देश के चुनावी तंत्र और शीर्ष चुनाव अधिकारियों के खिलाफ राजधानी में जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच एक युवा चेहरा अचानक सुर्खियों के केंद्र में आ गया है। अखिल भारतीय छात्र संघ यानी आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा हाल के दिनों में विपक्षी दलों के कई बड़े मंचों पर अग्रिम पंक्ति में दिखाई दी हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने और मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया में कथित अनियमताओं के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों में वह लगातार सक्रिय रही हैं। विपक्ष के बड़े नेताओं के कार्यक्रमों से लेकर अलग-अलग आंदोलनों तक में उनकी मौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों का ध्यान खींचा है।
विपक्षी मंचों पर प्रमुखता और सार्वजनिक सक्रियता
सड़क पर उतरकर आवाज उठाने से लेकर औपचारिक प्रेस वार्ताओं तक, विपक्षी खेमे में छात्र नेता को खास जगह मिलती दिखी है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में आयोजित इंडिया गठबंधन के प्रदर्शनों में वह कई बार प्रमुखता से नजर आईं। इसके अतिरिक्त अन्य सार्वजनिक अभियानों और नागरिक मोर्चों के धरनों में भी उनकी सहभागिता रही। 2 अक्टूबर के दिन उन्होंने अपने संगठन के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को जुटाकर जंतर मंतर पर एक अलग शक्ति प्रदर्शन किया, जहां जोरदार नारेबाजी और प्रदर्शन देखने को मिला।
इसी तरह 12 अक्टूबर को निकाले गए एक विरोध मार्च के दौरान भी ऐसा ही नजारा दिखा। जब विपक्षी नेता एक ट्रक पर सवार होकर आगे बढ़ रहे थे, उस समय समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव भीड़ के बीच से आइसा का झंडा मंगवाकर उन्हें थमाते हुए देखे गए थे। प्रमुख विपक्षी हस्तियों की तरफ से मिल रहे इस खुले समर्थन के चलते वह इंटरनेट मीडिया और मुख्यधारा के समाचार माध्यमों में तेजी से चर्चा का विषय बन गईं।
पड़ोसी मुल्क के घटनाक्रम पर दिए बयान से उपजा विवाद
विपक्षी मंचों पर लगातार मिल रही तवज्जो के बीच 15 अक्टूबर को एक वीडियो सार्वजनिक हुआ, जिसने पूरे मामले को एक संवेदनशील मोड़ दे दिया। इस क्लिप में छात्र नेता यह कहती सुनाई दीं कि पड़ोसी मुल्क में हाल के महीनों में हुए उग्र जनआंदोलन और सत्ता परिवर्तन से उन्हें देश के भीतर भी विरोध प्रदर्शन करने की प्रेरणा मिली है। उनका तर्क था कि वहां लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली के मकसद से व्यापक आंदोलन हुआ था और उसी तर्ज पर वह यहां भी जनदबाव बनाने का प्रयास कर रही हैं।
इस बयान के सामने आते ही डिजिटल मंचों पर तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गईं। कई उपयोगकर्ताओं ने यह सवाल उठाया कि पड़ोसी मुल्क में शेख हसीना की अगुवाई वाली चुनी हुई सरकार के हटने के बाद जो हालात बने, भारी उथल-पुथल मची, उद्योग धंधे प्रभावित हुए और अल्पसंख्यक आबादी पर हमले हुए, क्या वैसी अराजक स्थितियों को किसी भी रूप में आदर्श माना जा सकता है। आलोचकों का कहना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया वाले देश में ऐसी उग्र घटनाओं की तुलना करना बेहद गैर-जिम्मेदाराना है।
संगठन की मूल पार्टी और उसका ऐतिहासिक सफर
छात्र संगठन आइसा की वैचारिक जड़ें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन से जुड़ी हैं, जिसे राजनीतिक हलकों में संक्षेप में भाकपा माले कहा जाता है। इस वामपंथी दल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो इसका उभार साठ के दशक के अंतिम वर्षों में हुआ था। वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी इलाके में चारू मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संताल ने मिलकर एक हिंसक कृषि आंदोलन की नींव रखी थी।
नक्सली विचार के प्रसार के बाद 22 अप्रैल 1969 को औपचारिक तौर पर इस दल की स्थापना की गई थी। शुरुआती दशकों में इस विचारधारा ने व्यवस्था परिवर्तन के लिए सशस्त्र रास्ते और बल प्रयोग को प्राथमिकता दी। उस दौर में बिहार, तत्कालीन एकीकृत आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कई अंचलों में जमींदारों और पूंजीपतियों को निशाना बनाकर हिंसक कार्रवाइयां, हत्याएं और लूट की घटनाएं अंजाम दी गईं। बाद के वर्षों में कामरेड विनोद मिश्रा के नेतृत्व में यह भूमिगत संगठन धीरे-धीरे संसदीय राजनीति और चुनावी प्रणाली की मुख्यधारा में शामिल हुआ।
वर्तमान राजनीतिक समीकरण और चुनावी उपस्थिति
समय के साथ यह दल चुनावी राजनीति का हिस्सा बन गया और उसने संसदीय लोकतंत्र में अपनी जगह बनाई। मौजूदा दौर में भाकपा माले की कमान पार्टी के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य के हाथों में है, जिनका संबंध बिहार से है। संगठन का प्रभाव मुख्य रूप से बिहार और झारखंड के कुछ खास जिलों तक सीमित माना जाता है।
संसदीय राजनीति में कदम रखने के बाद पार्टी ने गठबंधन की राह चुनी। वर्तमान में यह दल बिहार के महागठबंधन और राष्ट्रीय स्तर पर बने विपक्षी गठबंधन का एक सक्रिय घटक है। पार्टी के आधिकारिक प्रचार माध्यमों और वेबसाइट पर भी युवा छात्र नेता की पुलिस के सामने संघर्ष करती तस्वीर को प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया है। दूसरी तरफ सरकार के स्तर पर गृहमंत्री अमित शाह के कार्यकाल में एक तय समयसीमा तय कर वामपंथी उग्रवाद और नक्सली हिंसा पर कड़ा प्रहार किए जाने की बात कही जाती रही है। ऐसे में छात्र संगठन के ताजा बयानों ने एक बार फिर वामपंथी राजनीति के इतिहास और उसकी मौजूदा रणनीति पर बहस छेड़ दी है।


















