के फतह स्क्वाड ने खाडकोचा इलाके में घात लगाकर हमला किया, जिसमें 45 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिक मारे गए। इस हमले ने पाकिस्तानी सेना के हाईवे-निर्भर लॉजिस्टिक्स, कवच रहित गाड़ियों और खुफिया जानकारी की भारी कमी को उजागर कर दिया है।

बलूचिस्तान के मस्तुंग जिले में बलूच लिबरेशन आर्मी यानी बीएलए ने बहुत सोच-समझकर तैयार की गई एक बड़ी हमले की योजना को अंजाम दिया है, जिसमें पाकिस्तानी सुरक्षाबलों को भारी नुकसान झेलना पड़ा। खाडकोचा इलाके में घात लगाकर किए गए इस हमले में 45 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिक मारे गए हैं। बीएलए के खास दस्ते 'फतह स्क्वाड' ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। यह वारदात ऐसे समय हुई है जब पाकिस्तान की सुरक्षा-व्यवस्था पहले से ही पीओके से लेकर बलूचिस्तान तक कई मोर्चों पर बुरी तरह जूझ रही है, और प्रधानमंत्री शहबाज तथा सेना प्रमुख मुनीर की जोड़ी हालात को काबू में करने में नाकाम नजर आ रही है। पाकिस्तान में जगह-जगह सेना के जवान मारे जा रहे हैं, और मस्तुंग की यह घटना उसी सिलसिले की ताजा और सबसे बड़ी कड़ी है।

हमले में सैनिकों को ले जा रही बसों के पूरे काफिले को निशाना बनाया गया। इतना ही नहीं, काफिले की सुरक्षा में तैनात टीम और हालात संभालने के लिए बाद में मौके पर भेजी गई अतिरिक्त टुकड़ियां भी हमलावरों के निशाने पर रहीं। इलाके में अभी भी छिटपुट झड़पें जारी होने की खबरें आ रही हैं। इतने बड़े पैमाने पर और इतने संगठित तरीके से हुआ यह हमला साफ दिखाता है कि बलूच विद्रोह की मारक क्षमता लगातार बढ़ती जा रही है, और साथ ही यह पाकिस्तानी सेना के काम करने के तरीके में मौजूद गहरी रणनीतिक और ऑपरेशनल कमजोरियों को भी बेनकाब कर देता है।

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पहले से तय रास्ते, आसान निशाना बनती पाकिस्तानी फौज

बलूचिस्तान रकबे के हिसाब से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन आबादी के मामले में सबसे कम घनी आबादी वाला इलाका भी है। इसकी भौगोलिक बनावट पाकिस्तानी सेना के लिए साजो-सामान और सैनिकों की आवाजाही के लिहाज से बहुत बड़ी चुनौती बन जाती है। इतने विशाल और सूखे रेगिस्तानी इलाके में सैनिकों को एक जगह से दूसरी जगह भेजने के लिए सेना को गिनी-चुनी मुख्य सड़कों और हाईवे नेटवर्क पर ही निर्भर रहना पड़ता है, क्योंकि वैकल्पिक रास्ते या तो हैं ही नहीं या बेहद कम हैं।

इसी भौगोलिक मजबूरी की वजह से सैनिकों की आवाजाही का अंदाजा पहले से ही लगाया जा सकता है। बीएलए जैसे विद्रोही गुट इन अकेले और सुनसान रास्तों पर हफ्तों तक नजर रख सकते हैं, सैनिकों के आने-जाने के तौर-तरीके समझ सकते हैं, और फिर बहुत सोच-समझकर उन जगहों को चुन सकते हैं जहां हमला सबसे ज्यादा असरदार साबित हो। इन सुनसान सड़कों के आसपास मौजूद ऊंचे पहाड़ी इलाकों पर पहले से कब्जा जमाकर बीएलए के लड़ाके पहली गोली चलने से पहले ही लड़ाई की शर्तें अपने हिसाब से तय कर लेते हैं। मस्तुंग के खाडकोचा इलाके में भी कुछ ऐसा ही पैटर्न देखने को मिला, जहां काफिले को एक ऐसी जगह घेरा गया जहां से बचकर निकलना लगभग नामुमकिन था।

कवच रहित बसों में सफर, हमले में सबसे ज्यादा नुकसान

रास्तों का पहले से अंदाजा लग जाना ही अकेली समस्या नहीं है, पाकिस्तानी सेना के पास सही सुरक्षा उपकरणों की भी भारी कमी है। बीएलए के बयानों के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना अक्सर अपने जवानों को सक्रिय संघर्ष वाले इलाकों में खास तौर पर बारूदी सुरंगों और घात से बचाने के लिए बनी 'माइन-रेसिस्टेंट एम्बुश प्रोटेक्टेड' यानी MRAP गाड़ियों के बजाय आम, बिना मजबूत कवच वाली यात्री बसों में ढोती है।

आम यात्री बसों जैसी परिवहन व्यवस्था पर इस निर्भरता की वजह से पाकिस्तानी सेना के काफिले बहुत आसान निशाना बन जाते हैं। मजबूत कवच न होने की वजह से ऐसी बसें न तो बारूदी सुरंग यानी IED के धमाके से बच पाती हैं और न ही भारी गोलीबारी से जवानों को बचा पाती हैं। जब हमला होता है, तो सबसे ज्यादा जानी नुकसान शुरुआती कुछ ही सेकंड या मिनट में हो जाता है, और बस में सवार जवानों के बच निकलने की गुंजाइश बेहद कम रह जाती है। मस्तुंग में 45 से ज्यादा सैनिकों की मौत की एक बड़ी वजह यही मानी जा रही है।

खुफिया जानकारी का सूखा, अंधेरे में लड़ती सेना

इस पूरे इलाके में पाकिस्तानी सेना के सामने शायद सबसे बड़ी और सबसे मुश्किल चुनौती खुफिया जानकारी की भारी कमी है। बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना को स्थानीय लोगों से पर्याप्त खुफिया सहयोग नहीं मिल पाता। दशकों तक चले सेना के सख्त सैन्य ऑपरेशनों और राजनीतिक स्तर पर धोखे की भावना ने स्थानीय बलूच आबादी के मन में पाकिस्तानी सरकार के प्रति गहरा गुस्सा भर दिया है। इस अलगाव ने ऐसा माहौल तैयार कर दिया है जहां सेना को स्थानीय स्तर पर लगभग कोई भरोसेमंद जानकारी नहीं मिल पाती।

जहां सरकारी सुरक्षाबलों को स्थानीय मुखबिर जुटाने में ही संघर्ष करना पड़ता है, वहीं बीएलए जैसे विद्रोही गुटों को स्थानीय समुदायों से सीधे या परोक्ष रूप से खुफिया समर्थन आसानी से मिल जाता है। जानकारी के इस असंतुलित बहाव का नतीजा यह होता है कि उग्रवादियों को सैनिकों की आवाजाही, गश्त के समय और जवाबी कार्रवाई के तरीकों की लगभग पूरी जानकारी पहले से रहती है, जबकि पाकिस्तानी सेना को आने वाले खतरे की भनक तक नहीं लग पाती। मस्तुंग में हुए हमले में भी यही पैटर्न दोहराया गया, जहां काफिले के साथ-साथ बाद में भेजी गई मदद की टुकड़ियों को भी सटीक तरीके से निशाना बनाया गया।

गैस, तांबा और सोना, कीमती जमीन पर गरीब आबादी की नाराजगी

इस पूरे संघर्ष की एक बड़ी वजह बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधन भी बताए जाते हैं। यह इलाका प्राकृतिक गैस, तांबा और सोने जैसे कीमती खनिजों से भरपूर है। लेकिन स्थानीय लोगों का मानना है कि इन संसाधनों को पंजाबी बहुल संघीय सरकार व्यवस्थित तरीके से निकाल रही है और इससे होने वाला मुनाफा इलाके से बाहर भेज दिया जाता है। जहां एक तरफ सरकार यहां से अरबों रुपये की खनिज संपदा निकालती है, वहीं दूसरी तरफ इन बड़े प्रोजेक्ट्स के आसपास रहने वाले स्थानीय लोगों को साफ पीने का पानी, भरोसेमंद बिजली या बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं तक नसीब नहीं होतीं।

आर्थिक असमानता की यह खाई विद्रोह को और हवा देती है। स्थानीय लोगों की सालों पुरानी शिकायतें अब एक हिंसक और अनुभवी प्रतिरोध का रूप ले चुकी हैं, जिसका ताजा और सबसे बड़ा नमूना मस्तुंग के खाडकोचा में हुआ यह हमला है। हाईवे नेटवर्क की मजबूरी, कवच रहित परिवहन, खुफिया जानकारी की कमी और संसाधनों को लेकर गहरी नाराजगी, ये चारों वजहें मिलकर बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना के लिए हालात को दिन-ब-दिन मुश्किल बनाती जा रही हैं।

सवाल-जवाब

मस्तुंग में हमला कब और कहां हुआ?
यह हमला बलूचिस्तान के मस्तुंग जिले के खाडकोचा इलाके में हुआ, जहां बीएलए ने पाकिस्तानी सैनिकों को ले जा रहे काफिले पर घात लगाकर हमला किया।
हमले में कितने पाकिस्तानी सैनिक मारे गए?
इस हमले में 45 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिक मारे गए।
हमले की जिम्मेदारी किसने ली?
बीएलए के खास दस्ते 'फतह स्क्वाड' ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है।
हमले में किन-किन को निशाना बनाया गया?
सैनिकों को ले जा रही बसों के काफिले, उसकी सुरक्षा टीम और बाद में भेजी गई अतिरिक्त टुकड़ियों, तीनों को निशाना बनाया गया।
क्या इलाके में अब भी झड़पें जारी हैं?
हां, खबरों के मुताबिक इलाके में अभी भी छिटपुट झड़पें जारी हैं।
पाकिस्तानी सेना सैनिकों को किन गाड़ियों में ले जाती है और उसमें क्या दिक्कत है?
सेना अक्सर सैनिकों को मजबूत कवच वाली MRAP गाड़ियों के बजाय आम, बिना कवच वाली यात्री बसों में ले जाती है, जिससे वे बारूदी सुरंग या गोलीबारी से आसानी से निशाना बन जाते हैं।
बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना को खुफिया जानकारी क्यों नहीं मिलती?
दशकों के सख्त सैन्य ऑपरेशनों और राजनीतिक धोखे के चलते स्थानीय बलूच आबादी सरकार से गहरी नाराज है, जिससे सेना को स्थानीय मुखबिर मिलना मुश्किल हो गया है।
बलूचिस्तान में विद्रोह की बड़ी वजह क्या मानी जाती है?
बलूचिस्तान के गैस, तांबे और सोने जैसे संसाधनों के दोहन से मिलने वाले मुनाफे को इलाके से बाहर भेजे जाने और स्थानीय लोगों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखे जाने को इस विद्रोह की बड़ी वजह माना जाता है।
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