स्मार्टफोन और इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव के बीच नई पीढ़ी की परवरिश माता-पिता के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक और धर्म गुरु श्री श्री रविशंकर ने एक प्रवचन के दौरान स्पष्ट किया कि डिजिटल युग में सही परवरिश का अर्थ केवल बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर निगरानी रखना नहीं है, बल्कि उन्हें भीतर से भावनात्मक रूप से मजबूत बनाना भी है। बच्चों को तकनीक के खतरों से सुरक्षित रखते हुए उनके सर्वांगीण विकास के लिए कई बुनियादी बातों पर अमल करना जरूरी हो जाता है।
स्क्रीन पर बिताए जाने वाले समय का दायरा तय करें
अभिभावकों को बच्चों के मोबाइल फोन और टेलीविजन देखने के दैनिक घंटों की एक स्पष्ट सीमा निर्धारित करनी चाहिए। शिक्षा और मनोरंजन के बीच एक स्वस्थ संतुलन बनाए रखना बेहद आवश्यक है। इसके साथ ही बच्चों को घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर मैदान में खेलने और परिजनों के साथ गुणवत्तापूर्ण वक्त बिताने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। जब बच्चे को शुरुआत से ही यह पता रहता है कि उसे गैजेट्स केवल एक सीमित अवधि के लिए ही मिलेंगे, तो वह अतिरिक्त स्क्रीन टाइम के लिए अनावश्यक जिद करने से बचता है।
पर्याप्त नींद और शारीरिक तंदुरुस्ती पर विशेष ध्यान
लगातार स्क्रीन से चिपके रहने के कारण बच्चों के सोने के चक्र और उनकी शारीरिक सक्रियता पर गंभीर असर पड़ता है। बिस्तर पर जाने से ठीक पहले मोबाइल स्क्रीन से दूरी बनाना बहुत आवश्यक है। इसके साथ ही बच्चों में रोजाना मैदानी खेल खेलने की आदत विकसित करनी चाहिए। दिनभर खेलने-कूदने से होने वाली स्वाभाविक शारीरिक थकान बच्चों को रात में समय पर गहरी और आरामदायक नींद दिलाने में मदद करती है, जो उनके शारीरिक और मानसिक विकास के लिए अनिवार्य है।
इंटरनेट की दुनिया में सतर्कता और सुरक्षा के नियम
आज के परिवेश में बच्चों को साइबर दुनिया के जोखिमों के प्रति जागरूक करना अनिवार्य है। उन्हें समझाएं कि इंटरनेट पर अजनबी व्यक्तियों से बातचीत करने से बचें, अपनी निजी जानकारियां किसी से साझा न करें और साइबर बुलिंग जैसी समस्याओं को पहचानें। बच्चों के मन में यह विश्वास पैदा करना जरूरी है कि यदि वे ऑनलाइन माध्यम पर किसी भी तरह की असहज स्थिति या परेशानी का सामना करते हैं, तो वे बिना किसी झिझक या डर के अपने माता-पिता से खुलकर साझा कर सकते हैं।
समस्याओं से जूझने का अवसर देकर बनाएं आत्मनिर्भर
माता-पिता को बच्चों की हर छोटी-बड़ी मुश्किल का समाधान खुद आगे बढ़कर तुरंत नहीं निकाल देना चाहिए। बच्चों को अपने स्तर की दैनिक चुनौतियों और उलझनों का सामना स्वयं करने की छूट दी जानी चाहिए। ऐसा करने से वे परिस्थितियों का विश्लेषण करना सीखते हैं, खुद निर्णय लेने के काबिल बनते हैं और किसी असफलता के बाद दोबारा संभलने का व्यावहारिक सबक हासिल करते हैं।
तनाव प्रबंधन के लिए योग और ध्यान का अभ्यास
कम उम्र से ही बच्चों को उनकी आयु के अनुकूल योग, गहरी सांस लेने की क्रियाओं और ध्यान के अभ्यास से जोड़ना चाहिए। ध्यान और प्राणायाम जैसी मानसिक एकाग्रता बढ़ाने वाली गतिविधियां बच्चों के मन को शांत रखने, उनकी चंचलता को संतुलित करने और भविष्य में पढ़ाई या जीवन के तनाव को सहजता से संभालने में गहरी मदद करती हैं।
अभिभावक खुद आचरण से प्रस्तुत करें सही मिसाल
यदि माता-पिता खुद हर समय स्मार्टफोन में उलझे रहेंगे, तो बच्चे भी अनजाने में उसी आदत को अपनाएंगे। इसलिए बड़ों को खुद एक सकारात्मक उदाहरण पेश करना चाहिए। परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ बैठकर भोजन करना चाहिए, आपस में संवाद बढ़ाना चाहिए और बच्चों के साथ खेलकूद के लिए नियमित समय निकालना चाहिए। वर्तमान डिजिटल परिवेश में बच्चों को गैजेट्स से पूरी तरह अलग-थलग करने के बजाय तकनीक का सही और संतुलित इस्तेमाल सिखाना ही समझदारी है। खुला पारिवारिक संवाद और भावनात्मक सुरक्षा ही बच्चों को एक संतुलित जीवन की ओर ले जाती है।



















