हिंदी सिनेमा में किशोर कुमार का नाम सुनते ही सबसे पहले उनकी बेमिसाल आवाज और खनकती हंसी याद आती है, लेकिन इस आवाज के पीछे एक ऐसा दिल भी था जो मुंबई की चमक-दमक के बीच रहकर भी मध्य प्रदेश के एक छोटे शहर खंडवा को कभी भुला नहीं पाया. फिल्म इंडस्ट्री ने उन्हें पैसा, स्टारडम और पहचान सब कुछ दिया, फिर भी उनकी जड़ें खंडवा की गलियों और मिट्टी से जुड़ी रहीं.
जन्मभूमि से जो लगाव कभी टूटा नहीं
किशोर कुमार का जन्म 4 अगस्त 1929 को खंडवा में हुआ था. आगे चलकर मुंबई उनकी कर्मभूमि जरूर बनी, लेकिन उनका असली लगाव हमेशा अपनी जन्मभूमि से ही रहा. वह अक्सर यह कहते सुने गए कि मुंबई शहर में उनका कोई सच्चा दोस्त नहीं है और यहां किसी पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता. जब भी शोहरत की भागदौड़ और शहर का शोर उन्हें थका देता, उनका मन सीधे खंडवा की पुरानी गलियों में लौटने के लिए बेचैन हो उठता था. उनके लिए खंडवा जाना किसी सुपरस्टार की यात्रा जैसा नहीं बल्कि किसी बच्चे के मां की गोद में लौट आने जैसा सुकून भरा अनुभव होता था.
घर बसाने की चाहत अधूरी रही, अंतिम संस्कार वहीं हुआ
किशोर कुमार खुद कहा करते थे कि एक दिन वह खंडवा लौटकर वहीं दूध जलेबी खाते हुए बस जाएंगे. मुंबई जाने के बाद वह बार-बार खंडवा आते तो रहे, लेकिन जिंदगी की व्यस्तताओं के चलते वहां हमेशा के लिए बस पाने की उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी. हालांकि नियति ने एक तरह से उनकी यह चाहत पूरी कर दी, क्योंकि उनका अंतिम संस्कार खंडवा शहर में ही संपन्न हुआ.
गौरीकुंज: यादों से भरा घर, आज जर्जर हालत में
खंडवा आने पर किशोर कुमार अक्सर अपने दोस्तों के साथ शहर की गलियों में घंटों गप्पें लड़ाते थे और अपनी पसंदीदा दुकान पर जाकर दूध जलेबी का स्वाद लेते थे. यही वजह है कि आज भी उनके जन्मदिन या पुण्यतिथि पर उनके प्रशंसक उनकी समाधि पर दूध जलेबी का भोग चढ़ाते हैं. खंडवा में मौजूद उनका पुश्तैनी घर गौरीकुंज उनकी इन्हीं यादों का गवाह है, लेकिन आज इस घर की हालत बेहद जर्जर हो चुकी है. कुछ लोग इस बदहाली का फायदा उठाकर घर पर कब्जा करने की कोशिश में भी जुटे बताए जाते हैं. फिर भी खंडवा की फिजाओं में आज भी किशोर दा की वह बेफिक्र, अटपटी हंसी गूंजती हुई महसूस होती है, भले ही गौरीकुंज खुद वक्त की मार झेल रहा हो.
केएल सहगल से मुलाकात और गायकी का सफर
बचपन से ही किशोर कुमार अपने दौर के मशहूर गायक केएल सहगल के जबरदस्त फैन थे और किसी भी तरह उनसे मिलना चाहते थे. यह मुलाकात आखिरकार उनके बड़े भाई अशोक कुमार की बदौलत मुमकिन हो पाई, जो उस समय तक मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में एक स्थापित और मशहूर अभिनेता बन चुके थे. अशोक कुमार ने ही किशोर कुमार को केएल सहगल से मिलवाया. आगे चलकर किशोर कुमार ने खुद गायकी की दुनिया में ऐसा जादू बिखेरा कि आज दशकों बाद भी उनकी आवाज सुनकर लोग झूमने पर मजबूर हो जाते हैं.
योडलिंग जिसने बनाई अलग पहचान
किशोर दा की गायकी की सबसे खास और अनोखी पहचान उनकी योडलिंग रही, जिसमें वह गाते-गाते अचानक अपने गले से आवाज के सुर बदल देते थे. जब वह गाते थे तो ऐसा लगता था मानो वह महज गाना नहीं गा रहे, बल्कि अपने भीतर के जज्बात सीधे शब्दों और सुरों में बयां कर रहे हों. उन्हें हर मूड और हर रंग के गाने गाने में महारत हासिल थी. उन्होंने कई अलग-अलग भारतीय भाषाओं में गाने गाए और हर भाषा के श्रोताओं को अपनी आवाज का दीवाना बना लिया.
आज भी खंडवा से जुड़ी हैं उनकी यादें
आज दशकों बीत जाने के बाद भी किशोर कुमार का नाम मुंबई की चमकती फिल्मी दुनिया से जितना जुड़ा है, उतना ही गहरा नाता खंडवा की मिट्टी से भी बना हुआ है. उनकी योडलिंग, उनकी दूध जलेबी वाली आदत और गौरीकुंज की यादें आज भी उन्हें खंडवा का अपना बेटा बनाए रखती हैं.




















