हरियाणा के फरीदाबाद जिले में स्थित कई कृषि प्रधान गांवों के किसान इन दिनों एक गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। खेतों की सिंचाई के लिए मुख्य आधार मानी जाने वाली आगरा नहर का पानी इतना ज्यादा दूषित हो चुका है कि यह फसलों को सींचने के बजाय उन्हें बर्बाद कर रहा है। नहर में साफ पानी की आपूर्ति के बजाय औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला जहरीला रसायन और नालों का काला कचरा सीधे बहाया जा रहा है। सिंचाई के किसी अन्य विकल्प के अभाव में स्थानीय किसान इसी प्रदूषित पानी से अपने खेतों को सींचने के लिए मजबूर हैं, जिससे फसलें नष्ट हो रही हैं और भूमि की उर्वरता पर भी गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
औद्योगिक कचरे और गंदे नालों से विषैला हुआ पानी
दिल्ली से शुरू होकर फरीदाबाद के विभिन्न ग्रामीण इलाकों से गुजरने वाली आगरा नहर में प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा तक पहुंच गया है। बल्लभगढ़ के पास स्थित जवा गांव के रहने वाले किसान देवी सिंह लंबा का कहना है कि आसपास चालू केमिकल कारखानों से निकलने वाला अपशिष्ट बिना किसी उपचार के सीधे नहर के पानी में गिराया जा रहा है। विषैले रसायनों से युक्त यह गंदा पानी जब खेतों में पहुंचता है तो खड़ी फसलों की गुणवत्ता को भारी नुकसान पहुंचाता है। इतना ही नहीं, नहर के आसपास बसे गांवों में रहने वाले लोग पानी के इस प्रदूषण के कारण विभिन्न गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। देवी सिंह लंबा के अनुसार, औद्योगिक संस्थानों को नहर में तरल कचरा प्रवाहित करने से पूर्व वाटर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने चाहिए ताकि पानी पूरी तरह साफ होकर ही बाहर निकले।
सोतई गांव और आसपास के कृषि क्षेत्र पर असर
सोतई गांव के किसान नारायण लगभग 6 एकड़ कृषि भूमि पर खेती करते हैं। उनका कहना है कि आगरा नहर में न केवल फैक्ट्रियों का रसायन मिला पानी आ रहा है, बल्कि शहर के बड़े नालों और गटरों का कचरा भी सीधे इसी जलस्रोत में छोड़ा जा रहा है। वैकल्पिक सिंचाई साधनों की कमी के कारण किसान इसी बदबूदार और दूषित पानी से फसलों की सिंचाई करने पर विवश हैं। किसानों के मन में इस बात को लेकर गहरा डर बना हुआ है कि जहरीले तत्वों से युक्त यह पानी पैदावार और आम जनता के स्वास्थ्य को लंबे समय तक नुकसान पहुंचाएगा।
सोतई गांव के ही एक अन्य किसान संदीप कुमार ने बताया कि उनके गांव में लगभग 700 से 800 एकड़ उपजाऊ जमीन पर खेती की जाती है। मौजूदा समय में आगरा नहर का पानी बिल्कुल रंग में काला और गटर के कचरे जैसा दिखता है। संदीप कुमार के अनुसार, करीब 10 वर्ष पूर्व नहर में स्वच्छ जल प्रवाहित होता था और उस समय किसानों को सिंचाई में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं आती थी। हालांकि, पिछले एक दशक के दौरान इलाके में हुए तीव्र औद्योगिक विकास के साथ-साथ यह जल संकट लगातार गहराता चला गया। चूंकि क्षेत्र का अधिकांश किसान वर्ग सिंचाई के लिए पूरी तरह इसी नहर पर निर्भर है, इसलिए दूषित पानी का सीधा असर उनकी आजीविका और पैदावार पर पड़ रहा है।
फसलों की बर्बादी, उपजाऊ मिट्टी पर मार और बढ़ता स्वास्थ्य संकट
नहर के दूषित पानी से होने वाला नुकसान केवल फसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खेत की मिट्टी की संरचना और गुणवत्ता को भी स्थायी रूप से खराब कर रहा है। रसायनों के नियमित जमाव से मिट्टी की नमी सोखने और पोषक तत्व प्रदान करने की क्षमता प्रभावित हो रही है। इसके साथ ही नहर के आसपास रहने वाले ग्रामीणों में त्वचा संबंधी संक्रमण और अन्य बीमारियां बढ़ रही हैं। किसान देवी सिंह लंबा का यह भी कहना है कि किसान पहले से ही सरकारी या सहकारी स्तर पर समय पर खाद न मिलने की समस्या से जूझ रहे हैं। अक्सर खाद की किल्लत के कारण उन्हें खुले बाजार से अत्यधिक ऊंचे दामों पर उर्वरक खरीदना पड़ता है। ऐसे में सिंचाई के लिए जहरीले पानी का मिलना किसानों की आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर रहा है।
किसानों की मांग: पानी की जांच और अनिवार्य ट्रीटमेंट
लगातार बिगड़ते हालात को देखते हुए क्षेत्र के किसानों ने प्रशासन और संबंधित विभागों से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। देवी सिंह लंबा और अन्य स्थानीय किसानों का कहना है कि सरकार को आगरा नहर में बह रहे पानी के नमूनों की प्रयोगशाला में त्वरित जांच करानी चाहिए। यदि जांच में विषैले रासायनिक तत्व पाए जाते हैं, तो कंपनियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। किसानों की स्पष्ट मांग है कि औद्योगिक अपशिष्ट को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट में पूरी तरह साफ करने के बाद ही नहर में छोड़े जाने का नियम कड़ाई से लागू किया जाए, जिससे कृषि और जनस्वास्थ्य दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।





















