फिल्म उद्योग में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाने वाली अभिनेत्री यामी गौतम आज भले ही स्थापित कलाकारों में गिनी जाती हैं, लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब उन्होंने अभिनय को हमेशा के लिए अलविदा कहने का मन बना लिया था। वर्ष 2010 में कन्नड़ फिल्म 'उल्लास उत्साह' से अपने सफर की शुरुआत करने के बाद, उन्होंने वर्ष 2012 में 'विक्की डोनर' के जरिए हिंदी सिनेमा में बहुत ही सफल आगाज किया था। हालांकि, पहली ही फिल्म सुपर-हिट साबित होने के बावजूद आगे का रास्ता उनके लिए संघर्षों से भरा रहा। इंडस्ट्री में लगातार अपनी पहचान बनाए रखने की जद्दोजहद के बीच कई बार उन्हें ऐसे किरदार भी स्वीकार करने पड़े, जिन्हें करने की उनकी बिल्कुल इच्छा नहीं थी।
'विक्की डोनर' के बाद का संघर्ष और मजबूरी के फैसले
शुरुआती सफलता मिलने के बाद भी यामी गौतम के सामने कई तरह की चुनौतियां खड़ी हो गईं। उस दौर में उन्हें अक्सर सुनने को मिलता था कि उनका पदार्पण किसी पारंपरिक मुख्यधारा की नायिका जैसा नहीं था। काम की तलाश और सिनेमा जगत में सक्रिय रहने की मजबूरी में उन्हें कई ऐसे प्रस्ताव स्वीकार करने पड़े जो उनकी रचनात्मक पसंद से मेल नहीं खाते थे। धीरे-धीरे अपनी जगह पक्की करने की इस कोशिश में एक समय ऐसा आया जब वे लगातार दबाव महसूस करने लगीं।
हिमाचल लौटने और खेती करने की तैयारी
वर्ष 2019 में आई दो बड़ी फिल्मों की सफलता से ठीक पहले यामी गौतम ने बॉलीवुड छोड़ने का पूरा मन बना लिया था। उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि यदि हालात नहीं बदले तो वे अपने गृह राज्य हिमाचल प्रदेश वापस लौट जाएंगी। हिमाचल में उनके परिवार के पास खेत हैं, और उन्होंने वहां जाकर एक शांत, सरल और बिल्कुल नई जिंदगी शुरू करने की योजना बना ली थी। इस बेहद कठिन मोड़ पर उनके माता-पिता ने उनका भरपूर साथ दिया। उनके माता-पिता का रुख स्पष्ट था और उन्होंने यामी को आश्वासन दिया कि अगर वे वापस आना चाहती हैं तो घर के दरवाजे हमेशा खुले हैं।
डर का त्याग और 'उरी' व 'बाला' से बदली जिंदगी
यामी गौतम के जीवन में सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब उन्होंने नजरों से ओझल हो जाने के डर से फैसले लेना बंद कर दिया। उन्होंने महसूस किया कि गायब हो जाने के डर से बिना मन के काम करते रहने से कहीं बेहतर है कि खुद को उस माहौल से अलग कर लिया जाए। जैसे ही उन्होंने असुरक्षा और डर के दबाव से मुक्त होकर काम चुनना शुरू किया, उनका करियर रातों-रात बदल गया। उसी दौर में उन्हें फिल्म 'उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक' मिली और इसके तुरंत बाद 'बाला' में काम करने का मौका मिला। इन दोनों फिल्मों ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया बल्कि आलोचकों ने भी उनकी अभिनय क्षमता को खूब सराहा।
करियर का सबसे बड़ा सबक और जीवन दर्शन
अपने बीते दिनों को याद करते हुए यामी गौतम मानती हैं कि डर इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन होता है। डर के कारण किसी भी रोल को हां कह देने की प्रवृत्ति को छोड़ना ही उनके करियर का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। जब तक व्यक्ति दूसरों की अपेक्षाओं या काम न मिलने के डर से फैसले लेता है, तब तक वह अपनी वास्तविक क्षमता को उजागर नहीं कर पाता। जब उन्होंने अपने मन के खिलाफ काम न करने का कड़ा फैसला लिया, तो उन्हें एक अद्भुत आजादी महसूस हुई और इसी एक कदम ने उनके पूरे करियर का परिदृश्य बदल कर रख दिया।



















