कैलेंडर वर्ष में सर्वाधिक टेस्ट शतक ठोकने का रिकॉर्ड आज भी यूसुफ के नाम, पोंटिंग और सचिन भी रहे अव्वल2 अक्टूबर को चंद्रमा का बुध की राशि में गोचर, इन राशियों की खुलेगी किस्मतरायगढ़ में जलाशय के कैचमेंट क्षेत्र पर अवैध कॉलोनियों का निर्माण, 120 कब्जाधारियों को नोटिसश्राद्ध की थाली में कद्दू का खास स्थान, जानिए पितरों के भोज से जुड़ी सदियों पुरानी परंपराएंसवाई माधोपुर में वन्यजीव प्रेमियों का तांता, तीन माह बाद शुरू हुई सफारीशूटिंग के दौरान फिसलकर गिरे अमिताभ बच्चन, कौन बनेगा करोड़पति 18 के मंच पर साझा किया घुटने की चोट का दर्दबिग बॉस 20 में लॉलीपॉप डायलॉग पर कनिका मान का फूटा गुस्सा, काजी तौकीर ने दी सफाई1 अक्टूबर को पेट्रोल और डीजल के नए दाम जारी, सरकार ने डीजल पर विंडफॉल टैक्स घटायारामायण के पर्दे से निकलकर रोमांटिक अंदाज में दिखे देव शर्मा, मोनिका रावण संग नया म्यूजिक वीडियो हुआ रिलीजरिपल और स्टेलर में मिला-जुला रुझान, एक्सआरपी पर दबाव के बीच एक्सएलएम में सुधार के संकेत
बस्तर के जंगलों में हथियार छोड़ मुख्यधारा में लौटे सात युवाओं ने पास की एसएससी परीक्षाछत्तीसगढ़
1 अक्तू॰ 2026, 9:34 am (10 मिनट पहले)· 0

बस्तर के जंगलों में हथियार छोड़ मुख्यधारा में लौटे सात युवाओं ने पास की एसएससी परीक्षा

छत्तीसगढ़ में हिंसा छोड़कर सामान्य जीवन में लौटे सात पूर्व माओवादियों ने ओपन स्कूल की 10वीं बोर्ड परीक्षा में बाजी मारी है, जिनमें तीन प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुए हैं।

छत्तीसगढ़ में कभी हिंसा के रास्ते पर चलने वाले युवाओं ने अपनी जिंदगी की नई दिशा तय करते हुए शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय मिसाल पेश की है। पिछले वर्ष मुख्यधारा में शामिल होने वाले 210 पूर्व माओवादियों में से सात ने छत्तीसगढ़ राज्य ओपन स्कूल की एसएससी यानी 10वीं कक्षा की परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण कर ली है। इनमें से तीन प्रतिभागियों ने प्रथम श्रेणी में अंक प्राप्त कर अपनी प्रतिभा और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया है। यह उपलब्धि दिखाती है कि अगर सही अवसर और सहयोग मिले, तो प्रतिकूल परिस्थितियों से निकलकर भी जीवन को संवारा जा सकता है।

हिंसा का साया छोड़ पुनर्वास और शिक्षा की नई शुरुआत

अतीत में जंगलों के भीतर एके 47 राइफलों और बारूदी सुरंगों के तनावपूर्ण माहौल में दिन बिताने वाले इन युवाओं का जीवन अब पूरी तरह बदल चुका है। इनमें से कई लोगों ने कम उम्र में पारिवारिक त्रासदियों और गंभीर सामाजिक दबावों के चलते भटककर गलत रास्ता चुन लिया था। जब इन लोगों ने हिंसा का त्याग कर कानून के समक्ष आत्मसमर्पण किया, तब सरकार के पुनर्वास कार्यक्रमों और स्थानीय प्रशासन ने इन्हें सामान्य सामाजिक जीवन में स्थापित करने का जिम्मा संभाला।

ये भी पढ़ें

प्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय पुलिस ने इन युवाओं की नियमित काउंसलिंग कराई, उनके जरूरी कानूनी दस्तावेज तैयार करवाए और उन्हें अपनी छूटी हुई पढ़ाई फिर से शुरू करने के लिए प्रेरित किया। पुनर्वास केंद्रों और जेल परिसर के सुरक्षित वातावरण में रहते हुए इन प्रतिभागियों ने अपनी पुरानी कमियों को दूर करने की ठान ली और किताबों को अपना संबल बनाया।

संघर्ष से सफलता: 35 वर्ष की गीता नारोते की प्रेरणादायक यात्रा

इस परीक्षा परिणाम में सबसे प्रेरक कहानियों में से एक गीता नारोते की है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की निवासी गीता जब मात्र 10 वर्ष की थीं, तब उनके पिता की हत्या माओवादियों ने कर दी थी। इसके बाद उपजी विषम परिस्थितियों के चलते वे संगठन के संपर्क में आईं और लंबे समय तक उसी तंत्र का हिस्सा बनी रहीं। संगठन में सक्रिय रहने के दौरान उन्हें सब ‘डॉ चंपा’ के नाम से बुलाते थे, क्योंकि वे बीमार साथियों का इलाज करने और गोली लगने से घायल हुए लोगों के घावों पर टांके लगाने का काम करती थीं।

कक्षा छह में ही पढ़ाई छूट जाने के बावजूद 35 वर्ष की आयु में गीता ने हार नहीं मानी। पिछले साल आत्मसमर्पण करने के बाद उन्होंने अपनी बुनियादी शिक्षा पूरी करने का बीड़ा उठाया और अब एसएससी बोर्ड पास कर लिया। गीता का स्पष्ट लक्ष्य है कि वे आगे नर्सिंग का पेशेवर प्रशिक्षण लेंगी, ताकि वे अस्पताल में नर्स बनकर अपने परिवार को सम्मानजनक जीवन और मजबूत सहारा दे सकें।

दिन में कौशल विकास और रात में परीक्षाओं की तैयारी

परीक्षा में सफल होने वाले अन्य साथियों में 32 वर्षीय अर्जुन ओयाम और संतोष अचला के अनुभव भी गहरे संघर्ष को दर्शाते हैं। बस्तर के घने जंगलों से निकलकर सामान्य दुनिया में कदम रखने वाले अर्जुन के लिए सब कुछ नया था। उन्होंने जीवन को पटरी पर लाने के लिए दिन के वक्त आजीविका के गुर सीखे, जिनमें मछली पालन और इलेक्ट्रीशियन के काम का व्यावहारिक प्रशिक्षण शामिल था।

दिनभर कौशल विकास का कठिन काम करने के बाद अर्जुन अपनी पूरी रात किताबों के साथ बिताते थे। इसी तरह संतोष अचला ने भी गंभीर पारिवारिक संकटों और व्यक्तिगत संघर्षों से जूझते हुए अपनी निरंतर लगन के बल पर एसएससी की परीक्षा पास की। दोनों युवाओं ने यह साबित किया कि आजीविका के प्रशिक्षण के साथ-साथ औपचारिक शिक्षा को भी पूरी निष्ठा से साधा जा सकता है।

डिजिटल तकनीक, टैबलेट और स्थानीय शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका

सुदूर जंगलों और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए इन विद्यार्थियों के लिए आधुनिक पाठ्यक्रम से तालमेल बैठाना एक बड़ी चुनौती थी। इस बाधा को दूर करने में डिजिटल साधनों और अध्ययन सामग्री ने बड़ा योगदान दिया। कई पूर्व विद्रोहियों को अध्ययन के लिए टैबलेट मुहैया कराए गए, जिन पर वे ऑनलाइन पाठ्यसामग्री और पीडीएफ फाइलों के माध्यम से जरूरी अध्याय पढ़ते थे।

इसके अलावा उनके मित्रों और मार्गदर्शकों ने व्हाट्सएप के जरिए नोट्स साझा किए और कठिन विषयों के प्रश्नों को सुलझाने में सहायता की। स्थानीय शिक्षकों और ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों ने भी समय निकालकर इन शिक्षार्थियों की शंकाएं दूर कीं। इस साझा समर्थन ने उनके आत्मविश्वास को निरंतर मजबूत किया और उन्हें सफलता के मुकाम तक पहुंचाया।

मुख्यधारा में शामिल होने का बड़ा सामाजिक संदेश

एसएससी परीक्षा में इन सात युवाओं की कामयाबी केवल एक शैक्षणिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के लिए भी एक सीधा संदेश है जो अभी भी हथियारों के साए में भटक रहे हैं। यह परिणाम दर्शाता है कि स्थायी शांति और व्यक्तिगत विकास का रास्ता हिंसा से नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुशासन और संविधानसम्मत मुख्यधारा से ही संभव है। प्रशासन की पुनर्वास नीतियों और युवाओं के निजी संकल्प के इस समन्वय ने समाज में सकारात्मक बदलाव की मजबूत नींव रखी है।

सवाल-जवाब

कितने पूर्व माओवादियों ने छत्तीसगढ़ ओपन स्कूल की परीक्षा पास की है?
पिछले वर्ष आत्मसमर्पण करने वाले 210 पूर्व माओवादियों में से कुल सात लोगों ने छत्तीसगढ़ ओपन स्कूल की एसएससी यानी 10वीं परीक्षा पास की है।
इन सात परीक्षार्थियों में से कितने लोगों ने प्रथम श्रेणी हासिल की?
सफल होने वाले सात पूर्व माओवादियों में से तीन परीक्षार्थियों ने प्रथम श्रेणी के अंकों के साथ यह परीक्षा उत्तीर्ण की है।
गीता नारोते कौन हैं और संगठन में उन्हें किस नाम से जाना जाता था?
गीता नारोते महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की रहने वाली पूर्व माओवादी हैं, जिन्हें संगठन में घायलों के इलाज और सेवा के कारण 'डॉ चंपा' के नाम से जाना जाता था।
एसएससी परीक्षा पास करने के बाद गीता का आगे क्या लक्ष्य है?
गीता नारोते अब नर्सिंग का प्रशिक्षण लेकर अस्पताल में नर्स बनना चाहती हैं ताकि वे अपने परिवार को आर्थिक और सामाजिक सहारा दे सकें।
अर्जुन ओयाम पढ़ाई के साथ दिन में किस तरह का प्रशिक्षण ले रहे थे?
32 वर्षीय अर्जुन ओयाम दिन के समय आजीविका के लिए मछली पालन और इलेक्ट्रीशियन का काम सीखते थे और रात में परीक्षा की तैयारी करते थे।
इन विद्यार्थियों को पढ़ाई में डिजिटल उपकरणों से क्या मदद मिली?
विद्यार्थियों ने टैबलेट पर ऑनलाइन अध्ययन सामग्री और पीडीएफ फाइलें पढ़ीं, जबकि उनके दोस्तों और शिक्षकों ने व्हाट्सएप के माध्यम से नोट्स और प्रश्नों के उत्तर समझाए।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp