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लंदन में सुनील आनंद का निधन: देव आनंद के बेटे की फिल्मी यात्रा और नवकेतन फिल्म्स की विरासत पर एक नजरबॉलीवुड
29 जुल॰ 2026, 5:50 pm (56 मिनट पहले)· 0

लंदन में सुनील आनंद का निधन: देव आनंद के बेटे की फिल्मी यात्रा और नवकेतन फिल्म्स की विरासत पर एक नजर

दिग्गज अभिनेता देव आनंद के पुत्र सुनील आनंद का 70 वर्ष की उम्र में लंदन में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। अभिनय में असफलता के बावजूद उन्होंने अपने पिता की सिनेमाई विरासत और नवकेतन फिल्म्स को संजोने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारतीय सिनेमा जगत के महान अभिनेता और निर्माता-निर्देशक देव आनंद के सुपुत्र सुनील आनंद का 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। 26 जुलाई 2026 को लंदन में दिल का दौरा पड़ने से उन्होंने अंतिम सांस ली। अभिनेत्री कल्पना कार्तिक और देव आनंद के घर जन्मे सुनील आनंद का संपूर्ण जीवन फिल्म उद्योग की चमक-धमक और देश के शीर्ष फिल्मकारों के बीच व्यतीत हुआ। अपने पिता के विशाल कद और अभूतपूर्व सफलता के साए में काम करते हुए उन्होंने अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा था। यद्यपि एक मुख्य अभिनेता के रूप में वे बॉक्स ऑफिस पर वह सफलता हासिल नहीं कर सके जिसकी उनसे अपेक्षा की जा रही थी, किंतु नवकेतन फिल्म्स की बहुमूल्य विरासत को सहेजने और अपने पिता के प्रति निष्ठा बनाए रखने में उनका योगदान अत्यंत सराहनीय रहा। उनके निधन के समाचार से भारतीय फिल्म जगत में शोक की लहर फैल गई है और उनके करियर तथा जीवन से जुड़े पहलुओं की चर्चा पुनः आरंभ हो गई है।

प्रतिष्ठित आनंद परिवार की पृष्ठभूमि और विदेश में शिक्षा

सुनील आनंद का जन्म वर्ष 1956 में स्विट्जरलैंड के खूबसूरत शहर ज्यूरिख में हुआ था। वे भारतीय फिल्म उद्योग के सबसे सम्मानित और प्रभावशाली आनंद परिवार के चिराग थे। उनके चाचा चेतन आनंद और विजय आनंद हिंदी सिनेमा के पथ प्रदर्शक निर्देशकों में गिने जाते थे, जिन्होंने भारतीय फिल्मों को नई दिशा दी। इसके अतिरिक्त, विख्यात अंतरराष्ट्रीय फिल्म निर्देशक शेखर कपूर भी उनके करीबी रिश्तेदारों में शामिल हैं। इतने बड़े फिल्मी माहौल में पले-बढ़े होने के बावजूद सुनील ने अपनी शुरुआती प्राथमिकताओं में उच्च शिक्षा को स्थान दिया।

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उन्होंने अमेरिका का रुख किया और वाशिंगटन डीसी स्थित प्रसिद्ध अमेरिकन यूनिवर्सिटी से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की डिग्री हासिल की। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वे भारत लौटे, तो उन्होंने सीधे कैमरे के सामने आने के बजाय फिल्म निर्माण की बारीकियों को समझने का मार्ग चुना। उन्होंने अपने पिता देव आनंद के साथ कई प्रतिष्ठित प्रोजेक्ट्स में बतौर सहायक निर्देशक कार्य किया। इस दौरान उन्होंने पटकथा लेखन, सेट प्रबंधन, संपादन और निर्देशन की तकनीकों को गहराई से सीखा, जिससे उन्हें सिनेमाई प्रक्रिया की व्यावहारिक समझ प्राप्त हुई।

बॉलीवुड में मुख्य अभिनेता के रूप में लॉन्च और शुरुआती फिल्में

वर्ष 1984 में देव आनंद ने अपने पारिवारिक प्रोडक्शन हाउस नवकेतन फिल्म्स के बैनर तले निर्मित फिल्म 'आनंद और आनंद' से अपने बेटे सुनील आनंद को बतौर मुख्य अभिनेता बॉलीवुड में पेश किया। यह एक बड़े बजट की पारिवारिक ड्रामा फिल्म थी, जिसे काफी भव्य स्तर पर तैयार किया गया था। इस फिल्म में देव आनंद के अलावा राखी, स्मिता पाटिल और विश्वजीत चटर्जी जैसे अपने दौर के दिग्गज और प्रतिष्ठित कलाकारों की पूरी फौज शामिल थी। इतने बड़े अभिनेताओं की मौजूदगी और भारी प्रचार-प्रसार के बावजूद यह फिल्म दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने में असफल रही और बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकी।

पहली फिल्म के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद भी सुनील आनंद ने हार नहीं मानी और अभिनय के क्षेत्र में प्रयास जारी रखे। वर्ष 1986 में उन्हें एक्शन-ड्रामा फिल्म 'कार थीफ' में काम करने का अवसर मिला, जिसमें उनके विपरीत अभिनेत्री विजयेता पंडित नजर आई थीं। इसके उपरांत, उन्होंने अपने चाचा और मशहूर निर्देशक विजय आनंद के निर्देशन में बनी फिल्म 'मैं तेरे लिए' में काम किया। इस फिल्म में उनकी जोड़ी अभिनेत्री मीनाक्षी शेषाद्रि के साथ बनाई गई थी। हालांकि, बड़े निर्देशकों और लोकप्रिय अभिनेत्रियों के साथ काम करने के बाद भी इन फिल्मों से उनके अभिनय करियर को वह आवश्यक गति नहीं मिल पाई, जिससे वे मुख्यधारा के स्थापित अभिनेताओं की सूची में शामिल हो पाते।

मार्शल आर्ट्स प्रयोग, निर्देशन और अधूरा प्रोजेक्ट

अभिनय के क्षेत्र में लंबी खामोशी और मुख्यधारा की फिल्मों से दूरी बनाने के बाद, सुनील आनंद ने वर्ष 2001 में फिल्म 'मास्टर' के जरिए फिल्म उद्योग में जोरदार वापसी करने का प्रयास किया। इस प्रोजेक्ट की विशेष बात यह थी कि इसमें उन्होंने न केवल मुख्य भूमिका निभाई, बल्कि स्वयं निर्देशन की कमान भी संभाली। एक्शन से भरपूर इस मार्शल आर्ट्स फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाने के लिए उन्होंने अत्यधिक शारीरिक और मानसिक मेहनत की थी। अपनी भूमिका में प्रामाणिकता लाने के लिए वे विशेष रूप से हांगकांग गए, जहां उन्होंने प्रसिद्ध विंग चुन मार्शल आर्ट्स शैली का कड़ा और अनुशासित प्रशिक्षण प्राप्त किया।

अत्यधिक परिश्रम और अनूठे विषय के बावजूद, जब 'मास्टर' प्रदर्शित हुई, तो यह व्यावसायिक दृष्टिकोण से सफल नहीं हो सकी। इस फिल्म की विफलता ने एक मुख्यधारा के अभिनेता और स्वतंत्र निर्देशक के रूप में उनके फिल्मी सफर को विराम दे दिया। इसके बाद भी उन्होंने फिल्म निर्माण की अपनी ललक को समाप्त नहीं होने दिया। उन्होंने बाद में गोवा के ड्रग कारोबार और अपराध की पृष्ठभूमि पर आधारित एक महत्वाकांक्षी अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट 'वागाटोर मिक्सर' की घोषणा की। इस प्रोजेक्ट पर शुरुआती काम भी शुरू हुआ, लेकिन निर्माण से जुड़े साझेदारों और निर्माताओं के बीच हुए आपसी मतभेदों व विवादों के कारण यह फिल्म कभी पूरी नहीं हो सकी और डिब्बे में बंद होकर रह गई।

पिता देव आनंद के प्रति अटूट निष्ठा और 'गाइड' का कांस सफर

यद्यपि सुनील आनंद को अपने पिता देव आनंद जैसा स्टारडम, दीवानगी और व्यावसायिक सफलता हासिल नहीं हो सकी, लेकिन अपने पिता के प्रति उनका आदर और समर्पण जीवन भर अडिग रहा। वे हमेशा अपने पिता को अपना सबसे बड़ा मार्गदर्शक और प्रेरणा स्रोत मानते थे। अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने भावुक होकर कहा था कि देव आनंद केवल एक महान अभिनेता या स्टार नहीं थे, बल्कि वे एक बेहद अध्ययनशील, विद्वान और व्यापक दृष्टिकोण वाले व्यक्ति थे, जो दुनिया के किसी भी विषय पर किसी भी मंच पर धाराप्रवाह चर्चा कर सकते थे।

सुनील आनंद ने अपने पिता की महान सिनेमाई धरोहर को भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने का संकल्प लिया था। वर्ष 2008 में जब देव आनंद की 1965 की सर्वकालिक महान क्लासिक फिल्म 'गाइड' का डिजिटल रेस्टोरेशन किया गया, तो सुनील आनंद ही इस ऐतिहासिक फिल्म के नव-संशोधित रूप को प्रतिष्ठित कांस फिल्म फेस्टिवल में लेकर गए थे। वहां उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सिनेमा प्रेमियों और आलोचकों के सामने भारतीय सिनेमा के इस रत्न को गर्व के साथ प्रस्तुत किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने आनंद परिवार के ऐतिहासिक प्रोडक्शन हाउस नवकेतन फिल्म्स के प्रबंधन और देखरेख की जिम्मेदारी भी बखूबी संभाली।

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में सुनील आनंद चकाचौंध, मीडिया की सुर्खियों और सार्वजनिक कार्यक्रमों से पूरी तरह दूर हो गए थे। वे केवल बहुत ही विशेष पारिवारिक या सिनेमाई अवसरों पर ही दिखाई देते थे। यद्यपि एक अभिनेता के रूप में उनका करियर उनके पिता की महान सफलताओं की तुलना में छोटा और शांत रहा, किंतु नवकेतन फिल्म्स के गौरवशाली इतिहास को बनाए रखने, 'गाइड' जैसी कालजयी कृतियों को वैश्विक मंच पर सम्मान दिलाने और आनंद परिवार के सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने में उनके योगदान को भारतीय सिनेमा सदैव सम्मान के साथ याद रखेगा।

सवाल-जवाब

सुनील आनंद का निधन कब और कहां हुआ?
सुनील आनंद का निधन 26 जुलाई 2026 को लंदन में दिल का दौरा पड़ने के कारण 70 वर्ष की आयु में हुआ।
सुनील आनंद के माता-पिता कौन थे?
वह हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता और फिल्मकार देव आनंद और प्रसिद्ध अभिनेत्री कल्पना कार्तिक के बेटे थे।
सुनील आनंद ने बॉलीवुड में अपने अभिनय करियर की शुरुआत किस फिल्म से की थी?
उन्होंने 1984 में अपने पिता देव आनंद द्वारा निर्देशित फिल्म 'आनंद और आनंद' से बतौर मुख्य अभिनेता पदार्पण किया था।
अभिनय के अलावा सुनील आनंद ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में क्या योगदान दिया?
उन्होंने अपने पिता के साथ सहायक निर्देशक के रूप में काम किया, 2001 में फिल्म 'मास्टर' का निर्देशन किया और पारिवारिक बैनर नवकेतन फिल्म्स की देखरेख की।
सुनील आनंद ने 'मास्टर' फिल्म के लिए क्या विशेष तैयारी की थी?
मार्शल आर्ट्स पर आधारित इस फिल्म के लिए उन्होंने हांगकांग जाकर विंग चुन मार्शल आर्ट्स का कड़ा प्रशिक्षण लिया था।
2008 के कांस फिल्म फेस्टिवल में सुनील आनंद की क्या भूमिका थी?
वर्ष 2008 में जब देव आनंद की क्लासिक फिल्म 'गाइड' का डिजिटल रेस्टोरेशन किया गया, तो सुनील आनंद ही उस फिल्म को कांस फिल्म फेस्टिवल में प्रस्तुत करने गए थे।
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