हिंदी सिनेमा के पर्दे पर जब भी बेमिसाल अभिनय, खूबसूरती और रहस्यमयी आकर्षण की बात होती है, अभिनेत्री रेखा का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। 10 अक्टूबर को वह अपना 72वां जन्मदिन मना रही हैं। अपने लंबे और उल्लेखनीय करियर के दौरान उन्होंने ऐसी भूमिकाएं चुनीं, जिन्होंने रूढ़िवादी बंधनों को तोड़ा और पर्दे पर नारी चरित्रों को नए मायने दिए। एक दर्दभरी जिंदगी जीने वाली शायरा से लेकर पति के धोखे का खूनी बदला लेने वाली पत्नी तक, रेखा ने हर किरदार को अपनी अदाकारी से अविस्मरणीय बना दिया। जन्मदिन के इस खास पड़ाव पर उनके फिल्मी सफर के उन सात ऐतिहासिक किरदारों को याद करना लाजिमी है, जिन्होंने उन्हें सिनेमा का लीजेंड बना दिया।
उमराव जान (1981): जब नजाकत और दर्द ने रचा इतिहास
मुजफ्फर अली के निर्देशन में बनी पीरियड ड्रामा फिल्म उमराव जान रेखा के अभिनय करियर का सबसे बड़ा मील का पत्थर मानी जाती है। इसमें उन्होंने लखनऊ की प्रसिद्ध तवायफ और शायरा का किरदार परदे पर साकार किया था। इस भूमिका में उन्होंने जिस नजाकत, कत्थक नृत्य और आंखों की भाषा से अपनी प्रस्तुति दी, उसने पूरे देश को मंत्रमुग्ध कर दिया। फिल्म के गीतों और उनकी शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुतियों ने सिनेमा के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया। इस दिल को छू लेने वाले सशक्त अभिनय के लिए रेखा को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल हुआ था।
खूबसूरत (1980): चुलबुले अंदाज ने तोड़ी घर की दीवारें
ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में आई पारिवारिक कॉमेडी फिल्म खूबसूरत में दर्शकों को रेखा का बिल्कुल अलग और ऊर्जावान रूप देखने को मिला। कहानी में उन्होंने मंजू दयाल नाम की एक ऐसी अल्हड़ और जिंदादिल युवती की भूमिका निभाई, जो सख्त कायदे-कानूनों और बेमतलब की पाबंदियों वाले घर में खुशियों के रंग भर देती है। हर पल मस्ती के मूड में रहने वाली मंजू के रूप में रेखा की स्क्रीन प्रेजेंस बेहद ताजगी भरी थी। उनके इस जीवंत अभिनय ने न सिर्फ दर्शकों का दिल जीता, बल्कि उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फिल्मफेयर पुरस्कार से भी नवाजा गया।
खून भरी मांग (1988): मासूम आरती से लेडी एवेंजर बनने का सफर
राकेश रोशन के निर्देशन में तैयार रिवेंज ड्रामा फिल्म खून भरी मांग में रेखा का कायापलट देख दर्शक दंग रह गए थे। कहानी में वह पहले आरती नाम की एक बेहद सीधी-सादी और भोली महिला के रूप में सामने आती हैं, जिसे उसका धोखेबाज पति बेरहमी से मौत के मुंह में धकेल देता है। इसके बाद मगरमच्छ के हमले से बचकर वह एक आधुनिक और आत्मविश्वासी रूप में वापसी करती हैं और अपने खिलाफ हुए अन्याय का बदला लेती हैं। घरेलू महिला से बदले की आग में जलती लेडी एवेंजर बनने का यह जटिल रूपांतरण रेखा ने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से निभाया था, जिसके लिए उन्हें एक बार फिर फिल्मफेयर पुरस्कार प्रदान किया गया।
घर (1978): संवेदनशील हादसे के बाद रिश्तों की परीक्षा
दिनेश ठाकुर की लिखी और माणिक चटर्जी निर्देशित फिल्म घर में रेखा ने एक गंभीर और भावनात्मक किरदार को पर्दे पर उतारा। इस फिल्म में वह एक ऐसी नवविवाहिता की भूमिका में थीं, जिसकी शांत जिंदगी एक दर्दनाक आपराधिक हादसे के बाद बिखर जाती है। कहानी इस बात पर केंद्रित है कि कैसे वह इस गहरे सदमे से खुद को उबारती हैं और पति के साथ अपने बिखरते रिश्ते को संभालती हैं। रेखा ने बिना किसी अतिनाटकीयता के बेहद स्वाभाविक और संतुलित भावों के साथ इस संवेदनशील दर्द को पर्दे पर दिखाया, जिसकी आलोचकों ने जमकर सराहना की।
सिलसिला (1981): चांदनी का अमर प्रेम और वैवाहिक उलझनें
यश चोपड़ा की क्लासिक रोमांटिक ड्रामा फिल्म सिलसिला में रेखा ने चांदनी का किरदार निभाया था। कहानी में उनका दिल अमित के किरदार में नजर आए अमिताभ बच्चन से जुड़ता है, लेकिन हालात दोनों को अलग राहों पर ले जाते हैं। फिल्म में विवाह, सामाजिक जिम्मेदारियों और अधूरी मोहब्बत की कशमकश को बहुत संजीदगी से दिखाया गया था। चांदनी के रूप में रेखा की सादगी, नफासत और लुभावनी खूबसूरती ने पर्दे पर ऐसा प्रभाव छोड़ा कि आज भी दर्शक उनके उस खास लुक और किरदार को याद करते हैं।
मुकद्दर का सिकंदर (1978): जोहरा बाई का अधूरा मगर अमर प्यार
प्रकाश मेहरा की ब्लॉकबस्टर फिल्म मुकद्दर का सिकंदर में रेखा ने जोहरा बाई नाम की तवायफ का यादगार रोल निभाया था। वह सिकंदर यानी अमिताभ बच्चन से बेपनाह प्यार करती है, लेकिन इस प्रेम की नियति में केवल अधूरापन ही लिखा होता है। रेखा ने जोहरा बाई के दर्द, समर्पण और गरिमा को जिस खूबसूरती से पर्दे पर पेश किया, उसने एक सहायक भूमिका होने के बावजूद पूरे कथानक में जान फूंक दी। सत्तर के दशक की यह उनके करियर की सबसे यादगार परफॉर्मेंस में गिनी जाती है।
उत्सव (1984): वसंतसेना का साहसी और बोल्ड अवतार
गिरीश कर्नाड द्वारा निर्देशित फिल्म उत्सव में रेखा ने वसंतसेना का अत्यंत साहसी और ग्लैमरस किरदार निभाया था। यह फिल्म संस्कृत के प्राचीन नाटक पर आधारित थी, जिसमें वह एक स्वतंत्र, आत्मविश्वासी और बेहद आकर्षक महिला के रूप में नजर आईं। उस दौर के पारंपरिक सिनेमा के बीच ऐसे बोल्ड और लीक से हटकर किरदार का चयन करके रेखा ने साफ कर दिया था कि वह रचनात्मक जोखिम उठाने से कभी पीछे नहीं हटतीं।



















