सिनेमाई पर्दे की चमक कई बार कलाकारों के असल जीवन के गहरे अंधेरे को छिपा देती है। 1980 के दौर में अपनी पहचान बनाने वाली दक्षिण भारतीय कलाकार निशा नूर का सफरनामा इसी कड़वे सच की दर्दनाक मिसाल है। एक वक्त पर बड़े परदे पर दिग्गज कलाकारों के साथ अदाकारी करने वाली यह अभिनेत्री बाद के सालों में ऐसे हालात में पहुंच गईं जहां तन्हाई, बीमारी और मुफलिसी ने उनके पूरे जीवन को घेर लिया।
सिनेमाई दुनिया में दस्तक और शुरुआती सफर
निशा नूर का जन्म 18 सितंबर 1962 को तमिलनाडु की धरती पर हुआ था। उनका फिल्मों की तरफ रुख करना किसी सोची-समझी योजना का हिस्सा नहीं था, बल्कि हालात ऐसे बने कि वे इस चकाचौंध का हिस्सा बन गईं। बचपन के दिनों में उनके गांव में फिल्म जगत से ताल्लुक रखने वाले लोगों का आना हुआ, जिनके साथ उनकी मां भी वहां से निकल पड़ीं। हालांकि इस रास्ते पर आगे बढ़ते हुए उन्हें कई तरह के शोषण और कास्टिंग काउच के कड़वे अनुभवों से गुजरना पड़ा। करियर संवारने और काम पाने की जद्दोजहद में उन्हें निर्माताओं के दबाव के आगे समझौते करने पड़े।
प्रमुख फिल्में और बड़े कलाकारों के साथ मौजूदगी
साल 1980 में तमिल सिनेमा की रचना 'मंगला नायगी' से निशा नूर ने अभिनय जगत में अपने सफर का आगाज किया था। इसके बाद उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर तमिल के अलावा मलयालम, तेलुगु और कन्नड़ भाषाओं की फिल्मों में भी पहचान कायम की। कई प्रोजेक्ट्स में सहयोगी किरदार निभाने के बावजूद वे दर्शकों का ध्यान खींचने में कामयाब रहती थीं।
साल 1980 से लेकर 1990 के दशक के दौरान उन्होंने कई यादगार और चर्चित फिल्मों में काम किया। इस दौर में उनकी प्रमुख फिल्मों में शामिल रहीं
- 'टिक टिक टिक' और 'श्री राघवेंद्र' जैसी बड़े बजट की फिल्में
- 'कल्याण अगाथिगल' एवं 'अय्यर द ग्रेट'
- 'देवसुरम' तथा 'अवल सुमंगलितान'
- 'इनिमाई इधो इधो', 'इलमाई कोलम' और 'एनक्कगा कथिरु'
इस दौर में उन्हें रजनीकांत, कमल हासन, मोहनलाल और ममूटी जैसे बड़े सितारों के साथ स्क्रीन साझा करने का मौका मिला, जिससे सिनेमाई गलियारों में उनका नाम चर्चा में बना रहा।
करियर का ढलान और आर्थिक तंगी का दौर
सफलता का यह दौर हमेशा कायम नहीं रह सका और धीरे-धीरे उनकी मांग घटने लगी। साल 1992 आते-आते उन्हें नए प्रोजेक्ट्स के प्रस्ताव मिलने बेहद कम हो गए। काम का अभाव होते ही उन पर गंभीर आर्थिक संकट के बादल मंडराने लगे। बुनियादी जरूरतों को पूरा करना भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था। इस विपरीत परिस्थिति में न तो उनके परिवार ने सहारा दिया और न ही फिल्म जगत के किसी शख्स ने मदद का हाथ बढ़ाया।
धोखा, मजबूरी और अचानक गायब होना
आर्थिक तंगी से जूझने के दौरान वे एक फिल्म निर्माता के संपर्क में आईं और उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ गईं। मगर उस निर्माता ने उनके इस भरोसे का गलत इस्तेमाल किया। उसने उनका साथ छोड़ने से पहले उनकी सारी जमा पूंजी हड़प ली, जिसके चलते वे पूरी तरह कंगाली के मुहाने पर पहुंच गईं। पैसों की इस भीषण किल्लत ने उन्हें वेश्यावृत्ति के दलदल में धकेल दिया। इसके बाद साल 1995 में वे अचानक सबकी नजरों से ओझल हो गईं और उनका कोई अता-पता नहीं रहा।
सड़क पर बेबस हालत और अंतिम दिन
गायब होने के कई वर्षों बाद यह जानकारी सामने आई कि वे तमिलनाडु स्थित एक दरगाह के बाहर फुटपाथ पर जिंदगी बसर कर रही थीं। कभी अपनी खूबसूरती और अभिनय के लिए सराही जाने वाली अदाकारा की हालत इस कदर बिगड़ चुकी थी कि उन्हें पहचानना लगभग नामुमकिन था। वे अत्यधिक कमजोर होकर हड्डियों का ढांचा बन चुकी थीं और उनके जिस्म पर कीड़े रेंग रहे थे।
एक स्वयंसेवी संस्था (एनजीओ) की नजर जब उन पर पड़ी, तो उन्होंने तुरंत उन्हें रेस्क्यू कर अस्पताल पहुंचाया। वहां हुई मेडिकल जांच में डॉक्टरों ने पाया कि वे एड्स से पीड़ित थीं और उनका संक्रमण बेहद गंभीर स्तर तक पहुंच चुका था। चिकित्सा टीम ने उन्हें बचाने की भरकस कोशिश की, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं के चलते उन्हें बचाया नहीं जा सका। साल 2007 में मात्र 45 वर्ष की उम्र में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।



















