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आईआईटी बॉम्बे छात्र साहिल वाकोडे की मौत मामले में नया मोड़, करीबी दोस्त ने जातिगत भेदभाव के दावों को नकाराबिहार
21 सित॰ 2026, 6:41 pm (17 मिनट पहले)· 0

आईआईटी बॉम्बे छात्र साहिल वाकोडे की मौत मामले में नया मोड़, करीबी दोस्त ने जातिगत भेदभाव के दावों को नकारा

आईआईटी बॉम्बे के बीटेक छात्र साहिल वाकोडे की मौत के मामले में उसके एक करीबी दोस्त ने किसी भी तरह के जातिगत भेदभाव से इनकार किया है, जबकि करीब 750 शिक्षकों ने प्रोफेसर सूर्यनारायण डूल्ला के समर्थन में मार्च निकालने की घोषणा की है।

आईआईटी बॉम्बे के बीटेक छात्र साहिल रविंद्र वाकोडे की दुखद मौत के बाद कैंपस के भीतर तनाव और विवाद लगातार गहराता जा रहा है। इस संवेदनशील मामले में अब एक नया मोड़ सामने आया है, जहां छात्र के एक नजदीकी मित्र के बयान ने पहले से लगे आरोपों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। साहिल के करीबी दोस्त ने स्पष्ट किया है कि उसे कभी भी साहिल के साथ किसी प्रकार का जातिगत भेदभाव होने का अंदेशा नहीं हुआ। मित्र के अनुसार, इम्तिहान से चंद रोज पहले तक साहिल पूरी तरह शांत, खुशमिजाज और सामान्य बर्ताव कर रहा था, जिससे किसी भी गहरे तनाव या आत्मघाती कदम का संकेत नहीं मिलता था।

नकल के आरोप और घटनाक्रम का विवरण

एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग में बीटेक द्वितीय वर्ष के विद्यार्थी साहिल रविंद्र वाकोडे 18 सितंबर को अपनी परीक्षा में शामिल हुए थे। परीक्षा कक्ष में उनके पास एक मोबाइल फोन पाया गया था। उन पर आरोप लगा कि वह प्रश्न पत्र की तस्वीर चैटजीपीटी पर भेजकर प्रश्नों के हल हासिल करने की कोशिश कर रहे थे। उस समय कक्ष में निरीक्षक का दायित्व संभाल रहे प्रोफेसर सूर्यनारायण डूल्ला ने उन्हें अनुचित साधन का प्रयोग करते हुए पकड़ लिया था।

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संस्थान की निर्धारित शैक्षणिक नियमावली के तहत प्रोफेसर डूल्ला ने इस कदाचार की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी। छात्र के मित्र के अनुसार, नकल पकड़े जाने के बाद प्रोफेसर साहिल को परीक्षा हॉल से बाहर ले गए थे। हालांकि, उस कक्ष से बाहर निकलने के बाद वहां क्या बातचीत हुई या क्या स्थिति बनी, इसकी विस्तृत जानकारी दोस्त को नहीं है। इस घटना के महज कुछ घंटों बाद साहिल अपने हॉस्टल के कमरे में मृत पाए गए, जिसके बाद पूरे परिसर में हड़कंप मच गया।

पिता की शिकायत और दर्ज एफआईआर

साहिल की असामयिक मृत्यु के उपरांत उनके परिजनों और साथी छात्रों ने आक्रोश जताया। साहिल के पिता की औपचारिक शिकायत के आधार पर प्रोफेसर सूर्यनारायण डूल्ला के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून के कड़े प्रावधानों के तहत आपराधिक मामला पंजीकृत किया गया। पिता ने सीधे तौर पर आरोप लगाया था कि साहिल को जाति के आधार पर निशाना बनाकर प्रताड़ित किया गया और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया था।

लेकिन साहिल के नजदीकी मित्र का बयान इन आरोपों से बिल्कुल विपरीत स्थिति बयां करता है। दोस्त ने बताया कि परीक्षा से चार या पांच दिन पहले ही उसकी साहिल से आमने-सामने भेंट हुई थी। उस वक्त साहिल पूरी तरह सहज था, दोस्तों के साथ सामान्य ढंग से हंसी-मजाक कर रहा था और उसके हाव-भाव से किसी बड़ी परेशानी या मानसिक अवसाद का लेशमात्र भी आभास नहीं हो रहा था। इस गवाही ने मामले की जटिलता को और बढ़ा दिया है।

फैकल्टी फोरम का समर्थन और 750 शिक्षकों का मार्च

दूसरी तरफ, संस्थान का फैकल्टी फोरम अपने साथी शिक्षक के पक्ष में दृढ़ता से खड़ा हो गया है। प्रोफेसर डूल्ला के बचाव में उतरते हुए करीब 750 शिक्षकों ने परिसर में एकजुटता मार्च निकालने की बात कही है। फैकल्टी फोरम ने एक आधिकारिक बयान जारी कर रेखांकित किया कि प्रोफेसर डूल्ला ने केवल अपनी तय ड्यूटी निभाई थी और परीक्षा के नियमों के उल्लंघन पर सामान्य प्रोटोकॉल का पालन करते हुए अधिकारियों को सूचित किया था।

फोरम ने साफ किया कि प्रोफेसर डूल्ला को संस्थान की मूल सेवा से निलंबित नहीं किया गया है, बल्कि जांच को स्वतंत्र, पारदर्शी और निष्पक्ष बनाए रखने के उद्देश्य से उन्हें केवल डीन की प्रशासनिक जिम्मेदारी से मुक्त किया गया है। शिक्षकों की संस्था ने उन्हें एक अत्यंत अनुभवी, सम्मानित और निष्ठावान प्राध्यापक बताते हुए उनके खिलाफ फैलाई जा रही भ्रामक जानकारियों और अफवाहों पर गहरी नाराजगी भी दर्ज कराई है।

क्राइम ब्रांच को सौंपी गई जांच

छात्रों के निरंतर विरोध प्रदर्शनों और परिवार की औपचारिक शिकायत को देखते हुए प्रशासन ने प्रोफेसर डूल्ला को डीन पद से तत्काल प्रभाव से अलग कर दिया था। इस पूरे प्रकरण की गहराई से पड़ताल करने के लिए जांच का जिम्मा अब मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया है।

आईआईटी बॉम्बे प्रशासन ने अपनी अद्यतन प्रतिक्रिया में स्पष्ट किया है कि छात्र की मौत से पहले घटित सभी कड़ियों और परिस्थितियों की आधिकारिक पड़ताल जारी है। संस्थान का मानना है कि जब तक जांच एजेंसियां किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच जातीं, तब तक किसी भी पूर्वाग्रह या निष्कर्ष पर पहुंचना सर्वथा अनुचित होगा। इसके साथ ही संस्थान ने अपने पूर्ववर्ती कुछ बयानों को लेकर खेद व्यक्त करते हुए माफी भी मांगी है।

सवाल-जवाब

साहिल वाकोडे कौन थे और वह किस विभाग में अध्ययनरत थे?
साहिल रविंद्र वाकोडे आईआईटी बॉम्बे के एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग में बीटेक द्वितीय वर्ष के छात्र थे।
18 सितंबर को परीक्षा कक्ष में क्या घटना घटी थी?
परीक्षा के दौरान साहिल के पास मोबाइल फोन पाया गया था और उन पर चैटजीपीटी के जरिए प्रश्नों के उत्तर खोजने का आरोप लगा था।
साहिल के करीबी दोस्त ने जातिगत भेदभाव को लेकर क्या बयान दिया?
दोस्त ने कहा कि उसे कभी नहीं लगा कि साहिल के साथ कोई जातिगत भेदभाव हुआ था और परीक्षा से कुछ दिन पहले तक वह पूरी तरह सामान्य और खुश था।
प्रोफेसर सूर्यनारायण डूल्ला के खिलाफ क्या आरोप और कानूनी धाराएं लगाई गई हैं?
साहिल के पिता की शिकायत पर प्रोफेसर के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है।
आईआईटी बॉम्बे फैकल्टी फोरम का क्या रुख है?
फैकल्टी फोरम ने प्रोफेसर डूल्ला का समर्थन किया है, उन्हें नियमपूर्वक काम करने वाला बताया है और करीब 750 शिक्षकों ने समर्थन में मार्च निकालने की बात कही है।
इस मामले की जांच वर्तमान में कौन सी एजेंसी कर रही है?
मामले की निष्पक्ष और विस्तृत जांच की जिम्मेदारी मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंपी गई है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·6 मिनट पहले

साहिल वाकोडे मामले में दर्ज एफआईआर और एससी/एसटी एक्ट के तहत जांच के बीच करीबी दोस्त का बयान और ७५० शिक्षकों का मार्च इस केस को बेहद जटिल कानूनी मोड़ पर ले आते हैं। पुलिस के लिए अब यह साबित करना बड़ी चुनौती होगा कि क्या अकादमिक कदाचार के बाद हुई कार्रवाई आत्महत्या के लिए उकसावा थी या नहीं।

Rohan Verma@rohan-verma·6 मिनट पहले

वरिष्ठ संवाददाता के तौर पर मेरा मानना है कि इस मामले में पुलिस की तफ्तीश अब उस संकीर्ण दायरे से आगे निकल चुकी है जिसमें सिर्फ अकादमिक कदाचार की जांच होनी थी। एससी/एसटी एक्ट की धाराओं और फैकल्टी के बड़े पैमाने पर लामबंद होने से यह जाँच अब उच्च शिक्षण संस्थानों में संस्थागत दबाव, मानसिक स्वास्थ्य और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की पारदशित्ता पर एक राष्ट्रीय बहस का रूप ले चुकी है। आने वाले दिनों में फॉरेंसिक साक्ष्य, चैटजीपीटी के उपयोग से जुड़े तकनीकी डिजिटल प्रमाण और परीक्षा हॉल के भीतर के सीसीटीवी या ऑडियो-विजुअल फुटेज इस पूरे मुकदमे के भविष्य तय करने में सबसे निर्णायक साबित होंगे।

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