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चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्षी मोर्चा, संसद मार्ग पर धरने के बाद राहुल गांधी ने सांसदों के साथ बनाई अगली रणनीतिबिहार
7 अक्तू॰ 2026, 4:07 pm (3 घंटे पहले)· 0

चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्षी मोर्चा, संसद मार्ग पर धरने के बाद राहुल गांधी ने सांसदों के साथ बनाई अगली रणनीति

संसद मार्ग पर हंगामे और हिरासत के बाद राहुल गांधी ने विपक्षी सांसदों के साथ बैठक की, वहीं चुनाव आयोग की कार्यशैली और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर राजनीतिक टकराव तेज हो गया है।

संसद मार्ग पर राजनीतिक गहमागहमी और नाटकीय घटनाक्रम के बाद प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी ने विरोधी दलों के सांसदों के लिए दिल्ली में एक लंच बैठक रखी। इस बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्षी दलों की आगे की साझा रणनीति पर विस्तृत चर्चा की गई। इससे ठीक एक दिन पहले अखिलेश यादव, अभिषेक बनर्जी और अन्य विपक्षी सांसदों ने विरोध मार्च निकाला था, जिसके बाद पुलिस उन्हें बसों में भरकर ले गई थी और बाद में रिहा कर दिया था। हालांकि, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और कई अन्य कांग्रेसी नेता आकाशवाणी भवन परिसर के भीतर चले गए और वहां बरगद के पेड़ के नीचे करीब 8 घंटे तक धरने पर जमे रहे। विपक्षी नेताओं की मांग थी कि कुल 240 विपक्षी सांसद तीनों चुनाव आयुक्तों से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात करना चाहते हैं।

आकाशवाणी भवन में 8 घंटे का धरना और पुलिस की कार्रवाई

विपक्षी दलों की ओर से चुनाव आयोग के सामने प्रस्ताव रखा गया था कि यह मुलाकात पार्लियामेंट एनेक्सी में आयोजित की जाए। लेकिन तीनों चुनाव आयुक्तों ने स्थापित परिपाटी और तय प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए 240 सांसदों के पूरे समूह से मिलने से साफ मना कर दिया। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि वे केवल एक छोटे शिष्टमंडल से ज्ञापन लेने के लिए तैयार हैं। इसके बावजूद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का धरना जारी रहा और वे आकाशवाणी भवन परिसर में पूरे दिन डेरा डाले रहे। रात भर धरने को जारी रखने के लिए वहां गद्दे, तकिए, चादर और खाने-पीने के सारे इंतजाम कर लिए गए थे। नेताओं का रुख अड़ा हुआ था कि जब तक तीनों चुनाव आयुक्तों से आमने-सामने बात नहीं होगी, वे वहां से नहीं हटेंगे। कांग्रेस नेताओं ने अपने इस तरीके को एक खास सियासी दांव बताया, लेकिन कुछ ही देर में दिल्ली पुलिस ने एक्शन लेते हुए 15 मिनट के भीतर धरना खत्म कराया और राहुल व प्रियंका समेत तमाम नेताओं को हिरासत में लेकर किंग्सवे कैंप थाने पहुंचा दिया, जहां देर रात जाकर यह पूरा घटनाक्रम समाप्त हुआ।

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ज्ञानेश कुमार पर सवाल और चुनावी नतीजों का सियासी गणित

विपक्षी खेमा विशेष रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर तीखे सवाल उठा रहा है। राहुल गांधी उन्हें सत्ता पक्ष का मददगार बताते हुए गंभीर आरोप लगा रहे हैं। दूसरी ओर, राजनीतिक हलकों में यह सवाल भी उठ रहा है कि अगर विपक्षी दलों को चुनाव आयोग से बात करनी थी, तो पूर्व निर्धारित औपचारिक अपॉइंटमेंट क्यों नहीं मांगी गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे टकराव के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि लगातार चुनावों में हार का कारण चुनावी प्रक्रिया और चुनाव आयोग की भूमिका है। हालांकि चुनावी रिकॉर्ड यह भी दिखाते हैं कि ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त का पदभार संभाला था। उनके पद संभालने से काफी पहले ही कांग्रेस तीन लोकसभा चुनाव और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में शिकस्त का सामना कर चुकी थी। इसके अलावा ज्ञानेश कुमार अगले लोकसभा चुनाव से पहले ही सेवानिवृत्त हो जाएंगे, जिसके चलते विरोधी दलों के वोट चोरी वाले दावों पर जनता के बीच कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं।

विपक्ष के तीन बड़े आरोप और भाजपा की दलीलें

चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्षी दलों ने मुख्य रूप से तीन गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं। पहला आरोप यह लगाया गया है कि ज्ञानेश कुमार ने चुनाव आयोग के अन्य सदस्यों की राय को नजरअंदाज किया और मनमाने तरीके से एसआईआर को लेकर अहम निर्णय लिए। दूसरा बड़ा आरोप फॉर्म 6 को लेकर है, जिसमें विपक्ष का दावा है कि युवा मतदाताओं के नाम काटने के उद्देश्य से नियमों में गैरकानूनी बदलाव किए गए। तीसरा आरोप यह है कि करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम सत्ताधारी दल को चुनावी फायदा पहुंचाने के लिए सूची से हटा दिए गए हैं। इन सभी आरोपों पर सत्ता पक्ष की तरफ से संबित पात्रा ने मोर्चा संभाला और क्रमवार जवाब दिए। संबित पात्रा ने यह रेखांकित किया कि ज्ञानेश कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले ही कांग्रेस लगातार चुनाव हारती आ रही थी।

संस्थान की विश्वसनीयता और पारदर्शिता की कसौटी

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता पक्ष द्वारा दिए गए इन स्पष्टीकरणों को वास्तव में मुख्य चुनाव आयुक्त को खुद बहुत पहले सार्वजनिक मंच पर सामने रखना चाहिए था। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव आयोग की जिम्मेदारी सिर्फ निष्पक्ष तरीके से चुनाव संपन्न कराने तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होता है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी दिखे और सभी दलों का भरोसा बना रहे। एसआईआर जैसी प्रक्रियाएं चलाना या उन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाना जो अब इस दुनिया में नहीं हैं या कहीं और स्थानांतरित हो चुके हैं, कोई गलत कदम नहीं है। यह एक स्वाभाविक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है जिसकी मांग विभिन्न राजनीतिक दल समय-समय पर खुद करते रहे हैं। हालांकि, इस तरह के महत्वपूर्ण नीतिगत कदम उठाते समय सभी राजनीतिक दलों को विश्वास में लेना और उन्हें आश्वस्त करना एक अनिवार्य लोकतांत्रिक परंपरा मानी जाती है। सिर्फ आधिकारिक औपचारिकताएं पूरी करना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे में सभी पक्षों के मन में निष्पक्षता और विश्वास की भावना पैदा करना भी संस्था की मुख्य जिम्मेदारी होती है।

सवाल-जवाब

राहुल गांधी और विपक्षी सांसदों ने संसद मार्ग पर प्रदर्शन क्यों किया?
विपक्षी सांसद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची में बदलाव और कथित अनियमितताओं को लेकर तीनों चुनाव आयुक्तों से मिलना चाहते थे।
चुनाव आयुक्तों ने 240 सांसदों से मिलने से इनकार क्यों किया?
चुनाव आयुक्तों ने स्थापित परिपाटी और आधिकारिक प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए कहा कि वे केवल एक छोटे शिष्टमंडल से ज्ञापन ले सकते हैं।
आकाशवाणी भवन में धरना कितने समय तक चला?
राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और कांग्रेस नेताओं का धरना आकाशवाणी भवन परिसर में बरगद के पेड़ के नीचे करीब 8 घंटे तक चला।
ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त कब बने थे?
ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त का पदभार संभाला था।
विपक्ष ने चुनाव आयोग पर कौन से तीन मुख्य आरोप लगाए हैं?
विपक्ष ने एसआईआर पर एकतरफा फैसले लेने, फॉर्म 6 बदलकर युवाओं के नाम काटने और 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाने का आरोप लगाया है।
विपक्ष के आरोपों पर सत्ता पक्ष का क्या रुख रहा?
संबित पात्रा ने कहा कि ज्ञानेश कुमार के पद संभालने से बहुत पहले ही कांग्रेस तीन लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव हार चुकी थी।
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