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बोर्ड में फेल होने के डर ने रघुबीर यादव को बनाया घर से भागा कलाकार: ढाई रुपये रोज और भूखे पेट सोने वाले संघर्ष की पूरी दास्तानबॉलीवुड
13 जून 2026, 12:30 pm (46 दिन पहले)· 0

बोर्ड में फेल होने के डर ने रघुबीर यादव को बनाया घर से भागा कलाकार: ढाई रुपये रोज और भूखे पेट सोने वाले संघर्ष की पूरी दास्तान

रघुबीर यादव ने एक इंटरव्यू में बताया कि कैसे परीक्षा में फेल होने के डर से वह घर छोड़कर भागे, ललितपुर में थियेटर से जुड़े और ढाई रुपये रोज पर गुजारा किया—और एक रिश्तेदार के ताने ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी।

आज की पीढ़ी रघुबीर यादव को भले ही सुपरहिट सीरीज ‘पंचायत’ के प्रधान के किरदार से पहचानती हो, लेकिन उनका असली परिचय दशकों की उस मेहनत में छिपा है जो उन्होंने बेहद तंग हालातों में की। एक हालिया बातचीत में इस मंझे हुए अभिनेता ने अपने उस दौर को खोलकर रख दिया, जब एक परीक्षा का डर उन्हें घर से कोसों दूर ले गया और सिनेमा तक पहुंचने का रास्ता बना गया।

परीक्षा का डर और घर से भागने का फैसला

रघुबीर यादव के मुताबिक उन दिनों एक महफूज भविष्य के नाम पर उन पर साइंस पढ़ने का जबरदस्त दबाव था। पर उन्हें खुद ही भरोसा हो चला था कि वह बोर्ड की परीक्षा पास नहीं कर पाएंगे। जब नाकामी का यकीन पक्का हो गया, तो उन्होंने एक बड़ा कदम उठा लिया—रिजल्ट के डर से वह अपने एक दोस्त के साथ घर छोड़कर निकल पड़े और भटकते-भटकते ललितपुर जा पहुंचे।

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ललितपुर का थियेटर और ढाई रुपये की दिहाड़ी

ललितपुर में उन दिनों अभिनेता अन्नू कपूर के पिता की एक थियेटर कंपनी नाटक कर रही थी। यहीं से रघुबीर के अभिनय सफर की बुनियाद पड़ी। अन्नू कपूर के पिता मदनलाल कपूर ने उन्हें अपनी कंपनी में जगह दे दी, जहां हर दिन के ढाई रुपये तय हुए थे। लेकिन यह छोटी-सी रकम भी न तो वक्त पर मिलती थी और न ही पूरी।

उन्होंने उन दिनों को याद करते हुए कहा, ‘ढाई रुपये रोज का तय हुआ था, लेकिन कभी-कभी इससे भी कम पैसे मिलते थे. हम लोग उतने ही पैसों में आटा और टमाटर खरीद लाते थे, फिर चटनी और रोटी बनाकर अपना पेट भरते थे.’ हालत यह थी कि कई बार कोई उनका बनाया खाना तक चुरा ले जाता और उन्हें भूखे पेट ही सोना पड़ता।

20 साल घर से दूर, फिर भी कोई शिकायत नहीं

फिल्मी दुनिया में पैर जमाने की इस जद्दोजहद में वह करीब 20 साल अपने घर से दूर रहे और कई रातें भूखे काटीं। इसके बावजूद उनके मन में उस दौर को लेकर न कोई कड़वाहट है, न कोई गिला। वह उल्टे इन्हीं सालों को अपने करियर की मजबूत नींव मानते हैं। उनका कहना है कि इसी समय ने सिनेमा और अभिनय को लेकर उनकी समझ को गढ़ा और तराशा—इसी दौरान उन्होंने उर्दू सीखी और अपने शब्दों के उच्चारण को निखारा।

अपने काम को लेकर उन्होंने कहा, ‘एक्टिंग आसान नहीं है, लेकिन इसमें मजा बहुत आता है. लोग इसे स्ट्रगल कहते हैं, पर मैंने अपनी जिंदगी को कभी स्ट्रगल नहीं माना. मैंने बस मेहनत की और उस पूरे सफर का आनंद लिया.’

पिता को चिट्ठी और एक ताने ने बदली राह

घर छोड़ने के बाद रघुबीर ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी और वादा किया था कि वह कभी ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जिससे परिवार के नाम पर दाग लगे। करीब छह महीने बाद वह घर लौटे भी, पर एक रिश्तेदार का ताना उनकी जिंदगी की दिशा दोबारा मोड़ गया।

उन्होंने बताया, ‘जब मैं गांव पहुंचा तो मेरे चाचा के लड़के ने कहा कि हमें तो लगा था कि तुम अब सीधे सिनेमा के पर्दे पर ही दिखाई दोगे. मुझे यह बात इतनी चुभ गई और इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई कि मैं उसी रात दोबारा घर छोड़कर चला गया.’ इस एक घटना के बाद वह अगले 20 साल तक अपने गांव नहीं लौटे।

परदे पर पहचान और घर-घर तक का सफर

आगे चलकर रघुबीर यादव ‘सलाम बॉम्बे’, ‘लगान’, ‘पीपली लाइव’, ‘पीकू’ और ‘न्यूटन’ जैसी फिल्मों में अपने दमदार अभिनय के लिए सबसे ज्यादा सराहे गए। हालांकि घर-घर में असली पहचान उन्हें साल 1989 में दूरदर्शन के सुपरहिट शो ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ से मिली थी, जिसके बाद वह दर्शकों के चहेते कलाकार बन गए।

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