हिंदी सिनेमा में अपनी पहली ही दस्तक से पहचान बनाने वाले कई चेहरे आते हैं, परंतु आयुष्मान खुराना ने अपने करियर की शुरुआत के लिए जो रास्ता चुना वह पारंपरिक ढर्रे से बिल्कुल भिन्न था। सिनेमाई पर्दे पर कदम रखते समय उन्होंने ऐसे साहसी विषयों और किरदारों को गले लगाया, जिनसे बड़े-बड़े स्थापित सितारे भी आमतौर पर झिझकते थे। इसी अनूठे नजरिए के चलते वह बेहद कम समय में उन चुनिंदा कलाकारों की जमात में शामिल हो गए, जिनकी नई परियोजनाओं का दर्शक पूरे उत्साह से इंतजार करते हैं। आज उनके जन्मदिन के अवसर पर उनकी उस यात्रा का विश्लेषण प्रासंगिक हो जाता है, जिसने केवल 6 साल की अवधि में उन्हें बॉलीवुड के शीर्ष कलाकारों की कतार में ला खड़ा किया।
लीक से हटकर विक्की डोनर के साथ धमाकेदार शुरुआत
साल 2012 में आयुष्मान खुराना ने फिल्म ‘विक्की डोनर’ के जरिए बड़े पर्दे पर अपना पहला कदम रखा था। उस दौर के मुख्यधारा के सिनेमा के हिसाब से यह कथावस्तु बेहद अनोखी और साहसिक मानी गई थी। इस कहानी में आयुष्मान ने विक्की नाम के एक ऐसे युवक की भूमिका निभाई थी जो स्पर्म डोनेशन का काम करता है। अपने करियर के पहले ही प्रोजेक्ट में इस तरह का संवेदनशील विषय चुनकर उन्होंने यह संदेश साफ कर दिया कि वह बॉलीवुड की तयशुदा लीक पर चलने के बजाय नए विषयों को प्राथमिकता देने आए हैं।
‘विक्की डोनर’ को सिनेमाघरों में दर्शकों का भरपूर समर्थन मिला और आयुष्मान के स्वाभाविक अभिनय को आलोचकों ने भी सराहा। इस शानदार आगाज ने फिल्म जगत में उनके लिए आगे के रास्ते पूरी तरह खोल दिए। अपनी पहली सफलता के बाद भी उन्होंने कभी सुरक्षित रास्ते नहीं चुने, बल्कि लगातार जटिल और गैर-पारंपरिक पटकथाओं को चुनते रहे।
आम जिंदगी की मुश्किलों और सामाजिक मुद्दों से गहरा जुड़ाव
अपने शुरुआती दौर को आगे बढ़ाते हुए आयुष्मान ने ‘दम लगा के हईशा’, ‘बरेली की बर्फी’ और ‘शुभ मंगल सावधान’ जैसी महत्वपूर्ण फिल्मों में काम किया। इन सभी कहानियों में आम इंसानों का रोजमर्रा का जीवन, उनकी वास्तविक परेशानियां और सामाजिक रूढ़ियों से जुड़े अहम पहलू खुलकर सामने आए। उन्होंने कभी भी खुद को केवल एक ग्लैमरस हीरो के ढांचे में ढालने की कोशिश नहीं की।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह साबित हुई कि उन्होंने सिर्फ स्टारडम हासिल करने की होड़ में फिल्में साइन नहीं कीं, बल्कि ऐसे विचारोत्तेजक प्रोजेक्ट्स का हिस्सा बने जो हंसी-मजाक के साथ दर्शकों को सोचने पर भी मजबूर करते थे। उनकी सिनेमाई शैली में कॉमेडी के साथ-साथ समाज के अनकहे मुद्दों का बहुत गहरा और स्वाभाविक तालमेल देखने को मिला, जिससे वह पारिवारिक दर्शकों के भी चहेते बन गए।
2018 का ऐतिहासिक टर्निंग प्वाइंट और दोहरी सफलता
साल 2018 उनके फिल्मी सफर का सबसे बड़ा मील का पत्थर बनकर उभरा, जब एक ही वर्ष में ‘अंधाधुन’ और ‘बधाई हो’ ने सिनेमाघरों में दस्तक दी। इन दोनों प्रोजेक्ट्स ने बॉक्स ऑफिस पर जोरदार प्रदर्शन कर हर किसी को चौंका दिया। इन कृतियों ने न सिर्फ आयुष्मान के अभिनय कौशल को नई ऊंचाई दी, बल्कि यह भी स्थापित कर दिया कि वह अपने बलबूते पूरी फिल्म को खींचने का माद्दा रखते हैं।
2012 में करियर शुरू करने के बाद ठीक 6 वर्ष के भीतर उन्होंने इन दोनों अलग मिजाज की प्रस्तुतियों के दम पर अपनी स्थिति बेहद मजबूत कर ली। जहां एक तरफ ‘अंधाधुन’ एक थ्रिलर शैली की जटिल कहानी थी, वहीं ‘बधाई हो’ पारिवारिक पृष्ठभूमि पर आधारित एक अनूठे सामाजिक विषय को छूती थी। दोनों फिल्मों के कथानक एक-दूसरे से पूरी तरह जुदा थे, लेकिन आयुष्मान ने दोनों में ही अपने संतुलित अभिनय की अमिट छाप छोड़ी।
कंटेंट और अभिनय के दम पर बनाया अपना मुकाम
आयुष्मान का अब तक का सफर इस तथ्य को मजबूती से रेखांकित करता है कि फिल्म उद्योग में केवल विशाल बजट या बड़े सितारों का नाम ही सफलता तय नहीं करता। यदि कहानी में दम हो और अभिनेता अपने किरदार को पूरी ईमानदारी से जिए, तो दर्शक उस प्रयास को सिर-आंखों पर बिठाते हैं। उन्होंने अपने पूरे सफर में इसी सोच को आधार बनाया और यही वजह है कि आज वह भारतीय सिनेमा के सबसे भरोसेमंद और मौलिक कलाकारों में गिने जाते हैं।
जन्मदिन के इस खास मौके पर उनकी जीवनसंगिनी, लेखिका और फिल्ममेकर ताहिरा कश्यप ने अपने पति के लिए एक बेहद आत्मीय संदेश साझा किया। उन्होंने अपने शुरुआती दिनों की यादें ताजा करते हुए दोनों के साथ बिताए पुराने पलों को दोहराया। ताहिरा ने अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल पर अपने कोर्टशिप के दिनों की एक खूबसूरत थ्रोबैक तस्वीर पोस्ट कर इस दिन को और खास बना दिया।















