पाकिस्तान की राजनीति में सेना के बढ़ते दखल और सरकारी नीतियों को लेकर माहौल लगातार गरमाता जा रहा है। इसी बीच जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (F) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने सैन्य नेतृत्व के खिलाफ बेहद कड़े तेवर अपनाए हैं। उन्होंने खुले तौर पर चेतावनी दी है कि यदि ताकत का दायरा इसी तरह असीमित रखा गया, तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब देश के भीतर लोकतांत्रिक अधिकारों, प्रांतीय स्वायत्तता और राजनीतिक स्वतंत्रता को लेकर बड़े पैमाने पर बहस छिड़ी हुई है। मौलाना फजलुर रहमान ने सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की तरफ इशारा करते हुए कहा कि मुल्क का शासन चलाने के अधिकार कुछेक शक्तिशाली लोगों तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि इसमें आम नागरिकों और राजनीतिक दलों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए।
पाकिस्तान किसी की निजी संपत्ति नहीं
सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए मौलाना फजलुर रहमान ने दो टूक शब्दों में कहा कि इस देश को किसी की व्यक्तिगत बपौती नहीं समझा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, पाकिस्तान के प्राकृतिक संसाधन और तमाम अहम संस्थान यहाँ की अवाम के हैं, न कि किसी खास परिवार या चुनिंदा ताकतवर समूहों के। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि यह देश किसी के परिवार की जागीर नहीं है। उनका आरोप है कि मौजूदा सैन्य नेतृत्व और हुक्मरान गठबंधन जनता या राजनीतिक दलों को विश्वास में लिए बिना ही देश के भविष्य से जुड़े बेहद संवेदनशील फैसले ले रहे हैं। मौलाना फजलुर रहमान ने यह भी साफ किया कि अगर सरकार राजनीतिक दलों का सहयोग चाहती है, तो उसे सबसे पहले जनता के बुनियादी अधिकारों और जनभावनाओं का सम्मान करना सीखना होगा। राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ हो रहे कथित अन्याय पर दुख जताते हुए उन्होंने कहा कि देश के लिए जान गंवाने वाले सैनिकों की शहादत पर उन्हें दुख होता है, लेकिन जब उनके अपने राजनीतिक कार्यकर्ता निशाना बनाए जाते हैं, तो हुक्मरानों के चेहरे पर मुस्कान होती है। इस बयान के जरिए उन्होंने सुरक्षा बलों और राजनीतिक कैदियों के साथ हो रहे सलूक में दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया है।
ढाका के इतिहास से सबक लेने की चेतावनी
अपनी बात को और मजबूती देते हुए मौलाना फजलुर रहमान ने दिसंबर 1971 के उस ऐतिहासिक और बेहद दर्दनाक अध्याय का विशेष तौर पर उल्लेख किया जब पाकिस्तानी सेना को भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा था और परिणामस्वरूप बांग्लादेश का वजूद सामने आया था। उन्होंने उस दौर के सैन्य शासक जनरल याह्या खान के बयानों को याद करते हुए बताया कि सरेंडर से ठीक पहले किस तरह से गलियों, खेतों और पहाड़ों तक लड़ते रहने के बड़े-बड़े दावे किए गए थे। वर्तमान हालात की तुलना उसी दौर से करते हुए उन्होंने कहा कि केवल सैन्य ताकत के बलबूते या हवाई दावों के सहारे किसी मुल्क को लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता। उनके अनुसार, किसी भी हुकूमत की असली ताकत हथियारों में नहीं बल्कि जनता के अटूट भरोसे और राजनीतिक समर्थन में निहित होती है।
खैबर पख्तूनख्वा के राजनीतिक हालात और इमरजेंसी
मौलाना फजलुर रहमान की यह तीखी नाराजगी ऐसे संवेदनशील वक्त में सामने आई है जब खैबर पख्तूनख्वा प्रांत को लेकर केंद्र सरकार और विपक्षी दलों के बीच टकराव अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच चुका है। इस अहम सूबे में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इस्लाम यानी PTI की सरकार हुआ करती थी। लेकिन केंद्र की सत्ता में बैठे लोगों ने 11 अक्तूबर को इस पूरे इलाके में आपातकाल थोप दिया, जिसके चलते चुनी हुई प्रांतीय सरकार को भंग कर दिया गया। इस घटनाक्रम ने देश की संघीय व्यवस्था और प्रांतीय अधिकारों को लेकर नए सिरे से गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कबायली क्षेत्रों के संसाधनों पर मंडराता खतरा
प्रांतीय संकट के अलावा मौलाना फजलुर रहमान ने पूर्व संघीय प्रशासित कबायली क्षेत्रों यानी FATA के बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा को लेकर भी गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने अंदेशा जताया है कि हालिया आपातकाल के बहाने केंद्र सरकार इन कबायली इलाकों की खनिज संपदा और अन्य महत्वपूर्ण संसाधनों पर अपना सीधा नियंत्रण स्थापित करना चाहती है। उनके मुताबिक, इन क्षेत्रों के भीतर छिपी अथाह खनिज संपदा ही सरकार के इन फैसलों के पीछे का असली मकसद हो सकती है। इसके साथ ही उन्होंने अमेरिका के साथ बढ़ रही रणनीतिक साझेदारियों पर भी सवाल उठाए और चेताया कि इस संवेदनशील भू-राजनीतिक क्षेत्र में चीन और रूस जैसी महाशक्तियों की भी पैनी नजरें टिकी हुई हैं, जिससे आने वाले दिनों में क्षेत्रीय स्थिरता खतरे में पड़ सकती है।



















