बिहार पुलिस में हाल ही में हुए बड़े तबादलों के बीच जिस एक नाम की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह है डीएसपी राजेश शर्मा का। भोजपुर जिले के बहुचर्चित भरत तिवारी कथित एनकाउंटर मामले में हत्या की एफआईआर दर्ज होने के कुछ ही समय बाद उन्हें नई जिम्मेदारी सौंप दी गई है और इसी फैसले ने पूरे मामले को फिर सुर्खियों में ला दिया है। मृतक भरत तिवारी के परिवार ने इस पोस्टिंग पर तीखे सवाल उठाए हैं। दिलचस्प बात यह है कि राजेश शर्मा का नाम करीब 19 साल पहले मुजफ्फरपुर के एक कथित फर्जी एनकाउंटर मामले में भी सामने आ चुका है। आखिर कौन हैं राजेश शर्मा, उनका पुलिस करियर अब तक कैसा रहा है और उनकी नई तैनाती अब क्यों विवादों में घिर गई है, इसे समझना जरूरी है।
डीएसपी राजेश शर्मा का अब तक का सफर
राजेश शर्मा बिहार पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों में गिने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत दारोगा यानी सब-इंस्पेक्टर के पद से की थी। इसके बाद उन्होंने कई वर्षों तक अलग-अलग जिलों में थाना प्रभारी और इंस्पेक्टर के तौर पर काम किया। लंबी सेवा के बाद उन्हें प्रमोशन मिला और वे डीएसपी यानी एसडीपीओ के पद तक पहुंचे। हाल के वर्षों में वे भोजपुर जिले के जगदीशपुर अनुमंडल में एसडीपीओ के तौर पर तैनात थे। लेकिन उनका पूरा करियर विवादों से अछूता नहीं रहा। पहले मुजफ्फरपुर का कथित फर्जी एनकाउंटर मामला और अब भरत तिवारी एनकाउंटर केस, दोनों ही उनकी कार्यशैली पर लगातार सवाल खड़े कर रहे हैं।
बिहार में डीएसपी बनने का रास्ता क्या है?
बिहार में डीएसपी बनने का सबसे सीधा और सबसे प्रमुख जरिया बिहार लोक सेवा आयोग यानी बीपीएससी की संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा है। इस परीक्षा में तीन चरण होते हैं, प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू। तीनों चरण पास करने वाले अभ्यर्थी को मेरिट और अपनी पसंद के आधार पर डीएसपी का पद मिलता है। इस परीक्षा में बैठने के लिए ग्रेजुएट होना अनिवार्य है और उम्र सीमा सरकारी नियमों के हिसाब से तय होती है। बीपीएससी से चयन होने के बाद चुने गए अधिकारियों को बिहार पुलिस अकादमी में विशेष प्रोफेशनल ट्रेनिंग दी जाती है। इस ट्रेनिंग में कानून की पढ़ाई, फील्ड पुलिसिंग, अपराध जांच, प्रशासनिक कामकाज और नेतृत्व क्षमता पर खास जोर दिया जाता है ताकि अधिकारी जमीनी स्तर पर अपनी जिम्मेदारी बखूबी संभाल सके।
प्रमोशन के जरिए भी बनते हैं डीएसपी
बिहार पुलिस में यह भी नियम है कि इंस्पेक्टर पद पर काम कर रहे अधिकारी विभागीय प्रमोशन के जरिए भी डीएसपी बन सकते हैं। इसके लिए इंस्पेक्टर को तय सेवा अवधि पूरी करनी होती है और उसका सर्विस रिकॉर्ड साफ-सुथरा होना जरूरी माना जाता है। इस तरह के प्रमोशन का फैसला विभागीय चयन समिति करती है और इस पर राज्य सरकार के गृह विभाग की मंजूरी ली जाती है, यह पूरी प्रक्रिया बिहार पुलिस के नियमों के तहत होती है। राजेश शर्मा भी इसी रास्ते से यानी इंस्पेक्टर पद से प्रमोट होकर डीएसपी बने थे।
तबादला सूची में नाम आते ही मचा बवाल
बिहार सरकार ने हाल ही में 12 आईपीएस और 53 डीएसपी अधिकारियों के तबादले किए थे। इसी सूची में राजेश शर्मा को मद्यनिषेध एवं राज्य स्वापक नियंत्रण ब्यूरो में डीएसपी की नई जिम्मेदारी सौंपी गई। यह फैसला सामने आते ही भरत तिवारी के परिवार ने कड़ी नाराजगी जताई। परिवार का कहना है कि जिस अधिकारी के खिलाफ हत्या समेत गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज हो चुकी है, जांच पूरी होने से पहले ही उसे नई जिम्मेदारी दे देना न्याय की भावना के खिलाफ है। परिवार का सीधा आरोप है कि भरत भूषण तिवारी की हत्या के बदले राजेश शर्मा को मानो इनाम के तौर पर यह नई पोस्टिंग मिली है।
भरत तिवारी एनकाउंटर मामला आखिर है क्या?
17 जून को भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव के रहने वाले भरत तिवारी की पुलिस एनकाउंटर में मौत हो गई थी। पुलिस का दावा है कि कार्रवाई के दौरान भरत के साथ मुठभेड़ हुई थी, लेकिन भरत के परिवार का आरोप इससे बिल्कुल अलग है। परिजनों का कहना है कि भरत उस वक्त फेसबुक पर लाइव कर रहा था और उसने पुलिस के सामने ही अपना हथियार जमीन पर फेंककर आत्मसमर्पण कर दिया था। परिवार का आरोप है कि इसके बावजूद पुलिसकर्मियों ने उसे धक्का देकर एक गड्ढे में गिरा दिया और फिर गोली मार दी। परिवार यह भी आरोप लगाता है कि उस वक्त के एसडीपीओ राजेश शर्मा ने ही मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों को गोली चलाने का आदेश दिया था। गंभीर रूप से घायल भरत को अस्पताल ले जाया गया, जहां बाद में उसकी मौत हो गई।
कई पुलिसकर्मियों पर दर्ज हुई हत्या की एफआईआर
भरत तिवारी की मां आशा देवी की शिकायत पर शाहपुर थाने में हत्या समेत कई गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया। इस एफआईआर में तत्कालीन एसडीपीओ राजेश शर्मा, तत्कालीन थाना प्रभारी राजेश मालाकार और एनकाउंटर में शामिल रहे बाकी पुलिसकर्मियों को आरोपी बनाया गया है। एफआईआर दर्ज होने के बाद राजेश शर्मा को उनके पद से हटाकर पुलिस मुख्यालय में योगदान देने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद ही उनकी नई पोस्टिंग मद्यनिषेध एवं राज्य स्वापक नियंत्रण ब्यूरो में कर दी गई।
परिवार बोला, न्याय की उम्मीद कमजोर पड़ रही है
भरत तिवारी के पिता काशीनाथ तिवारी का कहना है कि उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद लगातार कमजोर होती जा रही है। उनका मानना है कि हत्या जैसे गंभीर मामले में आरोपी अधिकारी को इतनी जल्दी नई जिम्मेदारी दे देना समाज में गलत संदेश देता है। परिवार का आरोप है कि सरकार और पुलिस विभाग इस मामले को उतनी गंभीरता से नहीं ले रहे, जितनी उम्मीद परिवार को थी। परिवार ने साफ कह दिया है कि जब तक दोषियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं होती, उनका आंदोलन जारी रहेगा और वे अपनी लड़ाई अदालत में भी लड़ेंगे। राजेश शर्मा की नई नियुक्ति को फिलहाल सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा बताया जा रहा है, लेकिन पुलिस विभाग या राज्य सरकार की ओर से अब तक सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि एफआईआर दर्ज होने के बावजूद उन्हें नई पोस्टिंग किन परिस्थितियों में दी गई। यही वजह है कि इस फैसले को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
19 साल पुराना मुजफ्फरपुर एनकाउंटर फिर सुर्खियों में
भरत तिवारी मामले के सामने आने के बाद साल 2007 का एक पुराना मामला भी फिर से चर्चा में आ गया है। उस समय राजेश शर्मा मुजफ्फरपुर में सदर थाने के प्रभारी हुआ करते थे। 4 नवंबर 2007 की रात पुलिस तीन युवकों को पूछताछ के लिए अपने साथ ले गई थी। अगले दिन मनीष महिवाल, मुकुल ठाकुर और सुबोध कुमार सिंह के शव एमआईटी कॉलेज के पास से बरामद हुए थे। उस समय भी पुलिस की ओर से इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अपनी सफाई पेश की गई थी, लेकिन यह मामला भी संदेह के घेरे से बाहर नहीं निकल पाया। अब भरत तिवारी एनकाउंटर मामले ने राजेश शर्मा के करियर के इस पुराने अध्याय को भी फिर एक बार लोगों की नजरों में ला दिया है।













