सिनेमा के इतिहास में कई ऐसी जोड़ियां दर्ज हैं जिनकी केमिस्ट्री दशकों बाद भी दर्शकों के जेहन में ताजा रहती है, और उनमें रेखा तथा अमिताभ बच्चन का नाम सबसे ऊपर आता है। बड़े पर्दे पर दोनों की जोड़ी जितनी सहज और प्रभावशाली नजर आई, असल में इस सफर का आगाज उतना आसान नहीं था। शुरुआती दिनों में जब दोनों ने पहली मर्तबा एक साथ काम करना शुरू किया, तब सेट का माहौल रेखा के लिए बेहद असहज और तनाव भरा साबित हुआ था। दिग्गज अदाकारा ने एक पुराने साक्षात्कार में इस बात का विस्तार से उल्लेख किया था कि महानायक के सामने आते ही वह बुरी तरह नर्वस हो जाती थीं और उनकी मौजूदगी मात्र से भीतर एक अजीब सा खौफ पैदा हो जाता था।
शुरुआती घबराहट और संवाद भूलने का सिलसिला
सेट पर उस घबराहट का असर सीधे तौर पर रेखा के अभिनय पर दिखने लगा था। स्थिति यह बन जाती थी कि सीन शुरू होने से पहले अच्छी तरह रटे हुए संवाद भी कैमरा ऑन होते ही उनके दिमाग से पूरी तरह गायब हो जाते थे। रेखा ने चैट शो 'रेंडेजवस विद सिमी ग्रेवाल' में सिमी ग्रेवाल के साथ बातचीत के दौरान इस पूरे वाकये को साझा किया था। इस दिलचस्प किस्से का जिक्र लेखक यासिर उस्मान ने अपनी चर्चित किताब 'रेखा: द अनटोल्ड स्टोरी' में भी दर्ज किया है। रेखा के मुताबिक, अमिताभ के साथ स्क्रीन शेयर करते वक्त उनके भीतर जो हिचकिचाहट थी, उसने उनके आत्मविश्वास को हिला कर रख दिया था और वह अपनी लाइन्स ठीक से बोल तक नहीं पाती थीं।
'दीवार' का असर और 'दो अनजाने' का सेट
इस नर्वसनेस के पीछे एक बड़ी वजह फिल्म 'दीवार' में अमिताभ बच्चन द्वारा निभाया गया दमदार किरदार था। उस फिल्म को देखने के बाद से ही रेखा के दिल में उनके प्रति बेहद गहरा सम्मान पैदा हो गया था। इसी सम्मान के साथ एक मानसिक दबाव भी आ गया कि उन्हें भी अमिताभ के स्तर की उम्दा अदाकारी दिखानी होगी। साल 1976 में रिलीज हुई फिल्म 'दो अनजाने' वह पहला प्रोजेक्ट था जिसमें दोनों कलाकार पहली बार एक साथ पर्दे पर नजर आए थे। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन ने अमित रॉय का किरदार अदा किया था, जबकि रेखा उनकी ऑनस्क्रीन पत्नी रेखा रॉय की भूमिका में नजर आई थीं। कहानी पति-पत्नी के ऐसे जटिल रिश्ते पर बुनी गई थी जिसमें तीव्र महत्वाकांक्षा, धोखा और बदले की भावना गहराई से शामिल थी।
अमिताभ की वह एक नसीहत जिसने बदल दिया रुख
शूटिंग के दौरान जब रेखा बार-बार अपनी पंक्तियां भूल रही थीं और डायलॉग्स की डिलीवरी में लड़खड़ा रही थीं, तब अमिताभ बच्चन ने उन्हें एक सीधी सलाह दी। सेट पर अभिनेता ने उनसे कहा, ‘सुनिए… जरा डायलॉग याद कर लीजिएगा.’ यह तंज नहीं बल्कि काम के प्रति गंभीरता का वह सबक था जिसने रेखा को झकझोर कर रख दिया। महानायक के इन चुनिंदा शब्दों ने अभिनेत्री के भीतर एक नई लगन पैदा की। इसके बाद उन्होंने खुद की तैयारी, संवाद अदायगी और एक्टिंग स्किल्स पर बेहद संजीदगी से काम करना शुरू किया। अपनी इसी कड़ी मेहनत और अनुशासन के बलबूते रेखा ने फिल्म इंडस्ट्री में अपनी एक बेहद मजबूत और स्वतंत्र पहचान कायम की।
ब्लॉकबस्टर फिल्मों का सफर और 1981 का आखिरी साथ
'दो अनजाने' की उस शुरुआती झिझक के बाद दोनों की ऑनस्क्रीन समझ इतनी मजबूत हुई कि यह जोड़ी दर्शकों की पहली पसंद बन गई। इसके बाद दोनों ने 'खून पसीना', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'मिस्टर नटवरलाल' और 'सुहाग' जैसी कई शानदार फिल्मों में साथ काम किया। विशेष रूप से 'मुकद्दर का सिकंदर' में दोनों की केमिस्ट्री ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचाया और उनके तालमेल को खूब सराहा गया। समय के साथ यह जोड़ी हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम अध्याय का हिस्सा बन गई। दोनों कलाकारों ने आखिरी बार साल 1981 में रिलीज हुई यश चोपड़ा निर्देशित फिल्म 'सिलसिला' में साथ काम किया था। इस फिल्म के बाद रेखा और अमिताभ बच्चन फिर कभी किसी भी फिल्म में एक साथ पर्दे पर नजर नहीं आए।



















