उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में स्थित अल्देमऊ का ऐतिहासिक किला आज अपने गौरवशाली अतीत के सामने बेहद विवश और उपेक्षित दिखाई देता है। किसी दौर में जिस स्थान से भर राजाओं की सत्ता का संचालन होता था और उनका दबदबा पूरे क्षेत्र पर कायम था, वहां अब किले के नाम पर केवल एक चारपाई के बराबर जमीन ही शेष बची है। सदियों पुराने इस ऐतिहासिक स्थल का अधिकांश भाग धीरे-धीरे मिट्टी के टीलों के नीचे दब चुका है, जिसके कारण इसका मूल स्वरूप लगभग पूरी तरह खो चुका है। स्थानीय बाशिंदों के बीच आज भी इस स्थल से जुड़ी कई गाथाएं प्रचलित हैं, जो क्षेत्र के समृद्ध इतिहास और उसकी वर्तमान दुर्दशा को उजागर करती हैं।
भर शासक राजा अल्दे और अल्देमऊ नगर की स्थापना का इतिहास
क्षेत्र के ऐतिहासिक दस्तावेजों और राजेश्वर सिंह की लिखित पुस्तक सुल्तानपुर इतिहास की झलक में इस भूभाग का विस्तृत ब्यौरा मिलता है। इस विवरण के मुताबिक प्राचीन काल में अल्दे और मल्दे नाम के दो भर भाई हुआ करते थे। इनमें से अल्दे ने गोमती नदी के उत्तरी किनारे और कादीपुर तहसील मुख्यालय से दक्षिण दिशा की तरफ एक नया कस्बा आबाद किया, जिसे अल्देमऊ नाम दिया गया। इसी नगर में राजा अल्दे ने अपनी मजबूत गढ़ी अर्थात किले की नींव रखी थी। इसी ऐतिहासिक बसावट के आधार पर आगे चलकर इस पूरे परगने को अल्देमऊ के नाम से जाना जाने लगा।
भर राजवंश का प्रभाव केवल अल्देमऊ तक ही सीमित नहीं था, बल्कि जिले के कई अन्य क्षेत्रों में भी उनकी सत्ता की जड़ें फैली हुई थीं। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार कूड़े भर ने कूड़ेभार को अपनी सत्ता का मुख्य केंद्र बनाया था, जबकि ईश ने इसौली पर शासन किया। सुल्तानपुर के भूभाग में आज भी मौजूद सरैंया भरथी, भरखरे, भेरौरा और भरथुआ जैसे गांवों और कस्बों के नाम सीधे तौर पर भर शासकों की ऐतिहासिक उपस्थिति को प्रमाणित करते हैं। इसके अलावा धोपाप के शासक भर राजा हेल और कटघर के भर राजा नन्द कुंवर का वर्णन भी इतिहास के पन्नों में प्रमुखता से दर्ज है।
राजपूतों के बढ़ते प्रभाव और बाहरी आक्रमणों से ढहा साम्राज्य
इतिहास के जानकारों और वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह के अनुसार भर राजवंश के योद्धा असाधारण रूप से पराक्रमी और निडर माने जाते थे। उन्होंने अपने इलाके, संप्रभुता और शासन की रक्षा के लिए अंत तक कड़ा संघर्ष किया। हालांकि कालक्रम में सुल्तानपुर और आसपास के क्षेत्रों में राजपूतों का राजनीतिक वर्चस्व धीरे-धीरे बढ़ता गया, जिससे भरों का शासन कमजोर पड़ता चला गया। पश्चिम की दिशा से आए कई राजपूत योद्धाओं ने शुरुआती दौर में भर राजाओं के दरबार में सैनिक व अन्य पदों पर नौकरियां कीं और आगे चलकर अनुकूल अवसर पाकर सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली।
इसके साथ ही दिल्ली के मुस्लिम सुल्तानों के निरंतर हमलों ने भी भर सत्ता की नींव हिला दी। इस क्रम में इसौली के भर शासक को परास्त करने के उद्देश्य से अलाउद्दीन खिलजी ने बैस राजपूतों की एक टुकड़ी को मैदान में भेजा था। इस भीषण सैन्य अभियान में मिली सफलता और उनके अदम्य साहस को देखते हुए बैस राजपूतों को भाले सुलतान की प्रतिष्ठित उपाधि से नवाजा गया था।
शैव परंपरा, भारशिव पहचान और वर्तमान अवशेष
धार्मिक आस्था के दृष्टिकोण से भर समुदाय के शासक भगवान शिव के अनन्य उपासक थे। शैव मत में गहरी निष्ठा और समर्पण के कारण ही उन्हें भारशिव नाम से भी पुकारा जाता था। समय बीतने के साथ-साथ राजपूत शक्तियों और मुस्लिम शासकों के निरंतर हमलों के बीच भर राजवंश का साम्राज्य धीरे-धीरे पतन की ओर अग्रसर हुआ और अंततः समाप्त हो गया। शासन और सत्ता छिन जाने के बाद उनके द्वारा निर्मित तमाम गढ़ियां, कोट और किले संरक्षण के अभाव में उपेक्षा की भेंट चढ़ते चले गए।
अल्देमऊ स्थित राजा अल्दे की ऐतिहासिक गढ़ी का विशाल हिस्सा भी रख-रखाव न होने के कारण ढह गया और समय के साथ मिट्टी में विलीन हो गया। वर्तमान समय में इस जगह पर सिर्फ चारपाई के बराबर एक छोटा सा हिस्सा ही जमीन के ऊपर दिखाई देता है। भले ही यह अवशेष अपने सुनहरे दौर की भव्यता को पूरी तरह बयां न कर पाता हो, लेकिन यह सुल्तानपुर के भूभाग पर भर राजाओं के लंबे शासन और उनकी ऐतिहासिक विरासत का एक मूक गवाह बनकर आज भी खड़ा है।



















