ईरान और इजरायल के बीच जारी भीषण संघर्ष के दौरान पश्चिम एशिया का समुद्री जलमार्ग अत्यंत खतरनाक बन चुका है। इसी युद्ध क्षेत्र के केंद्र में स्थित होर्मुज की खाड़ी से सुरक्षित भारत लौटे भारतीय तेल टैंकर के कैप्टन रमन कपूर ने समुद्र में बिताए 75 खौफनाक दिनों की आपबीती साझा की है। 1,100,000 मीट्रिक टन तेल कार्गो से भरे विशाल जहाज पर कैप्टन कपूर के साथ 23 अन्य चालक दल के सदस्य मौजूद थे। सिर के ऊपर से गुजरती मिसाइलों, पास में हुए भयंकर धमाकों और अनिश्चितता के बीच पूरा क्रू ढाई महीने तक लगातार मौत के साये में काम करता रहा। स्वदेश वापसी के बाद कैप्टन कपूर ने मर्चेंट नेवी के निहत्थे नाविकों की दयनीय स्थिति और उनकी सुरक्षा को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कड़े नियम बनाने की जोरदार मांग रखी है।
इराकी पोर्ट के स्थानीय पायलट से मिली युद्ध छिड़ने की पहली खबर
युद्ध शुरू होने का घटनाक्रम किसी औपचारिक कंपनी सर्कुलर या प्रशासनिक ईमेल से सामने नहीं आया था। जब जहाज तेल लोड करके रवाना होने की तैयारी में था, तभी एक इराकी पोर्ट के स्थानीय पायलट ने कैप्टन रमन कपूर को सूचना दी कि क्षेत्र में युद्ध छिड़ गया है। इसके तुरंत बाद पोर्ट अथॉरिटी की ओर से सख्त निर्देश जारी किए गए कि जहाज तुरंत अपना बर्थ खाली करे, आगे बढ़ने के बजाय सुरक्षित लंगर पर जाए और अगले आदेश तक वहीं ठहरा रहे। संकट की गंभीरता को देखते हुए कैप्टन कपूर ने बिना किसी देरी के सभी 23 क्रू मेंबर्स को जहाज के ब्रिज पर बुलाया और उन्हें वास्तविक स्थिति से अवगत कराया। उस समय जहाज पर सबसे कम उम्र का नाविक 21 वर्ष का युवा था, जबकि सबसे वरिष्ठ सदस्य 30 वर्षों का समुद्री अनुभव रखने वाला बोसन था।
मिसाइल हमलों के डर के बीच रोजाना सुरक्षा ब्रीफिंग और मॉक ड्रिल
युद्ध क्षेत्र में फंसा होने के बावजूद जहाज पर नियमित कामकाज बंद नहीं हुआ। चालक दल के मानसिक तनाव को कम करने और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए कड़ी दिनचर्या का पालन किया गया। हर सुबह 8 बजे सुरक्षा ब्रीफिंग आयोजित की जाती थी, जिसमें दिनभर के सुरक्षा उपायों की समीक्षा होती थी। इसके अलावा रोज दोपहर में मिसाइल हमले की स्थिति में बचाव और आपात स्थिति में जहाज छोड़ने की मॉक ड्रिल कराई जाती थी। जनरेटर, इमरजेंसी लाइट और अग्निशामक प्रणालियों की दैनिक जांच अनिवार्य कर दी गई थी ताकि हमला होने पर तुरंत प्रतिक्रिया दी जा सके।
1 मील से कम दूरी पर धमाका और सन्नाटे का खौफ
दहशत का सबसे भयावह क्षण तब आया जब चालक दल के सदस्य शाम को डिनर कर रहे थे। अचानक 1 मील से भी कम दूरी पर एक बड़ा मिसाइल विस्फोट हुआ, जिससे जहाज का पोर्ट साइड तेज रोशनी से जगमगा उठा और पूरा जहाज जोर-जोर से कांपने लगा। खाने की मेज पर रखे कॉफी कप नीचे गिर गए। उस भयानक घटना के बाद से चालक दल के लिए दो धमाकों के बीच छा जाने वाला सन्नाटा ही डर की सबसे बड़ी वजह बन गया था। लगातार मिसाइलों की आवाज और धमाकों के बीच काम करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता जा रहा था।
युद्ध क्षेत्र में शिप-टू-शिप कार्गो ट्रांसफर की चुनौती
तनाव उस समय चरम पर पहुंच गया जब जहाज प्रबंधन कंपनी ने युद्ध क्षेत्र के भीतर ही एक अन्य जहाज के साथ शिप-टू-शिप (STS) कार्गो ट्रांसफर करने का आदेश दे दिया। कुछ ही दिनों पहले इसी प्रकार के कार्गो ट्रांसफर के दौरान एक अन्य टैंकर पर हमला हुआ था, जिसके चलते क्रू मेंबर्स ने इस काम का भारी विरोध किया। हालांकि, नौसेना गश्ती दल की तैनाती, सुरक्षा नौकाओं के पहरे और विशेष वार जोन बोनस के आश्वासन के बाद यह कठिन कार्य 36 घंटे में पूरा किया गया। इस पूरे ऑपरेशन के दौरान हर 15 मिनट में चालक दल के सदस्य आसमान की तरफ देखकर मिसाइल खतरे की निगरानी करने को मजबूर थे। लंबे समय तक परिजनों से दूर रहने, घर न लौट पाने की अनिश्चितता और रिप्लेसमेंट मिलने में हो रही देरी के कारण नाविक इस्तीफा देने और बगावत करने की कगार पर पहुंच गए थे।
14 मई को मिली रिप्लेसमेंट और स्वदेश वापसी
आखिरकार 12 मई को कैप्टन रमन कपूर को सूचित किया गया कि उनका रिप्लेसमेंट आ रहा है। इसके बाद 14 मई को 75 दिनों के लंबे इंतजार के बाद कैप्टन कपूर जहाज से सुरक्षित साइन-ऑफ करने में सफल रहे। हालांकि, उनके साथी और दुनिया भर के हजारों अन्य नाविक आज भी उस खतरनाक युद्ध क्षेत्र में फंसे हुए हैं और लगातार अपनी जान जोखिम में डालकर काम कर रहे हैं।
अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन से कैप्टन रमन कपूर की मांग
भारत लौटने के बाद कैप्टन रमन कपूर ने दुनिया का ध्यान मर्चेंट नेवी के नाविकों की जमीनी हकीकत की तरफ आकर्षित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वैश्विक व्यापार का 90 प्रतिशत हिस्सा समुद्र के रास्ते निहत्थे नाविकों द्वारा ही पूरा किया जाता है, फिर भी दुनिया उन्हें केवल तभी याद करती है जब किसी नाविक का पार्थिव शरीर घर पहुंचता है। कैप्टन कपूर ने अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) तथा वैश्विक निकायों से मांग की है कि युद्ध ग्रस्त क्षेत्रों में फंसे जहाजों के लिए सुरक्षित गलियारा (Safe Corridor) बनाया जाए। इसके साथ ही नाविकों को यह कानूनी अधिकार दिया जाए कि वे बिना अपनी नौकरी गंवाए किसी भी वार जोन में जाने से मना कर सकें, क्योंकि नाविकों को खोखली सहानुभूति की नहीं बल्कि ठोस कानूनी और भौतिक सुरक्षा की आवश्यकता है।


















