भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ नगमे ऐसे दर्ज हैं जिनकी चमक दशकों का सफर तय करने के बाद भी तनिक भी फीकी नहीं पड़ती। साल 1960 में पर्दे पर आई फिल्म चौदहवीं का चांद का शीर्षक गीत भी ऐसी ही एक बेमिसाल रचना है, जिसे छह दशक से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी संगीत प्रेमी बेहद चाव से सुनते हैं। इस कालजयी रोमांटिक रचना को गुरु दत्त और वहीदा रहमान पर बेहद नफासत से फिल्माया गया था, जबकि गुरु दत्त ने ही इस पूरी फिल्म के निर्देशन की बागडोर भी संभाली थी। मोहम्मद रफी की रेशमी आवाज में रिकॉर्ड हुआ यह गीत आज भी हर दौर के आशिकों और संगीत के कद्रदानों की जुबां पर रहता है। हालांकि, इस नायाब गीत के सृजन का जो वाकया है, वह किसी फिल्मी ड्रामे से कम रोचक नहीं है। इस शाहकार को मुकम्मल शक्ल देने में एक खास पान के डिब्बे ने सबसे अहम भूमिका अदा की थी।
गुरु दत्त और संगीतकार रवि की पहली चर्चा
जब फिल्म के टाइटल ट्रैक को तराशने की प्रक्रिया शुरू हुई, तब निर्देशक गुरु दत्त ने संगीतकार रवि को कहानी के हिसाब से गाने का पूरा खाका और परिस्थिति समझाई। परिस्थिति को गहराई से समझते हुए संगीतकार रवि के जेहन में एक शुरुआती पंक्ति कौंध गई, जो थी चौदहवीं का चांद हो। इसके बाद गुरु दत्त, संगीतकार रवि और मशहूर गीतकार शकील बदायूनी की एक संयुक्त बैठक बुलाई गई। इस बैठक के दौरान संगीतकार रवि ने मुखड़े की वही शुरुआती पंक्ति शकील बदायूनी के सुपुर्द की और उनसे इस भाव पर आगे का पूरा गीत तैयार करने का आग्रह किया। शकील बदायूनी ने भी तनिक देर किए बिना उस पंक्ति के साथ या आफताब हो जोड़ दिया। इस तरह मुखड़े का पहला हिस्सा तो फौरन आकार ले चुका था, लेकिन असली पेच इसके ठीक आगे की पंक्ति पर आकर फंस गया।
बैठक में घंटों चली माथापच्ची और असमंजस
मुखड़े की दूसरी पंक्ति के लिए तीनों फनकारों के बीच लंबी चर्चा छिड़ गई। काफी माथापच्ची के बावजूद किसी भी तरह ऐसा सटीक भाव नहीं मिल पा रहा था जो सबको एक साथ पसंद आए। स्थिति यह बन रही थी कि अगर कोई पंक्ति गीतकार शकील बदायूनी को जंचती, तो संगीतकार रवि उससे पूरी तरह सहमत नहीं होते थे। वहीं जब किसी पंक्ति पर संगीतकार हामी भरते, तो गुरु दत्त उससे संतुष्ट नजर नहीं आते थे। शकील बदायूनी लगातार कागज पर नई पंक्तियां लिखते और फिर असंतोष के चलते उन्हें काटते और मिटाते रहे। जब बात बिल्कुल नहीं बन सकी, तो गुरु दत्त उस बैठक को वहीं खत्म करके वहां से रवाना हो गए। मगर संगीतकार रवि और गीतकार शकील बदायूनी वहीं जमे रहे क्योंकि रवि का पक्का इरादा था कि किसी भी सूरत में इस गीत को उसी दिन मुकम्मल करना है।
पान की तलब और घर से डिब्बा मंगवाने का फैसला
उस गंभीर माहौल में संगीतकार रवि को अचानक यह बात याद आई कि शकील बदायूनी पान के बेहद शौकीन हैं। साहित्य और संगीत जगत में यह बात सब जानते थे कि पान चबाते ही शकील साहब की कल्पना शक्ति में गजब का निखार आता था और उनके मन में बेहद नफीस ख्यालात जन्म लेने लगते थे। रवि ने जब शकील बदायूनी से उनके पान के बारे में दरियाफ्त किया, तो पता चला कि वह हड़बड़ी में अपना पान का डिब्बा घर पर ही भूल आए हैं। इस पर संगीतकार रवि ने बिना कोई वक्त गंवाए एक शख्स को फौरन शकील साहब के घर रवाना किया ताकि वहां से उनका पान का डिब्बा लाया जा सके। कुछ देर की मशक्कत के बाद आखिरकार पान का डिब्बा बैठक वाली जगह पर पहुंच गया।
चार घंटे में मुकम्मल हुआ अमर अफसाना
जैसे ही पान के स्वाद और खुशबू से शकील बदायूनी का गला तर हुआ, उनके जेहन में तुरंत जादुई अल्फाज गूंजने लगे। उन्होंने बेहद उत्साह के साथ संगीतकार रवि से मुखातिब होकर कहा कि उन्हें वह खोई हुई पंक्ति मिल गई है जिसकी इतनी देर से तलाश थी। इसके तुरंत बाद मुखड़े की दूसरी पंक्ति जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो वजूद में आई। मुखड़ा मुकम्मल होते ही दोनों फनकारों के भीतर एक नई ऊर्जा दौड़ गई और इसके बाद महज चार घंटे के भीतर रवि और शकील बदायूनी ने मिलकर पूरे गाने को अंतिम रूप दे दिया। जब बाद में गुरु दत्त ने इस तैयार गीत को सुना, तो वह भी इसकी खूबसूरती से बेहद अभिभूत और गदगद हो गए। अंत में मोहम्मद रफी ने अपनी मखमली आवाज में इसे गाकर हमेशा के लिए अमर कर दिया।


















