बिहार के अररिया जिले से कानून-व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करने वाली एक घटना सामने आई है, जहां पुलिस एक आरोपी को गिरफ्तार करके ले जा रही थी, लेकिन गांव की भीड़ ने उसे बीच रास्ते से जबरन छुड़ा लिया। यह मामला फारबिसगंज थाना क्षेत्र के रामपुर उत्तर गांव का है। आरोपी को छुड़ाने के दौरान भीड़ ने पुलिस टीम पर हमला भी कर दिया, जिसकी पुष्टि खुद पुलिस ने की है। इस झड़प में 3 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, हालांकि घायल जवानों के नाम अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।
आखिर हुआ क्या था
पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक, एक प्राथमिकी में नामजद अभियुक्त मो. मोईद को पकड़ने के लिए टीम रामपुर उत्तर गांव पहुंची थी। गिरफ्तारी के बाद जब पुलिस लौट रही थी, तभी बड़ी संख्या में जुटे लोगों ने टीम को चारों ओर से घेर लिया। आरोप है कि भीड़ ने जवानों के साथ धक्का-मुक्की की, हमला किया और हिरासत में लिए गए आरोपी को छीनकर अपने साथ ले गई। पुलिस और ग्रामीणों के बीच टकराव की पुष्टि भी हो चुकी है।
कब और कैसे सामने आई घटना
यह पूरा घटनाक्रम शुक्रवार की देर रात का बताया जा रहा है। घटना के समय का एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें घटनास्थल पर पुलिस के इर्द-गिर्द लोगों का हुजूम साफ नजर आ रहा है। इस मामले में 19 लोगों को नामजद करते हुए करीब 100 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। अब तक 2 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और बाकी आरोपियों की तलाश जारी है।
एसपी छुट्टी पर, SDPO ने दी सफाई
घटना के वक्त अररिया एसपी जितेंद्र कुमार अवकाश पर थे। ऐसे में पूरे मामले की पुष्टि फारबिसगंज SDPO राजकिशोर सिंह ने वीडियो बयान जारी कर की। लेकिन इसके बावजूद यह सवाल बड़ा बना हुआ है कि रामपुर उत्तर गांव में पुलिस असामाजिक तत्वों के आगे इतनी लाचार क्यों दिखी, और मौके पर तत्काल कोई सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हो सकी।
रणनीतिक चूक या इकबाल का संकट
इस घटना का सबसे अहम पहलू यही है कि एक गिरफ्तार आरोपी को पुलिस की मौजूदगी में ही छुड़ा लेने तक की नौबत आखिर आई कैसे। क्या मौके पर पर्याप्त पुलिस बल मौजूद नहीं था? क्या भीड़ के आकार और तेवर का सही अंदाजा नहीं लगाया गया? क्या पहले से अतिरिक्त सुरक्षा बल की व्यवस्था की जानी चाहिए थी? ये सवाल पुलिस की तैयारी और रणनीति, दोनों पर खड़े होते हैं।
सिर्फ एक गांव की बात नहीं
दरअसल रामपुर उत्तर का मामला महज एक गिरफ्तारी अभियान में अड़चन डालने तक सीमित नहीं है। यह ग्रामीण इलाकों में पुलिस कार्रवाई के दौरान पेश आने वाली व्यापक चुनौतियों को भी उजागर करता है। अगर भीड़ संगठित होकर पुलिस की कार्रवाई को नाकाम करने पर उतर आए, तो यह कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। बिहार में पुलिस लगातार हमलों का निशाना बन रही है, और ऐसी हर घटना पुलिस के इकबाल यानी उसके रौब और भरोसे पर सीधा सवाल खड़ा करती है।













