भारतीय सिनेमा के इतिहास में 1980 का दशक एक ऐसे बदलाव का गवाह बना, जिसने बॉक्स ऑफिस पर एक्शन विधा की एक नई परिभाषा लिखी। जब बुलंद आवाज और 'ढाई किलो के हाथ' वाले एक युवा अभिनेता ने फिल्म जगत में कदम रखा, तो दर्शकों को मास एक्शन का नया नायक मिला। अभिनेता सनी देओल ने अपनी शुरुआती यात्रा में एक से बढ़कर एक बेहतरीन फिल्में पेश कीं। दिलचस्प बात यह है कि अंग्रेजी वर्णमाला के पहले चार अक्षरों A, B, C और D से शुरू होने वाली उनकी चार कालजयी फिल्मों ने उस दौर में सिनेमाघरों में ऐसा तहलका मचाया कि वे बॉलीवुड के सबसे भरोसेमंद एक्शन स्टार बनकर उभरे। इन चार फिल्मों के माध्यम से जानते हैं कि किस तरह उन्होंने सफलता का नया इतिहास रचा।
B: बेताब (1983) से हुई ब्लॉकबस्टर शुरुआत
सनी देओल के फिल्मी करियर का आगाज साल 1983 में रिलीज हुई फिल्म 'बेताब' से हुआ था। निर्देशक राहुल रवैल के मार्गदर्शन में बनी इस लव स्टोरी से अमृता सिंह ने भी अपने अभिनय सफर की शुरुआत की थी। फिल्म की पटकथा अमीर और गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले दो युवाओं के बीच पनपते प्रेम पर आधारित थी, जिसे दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया। महान पटकथा लेखक जावेद अख्तर की संवाद शैली और संगीतकार राहुल देव बर्मन (आरडी बर्मन) के सदाबहार गीतों, जैसे 'जब हम जवान होंगे', ने युवाओं के बीच एक जबरदस्त दीवानगी पैदा कर दी थी। यह फिल्म 1983 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों की सूची में शीर्ष पर रही और इसने सनी देओल को अपनी पहली ही फिल्म से ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर स्टार के रूप में स्थापित कर दिया।
A: अर्जुन (1985) ने गढ़ी एंग्री यंग मैन और मास एक्शन हीरो की छवि
'बेताब' की ऐतिहासिक सफलता के दो साल बाद, 1985 में सनी देओल की फिल्म 'अर्जुन' सिनेमाघरों में आई। एक बार फिर निर्देशक राहुल रवैल के साथ उनकी जोड़ी ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाया। इस एक्शन-ड्रामा फिल्म ने सनी देओल की छवि को एक सीधे-सादे रोमांटिक नायक से बदलकर एक बेहद आक्रामक और जुझारू युवा के रूप में पेश किया। फिल्म में उन्होंने अर्जुन मालवणकर नाम के एक ऐसे किरदार को जीवंत किया, जो बेरोजगारी, सामाजिक अन्याय और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद करता है। 'अर्जुन' न केवल 1985 की सबसे बड़ी व्यावसायिक सफलता साबित हुई, बल्कि इसने भारतीय सिनेमा में यथार्थवादी एक्शन फिल्मों के लिए एक नया मानक भी तय किया।
D: डकैत (1987) में चंबल के बैकग्राउंड पर संजीदा परफॉर्मेंस
साल 1987 में प्रदर्शित हुई फिल्म 'डकैत' को सनी देओल के करियर की सबसे गंभीर और यथार्थवादी एक्शन फिल्मों में गिना जाता है। इस प्रोजेक्ट में भी उन्होंने निर्देशक राहुल रवैल के साथ मिलकर काम किया। चंबल के बीहड़ों की पृष्ठभूमि पर आधारित यह कहानी अर्जुन यादव नाम के एक साधारण ग्रामीण युवक के इर्द-गिर्द घूमती है। सिस्टम की बेरहमी, पुलिस के अत्याचार और सामंती जुल्म के कारण अर्जुन यादव को हथियार उठाने और कानून के खिलाफ बगावत करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। फिल्म में सनी देओल के तीव्र अभिनय और आक्रामक तेवरों ने दर्शकों को चकित कर दिया था। 1987 की यह सफल फिल्म उनके करियर में एक मील का पत्थर साबित हुई और इसने उनकी एक्शन छवि को और अधिक मजबूती प्रदान की।
C: चालबाज (1989) में एक्शन, कॉमेडी और स्टार पावर का तड़का
निर्देशक पंकज पराशर की 1989 में आई फिल्म 'चालबाज' हिंदी सिनेमा की कालजयी कॉमेडी-एक्शन फिल्मों में शामिल है। हालांकि इस फिल्म की कहानी मुख्य रूप से अभिनेत्री श्रीदेवी के दोहरे किरदार पर केंद्रित थी, लेकिन सूरज के रूप में सनी देओल की स्क्रीन प्रेजेंस, कॉमिक टाइमिंग और अनोखे अंदाज ने दर्शकों का दिल जीत लिया। पर्दे पर रजनीकांत और सनी देओल की जोड़ी ने एक अलग ही उत्साह पैदा किया था। सनी देओल ने इस फिल्म में अपनी स्थापित एक्शन छवि के साथ हल्की-फुल्की कॉमेडी और रोमांस का ऐसा बेहतरीन तालमेल दिखाया कि उन्होंने हर प्रकार के अभिनय में अपनी निपुणता साबित कर दी। साल 1989 के अंत में रिलीज हुई इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कमाई के नए कीर्तिमान स्थापित किए थे।
80 के दशक में 'ढाई किलो के हाथ' की बादशाहत और ए-टू-जेड स्टारडम
1983 की 'बेताब', 1985 की 'अर्जुन', 1987 की 'डकैत' और 1989 की 'चालबाज'... ये केवल संयोग मात्र नहीं है कि ये चार ब्लॉकबस्टर फिल्में अंग्रेजी के शुरुआती अक्षरों A, B, C और D से शुरू होती हैं। असल में यह 1980 के दशक में सिनेमा के पर्दे पर सनी देओल के एकतरफा दबदबे का जीवंत प्रमाण हैं। इन फिल्मों ने यह सुनिश्चित किया कि जब भी बड़े पर्दे पर उनका आगमन होता था, थिएटर दर्शकों की तालियों और सीटियों से गूंज उठते थे। वर्णमाला के A से लेकर D तक का यह स्वर्णिम सफर आज भी बॉलीवुड के इतिहास में एक सुपरस्टार के सबसे सफल दौर के रूप में याद किया जाता है।



















