वर्तमान समय में शैक्षणिक संस्थानों के भीतर शिक्षकों, छात्रों और प्रशासन के बीच संबंध गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। राजनीतिक ध्रुवीकरण, पाठ्यक्रम को लेकर होने वाले विवाद, समावेशी शिक्षा पर बहस और सोशल-इमोशनल लर्निंग (SEL) को लेकर उठते सवालों ने कक्षाओं के माहौल को काफी जटिल बना दिया है। इसके साथ ही, महामारी के बाद छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा असर और उनके बदलते व्यवहार ने स्थिति को और नाजुक कर दिया है। इन तमाम दबावों के बीच, कई शिक्षक और शिक्षाविद अब दंडात्मक रास्तों के बजाय मानवीय संबंधों को शिक्षा का केंद्र बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। शोध से पता चलता है कि कक्षाओं में अपनापन, प्रभावी संवाद, संघर्ष समाधान और भावनाओं के संतुलन को प्राथमिकता देकर स्कूलों के माहौल को सकारात्मक बनाया जा रहा है।
सुधार से पहले जुड़ाव: कक्षाओं में अपनेपन की भावना जगाना
एक प्राथमिक स्कूल में 5वीं कक्षा की शिक्षिका सारा ने देखा कि गणित के टेस्ट वाले दिन उनकी छात्रा मेव अक्सर असहज हो जाती थी। टेस्ट शुरू होने से ठीक पहले मेव सहपाठियों को परेशान करने लगी, कागजों को मोड़ने लगी और अजीब टिप्पणी करने लगी। ऐसे समय में शिक्षिका के पास दो विकल्प थे या तो वे तुरंत उसके व्यवहार पर कड़ी सजा देतीं या पहले उससे बात करके उसकी बात समझतीं। शिक्षिका ने सजा के बजाय जुड़ाव का रास्ता चुना।
सारा ने मेव को अलग ले जाकर उसकी घबराहट के बारे में पूछा। मेव ने स्वीकार किया कि उसे परीक्षा में असफल होने का डर सता रहा था। शिक्षिका ने उसकी बात को ध्यान से सुना और ढांढस बंधाते हुए बताया कि गलतियां सीखना का ही हिस्सा हैं और खुद उन्हें भी कभी-कभी टेस्ट से डर लगता है। जब छात्रा को लगा कि उसकी बात सुनी जा रही है, तो वह शांत हो गई। इसके बाद ही शिक्षिका ने उसके पहले के व्यवहार पर बात की।
लगभग 100 शिक्षकों पर किए गए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि शिक्षक अब कक्षाओं में छात्रों का स्वागत मुस्कुराकर व्यक्तिगत रूप से करते हैं, उनकी भावनाओं को स्वीकारते हैं और अपने जीवन की कहानियां साझा करते हैं। केवल यह कहना कि "मैं समझ सकता हूं कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं" छात्रों और शिक्षकों के बीच एक मजबूत पुल बना सकता है। जब छात्र तनाव में होते हैं, तो वे अपनी जगह को लेकर संशय महसूस करते हैं। अपनेपन में अनिश्चितता के कारण छात्र सामान्य कार्यों को भी कठिन मानने लगते हैं। सुधार से पहले जुड़ाव बनाने से छात्रों को अपनी समस्याएं अस्थायी और हल करने योग्य लगने लगती हैं।
छात्रों की आवाज को सशक्त बनाना और सम्मानजनक चर्चा
जून 2020 में जॉर्ज फ्लॉयड की दुखद घटना के बाद, एक सबअर्बन हाई स्कूल के कई पूर्व छात्रों ने अपने स्कूल के पाठ्यक्रम कार्यालय से संपर्क किया। कॉलेज में दाखिला लेने के बाद इन छात्रों ने महसूस किया कि वे नस्ल और सामाजिक मुद्दों पर होने वाली गंभीर चर्चाओं में भाग लेने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे। जब यह फीडबैक सामाजिक अध्ययन और अंग्रेजी भाषा कला (ELA) के शिक्षकों तक पहुंचा, तो वे शुरुआत में थोड़ा चिंतित हुए। शिक्षकों को डर था कि विवादित मुद्दों पर बात करने से कक्षाओं में असहज स्थिति पैदा हो सकती है।
शोध दर्शाता है कि कक्षाओं में छात्रों को बोलने का अवसर देने के लिए शिक्षकों को संरचित माहौल तैयार करने के विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। शिक्षकों ने साक्ष्य-आधारित तरीकों का उपयोग करते हुए चर्चा का माहौल तैयार किया
- कक्षा के नियम मिलकर बनाना: छात्र खुद चर्चा के दौरान व्यवहार और बातचीत के नियम तय करते हैं।
- सभ्य संवाद का ढांचा तैयार करना: यस-नो-मेबी जैसी तकनीकों के माध्यम से छात्रों को अपनी राय रखने और दूसरों के विचारों को ध्यान से सुनने का अभ्यास कराया जाता है।
- श्रोता के अनुसार बात करना: छात्र यह सीखते हैं कि सहपाठियों, शिक्षकों या समाज के अन्य लोगों के सामने अपनी बात किस तरह प्रस्तुत करनी है।
सॉक्रेटिक सेमिनार और छात्र-नेतृत्व वाली बैठकों जैसे मंच छात्रों को बिना किसी डर के अपने बौद्धिक और भावनात्मक विचार साझा करने का सुरक्षित अवसर प्रदान करते हैं।
सह-नियमन: भावनात्मक संतुलन और व्यवहार प्रबंधन का आधार
मिडिल स्कूल की बीजगणित कक्षा में सहपाठियों से बहस के बाद एक छात्र काउंसलर के कमरे में पहुंचा। वह तेज सांसें ले रहा था और उसके कंधे तने हुए थे। काउंसलर ने उस पर सवालों की बौछार करने या कड़े नियम बताने के बजाय शांत आवाज में उससे कहा कि वह परेशान दिख रहा है और दोनों मिलकर गहरी सांसें लेते हैं। जब छात्र की सांसें सामान्य हुईं और उसका शरीर शांत हुआ, तब काउंसलर ने खुले प्रश्न पूछकर उसे पूरी घटना पर विचार करने और सहपाठी के साथ मामला सुलझाने की योजना बनाने में मदद की।
स्व-नियमन (Self-regulation) की क्षमता विकसित करने के लिए सह-नियमन (Co-regulation) की प्रक्रिया बहुत आवश्यक है। जब कोई बच्चा अत्यधिक तनाव में होता है, तो उसका तंत्रिका तंत्र "फाइट या फ्लाइट" मोड में चला जाता है। मनोचिकित्सक डॉ. ब्रूस पेरी के 3 R सिद्धांत के अनुसार
- रेगुलेट (Regulate): गहरी सांस लेने या शारीरिक गतिविधियों के जरिए छात्र को शांत स्थिति में लाना।
- रिलेट (Relate): सहानुभूति और सक्रिय सुनने के माध्यम से छात्र से जुड़ाव बनाना।
- रीजन (Reason): शांत होने के बाद छात्र को तर्क करने और समस्या का समाधान खोजने के लिए प्रेरित करना।
मस्तिष्क विज्ञान के अनुसार, जब तक दिमाग का निचला हिस्सा शांत नहीं होता, तब तक सोचने-समझने वाला ऊपरी हिस्सा सही तरीके से काम नहीं कर सकता।
दंडात्मक कार्रवाई की जगह पुनर्स्थापनात्मक प्रक्रियाएं
7वीं कक्षा की सामाजिक अध्ययन कक्षा में एक ग्रुप प्रोजेक्ट के दौरान दो छात्राओं में बहस हो गई। एक छात्रा ने अपना लैपटॉप बंद करते हुए कहा कि वह हार मानती है क्योंकि सब कुछ दूसरी छात्रा के हिसाब से ही होता है। शिक्षिका ने उन्हें सीधे मुख्य कार्यालय भेजने के बजाय गलियारे में ले जाकर पुनर्स्थापनात्मक बातचीत की।
शिक्षिका ने दोनों की बात सुनी और उनसे पूछा कि उनके इस व्यवहार से किसे नुकसान पहुंचा है और स्थिति को सुधारने के लिए वे क्या कर सकती हैं। महज 5 मिनट की बातचीत के भीतर, दोनों छात्राओं ने अपने सहपाठियों से माफी मांगने और समूह में अपनी जिम्मेदारियां तय करने पर सहमति जताई।
शोध के अनुसार, निलंबन जैसी दंडात्मक कार्रवाइयों से छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है। इसके विपरीत, पुनर्स्थापनात्मक प्रथाओं के इस्तेमाल से स्कूलों में बदमाशी और हिंसा में कमी आती है और छात्रों का अपनी पढ़ाई व स्कूल से जुड़ाव बढ़ता है।
शिक्षकों की भलाई और स्टाफ के लिए सह-नियमन की दिनचर्या
महामारी के दौरान और उसके बाद शिक्षकों पर भावनात्मक दबाव अभूतपूर्व स्तर पर बढ़ गया। एक स्कूल के प्रिंसिपल ने स्टाफ मीटिंग की शुरुआत में एक 3 मिनट की दिनचर्या लागू की, जिसे संरचित स्व-प्रश्न (Structured SELf-Questioning) कहा जाता है। इसमें प्रिंसिपल खुद बोलकर दो सवाल पूछते हैं: "मैं कैसा महसूस कर रहा हूं?" और "खुद को शांत करने के लिए मैं क्या कर सकता हूं?"
इसके बाद शिक्षक इन सवालों को लिखकर आपस में साझा करते हैं और फिर यही प्रक्रिया अपनी कक्षाओं में छात्रों के साथ अपनाते हैं। शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने से न केवल उनकी कार्यक्षमता सुधरती है, बल्कि छात्रों के सीखने का माहौल भी बेहतर होता है।
आधुनिक शिक्षा में मानवीय संबंधों को केंद्र में लाना
आज के समय में स्कूलों के सामने मौजूद चुनौतियां जटिल हैं, लेकिन इनका समाधान कड़े नियमों या केवल प्रशासनिक नीतियों से नहीं निकल सकता। असली बदलाव कक्षाओं में आपसी संबंधों, सहानुभूति और जुड़ाव से शुरू होता है। जब छात्र और शिक्षक महसूस करते हैं कि उन्हें समझा जा रहा है, तो वे सीखने के नए जोखिम लेने के लिए तैयार होते हैं, जिससे पूरे स्कूल का माहौल सकारात्मक बनता है।


















