भारतीय सिनेमा के इतिहास में राजेश खन्ना एक ऐसे अभिनेता के रूप में याद किए जाते हैं, जिनके नाम बैक-टू-बैक 15 ब्लॉकबस्टर फिल्में देने का अटूट कीर्तिमान दर्ज है। देश के पहले सुपरस्टार का दर्जा पाने वाले काका के नाम से मशहूर इस अभिनेता का बॉक्स ऑफिस पर ऐसा दबदबा था कि एक दौर में सफलता उनके लिए आम बात बन चुकी थी। अपनी लगातार मिलती कामयाबी से वे इस कदर ऊब चुके थे कि उन्होंने एक समय ऐसा भी महसूस किया कि काश उनकी कोई फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल हो जाए। इसी चाहत में उन्होंने एक ऐसी पटकथा पर दांव लगाया जिसे वे बेहद कमजोर मान रहे थे, लेकिन वह दांव भी सुपरहिट में तब्दील हो गया।
1969 की 'आराधना' से शुरू हुआ 15 लगातार हिट फिल्मों का सुनहरा दौर
राजेश खन्ना के करियर का सबसे स्वर्णिम अध्याय साल 1969 में आई फिल्म 'आराधना' के साथ शुरू हुआ था। इस फिल्म की अपार सफलता के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और सिनेमाघरों में एक के बाद एक सुपरहिट फिल्मों का तांता लगा दिया। उस दौर में दर्शकों के बीच उनका जादू इस कदर सिर चढ़कर बोल रहा था कि एक ही समय पर थिएटरों में उनकी चार से पांच अलग-अलग फिल्में प्रदर्शित हो रही होती थीं। प्रशंसक सिनेमाघर के एक ऑडिटोरियम से निकलकर सीधे दूसरे ऑडिटोरियम में काका की नई फिल्म देखने पहुंच जाते थे और हर फिल्म कमाई के नए रिकॉर्ड बनाती थी।
इस अद्वितीय सफलता के सिलसिले में कई ऐसी फिल्में शामिल थीं जिन्होंने हिंदी सिनेमा में इतिहास रचा। इनमें 'आराधना' के अलावा 'डोली', 'बंधन', 'इत्तेफाक', 'दो रास्ते', 'खामोशी', 'सफर', 'द ट्रेन', 'सच्चा झूठा', 'आन मिलो सजना' और 'कटी पतंग' जैसी यादगार रचनाएं शामिल थीं। इन फिल्मों के जरिए उन्होंने भारतीय दर्शकों के दिलों पर अपनी एक अमिट छाप छोड़ी और उनका नाम हर घर में पहचाना जाने लगा।
'हाथी मेरे साथी' को कमजोर पटकथा समझकर फ्लॉप की उम्मीद में किया साइन
लगातार मिल रही चमचमाती सफलताओं के बीच काका के मन में एक अजीब सी इच्छा जन्म लेने लगी थी। वे खुद यह सोचने लगे थे कि काश उनकी कोई एक फिल्म फ्लॉप हो जाए ताकि सफलता का यह एकतरफा सिलसिला थोड़ा थमे। इसी मानसिक स्थिति के दौरान साल 1971 में उनके पास फिल्म 'हाथी मेरे साथी' की स्क्रिप्ट आई। पटकथा पढ़ने के बाद उन्हें लगा कि इसकी कहानी में कोई खास दम नहीं है और यह दर्शकों को आकर्षित करने में पूरी तरह नाकाम रहेगी।
राजेश खन्ना ने केवल इस सोच के साथ इस प्रोजेक्ट को स्वीकार किया था कि यह निश्चित रूप से बॉक्स ऑफिस पर डूबता सौदा साबित होगी। हालांकि, जब यह फिल्म 1971 में बड़े पर्दे पर रिलीज हुई, तो उनका यह आकलन पूरी तरह गलत साबित हुआ। 'हाथी मेरे साथी' न केवल दर्शकों को बेहद पसंद आई, बल्कि यह भी उस साल की सबसे बड़ी सुपरहिट फिल्मों की सूची में शामिल हो गई।
अभूतपूर्व स्टारडम का असर, सेट पर देरी और बेपरवाह कार्यशैली
लगातार 15 फिल्मों की बेमिसाल कामयाबी ने राजेश खन्ना के व्यक्तित्व और कार्यशैली पर भी गहरा असर डाला। सफलता की इस अभूतपूर्व लहर के कारण उनके व्यवहार में घमंड और बेपरवाही झलकने लगी थी। वे शूटिंग सेट पर अकसर देर से पहुंचने लगे थे और सह-कलाकारों तथा निर्माताओं की सहूलियत का ध्यान रखना कम कर दिया था। उनके इस रवैये से कई फिल्म निर्माता और साथ काम करने वाले कलाकार खासे परेशान रहने लगे थे।
इसके बावजूद, काका पर इन शिकायतों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। वे अपनी मर्जी के मालिक थे और अपनी जीवनशैली से किसी भी प्रकार का समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे। मीडिया में आए बयानों के अनुसार, वे इस बात पर अड़े रहते थे कि चाहे फिल्म का जो भी नतीजा हो या अभिनय पर असर पड़े, वे अपनी लाइफस्टाइल में बदलाव नहीं लाएंगे।
80 के दशक का डाउनफॉल, अमिताभ बच्चन की चुनौती और अंतिम सफर
समय के चक्र के साथ 1980 के दशक में राजेश खन्ना के करियर की रफ्तार धीमी पड़ने लगी और उनकी कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल होने लगीं। इस दौर में हिंदी सिनेमा में अमिताभ बच्चन का उभार हुआ, जिनकी 'एंग्री यंग मैन' वाली छवि को नए जमाने के दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया। अमिताभ बच्चन की बढ़ती लोकप्रियता के सामने काका का स्टारडम धीरे-धीरे फीका पड़ता चला गया और बॉक्स ऑफिस पर समीकरण पूरी तरह बदल गए।
राजेश खन्ना ने साल 2012 में 69 वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके निधन से पहले शूट की गई उनकी आखिरी फिल्म 'रियासत' थी। हालांकि यह फिल्म उनकी जिंदगी के दौरान बड़े पर्दे पर नहीं आ सकी और उनके निधन के दो साल बाद 18 जुलाई 2014 को रिलीज की गई।


















