भारतीय हिंदी सिनेमा के 1960 और 1970 के दशक में जब भी किसी फिल्म में बच्चों के ऊपर कोई गीत फिल्माया जाना होता था, तब आमतौर पर लता मंगेशकर, आशा भोंसले या सुमन कल्याणपुर जैसी स्थापित गायिकाएं ही अपनी आवाज का लहजा बदलकर बच्चों के लिए रिकॉर्डिंग किया करती थीं। उस दौर में उद्योग के भीतर किसी असली बच्चे से गाना गवाने का चलन बहुत ही दुर्लभ माना जाता था। हालांकि, इसी दौर के बीच महज नौ साल की एक नन्हीं बालिका ने संगीत स्टूडियो की दहलीज पर कदम रखा और अपनी निर्मल व सुरीली आवाज से पूरे बॉलीवुड को हैरान कर दिया। यह बालिका कोई और नहीं बल्कि सुषमा श्रेष्ठ थीं, जिन्होंने आगे चलकर अपने बचपन में एक से बढ़कर एक सुपरहिट गाने दिए। उनकी आवाज में रिकॉर्ड हुआ वर्ष 1986 का एक ऐतिहासिक गीत आज भी भारत के अनगिनत स्कूलों में प्रतिदिन सुबह की प्रार्थना के रूप में गूंजता है। बाद के दिनों में उन्होंने अपना नाम बदलकर पूर्णिमा रख लिया और 1990 के दशक में कई चार्टबस्टर गीतों के जरिए पार्श्व गायन की दुनिया में अपनी अमिट छाप छोड़ी।
संगीत की पारिवारिक विरासत और सात साल की उम्र में पहली स्टेज परफॉर्मेंस
सुषमा श्रेष्ठ के जीवन में संगीत की उपस्थिति किसी आकस्मिक घटना की तरह नहीं आई थी, बल्कि यह उनके परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही एक समृद्ध विरासत थी। उनके पिता भोला श्रेष्ठ स्वयं संगीत की दुनिया से गहराई से जुड़े हुए थे और उन्होंने बॉम्बे टॉकीज में प्रसिद्ध संगीतकार खेमचंद प्रकाश के साथ सहायक के रूप में काम करते हुए लंबा समय बिताया था। घर के माहौल में सुबह-शाम सुरों का रियाज होता था, जिससे छोटी उम्र से ही सुषमा के कानों में भारतीय शास्त्रीय और सुगम संगीत की बारीकियां ढलने लगी थीं। पिता की देखरेख में नियमित अभ्यास करने के कारण बहुत ही कम उम्र में उनकी आवाज पर सुरों की पकड़ अद्भुत रूप से मजबूत हो चुकी थी।
बालपन की इसी प्रतिभा को पहचानते हुए उनके मामा ने उन्हें सार्वजनिक मंच पर उतारने का फैसला किया। महज सात वर्ष की उम्र में सुषमा को पहली बार एक लाइव स्टेज कार्यक्रम में गाने का अवसर प्राप्त हुआ। उनके मामा ने कई दिनों तक उनसे गहन रिहर्सल करवाई और फिर उन्हें दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया। उस कार्यक्रम में सुषमा ने फिल्म राजा और रंक का अत्यंत लोकप्रिय गीत तू कितनी अच्छी है, तू कितनी भोली है गाया। एक छोटी सी बच्ची के कंठ से निकली इतनी भावपूर्ण आवाज ने वहां मौजूद तमाम श्रोताओं को चकित कर दिया। प्रस्तुति समाप्त होते ही लोग इस बाल कलाकार को बधाई देने के लिए घेर लेते थे। इस पहली ही सफलता के बाद मुंबई के विभिन्न गणेशोत्सव पंडालों और सामाजिक-सांस्कृतिक सम्मेलनों में उनके स्टेज शो की मांग तेजी से बढ़ने लगी। उन दिनों प्रत्येक कार्यक्रम के लिए उन्हें पुरस्कार स्वरूप 200 से 250 रुपये तक की राशि मिल जाया करती थी, जो 1970 के शुरुआती दौर में एक बच्चे के लिए बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी।
शंकर-जयकिशन की खोज और मोहम्मद रफी के साथ पहला ऐतिहासिक रिकॉर्डिंग अनुभव
वर्ष 1971 में सुषमा श्रेष्ठ के संगीत सफर में एक नया और ऐतिहासिक मोड़ आया। उस समय बॉलीवुड की विख्यात संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन अपनी एक नई फिल्म के विशेष गीत के लिए किसी वास्तविक बाल कलाकार की आवाज की तलाश में भटक रही थी। इस गीत में महान गायक मोहम्मद रफी और गायिका सुमन कल्याणपुर के साथ एक बच्ची की मासूम आवाज की आवश्यकता थी। शंकर-जयकिशन के करीबी सहयोगी चंद्रकांत भोसले सुषमा की प्रतिभा से अच्छी तरह वाकिफ थे। वे बिना किसी देरी के नन्हीं सुषमा को संगीतकार शंकर के पास ले गए। वहां एक संक्षिप्त ऑडिशन लिया गया और सुषमा की आवाज सुनते ही शंकर ने उन्हें तुरंत चुन लिया।
अगले ही दिन सुषमा को मुंबई के रिकॉर्डिंग स्टूडियो में बुलाया गया, जहां उन्होंने फिल्म अंदाज के लिए प्रसिद्ध गीत है ना बोलो बोलो की रिकॉर्डिंग की। उस दौर के सबसे बड़े और दिग्गज गायकों के साथ एक ही माइक पर खड़े होकर गाना किसी भी नौ साल के बच्चे के लिए बेहद घबराहट से भरा हो सकता था। परंतु सुषमा के भीतर बचपन से ही संगीत का गहरा आत्मविश्वास रचा-बसा था। स्टूडियो के भीतर मोहम्मद रफी ने न केवल नन्हीं सुषमा का हौसला बढ़ाया, बल्कि उन्हें माइक के सामने खड़े होने और शब्दों के सही उच्चारण व गायकी की बारीकियों का पाठ भी पढ़ाया। जब गाना अंतिम रूप से रिकॉर्ड हुआ, तो सुषमा की सुरीली आवाज ने स्टूडियो में मौजूद हर शख्स का दिल जीत लिया। यह गाना रिलीज होते ही देशभर में सुपरहिट साबित हुआ और इस गाने की सफलता के साथ ही हिंदी सिनेमा को अपनी पहली आधिकारिक स्टार चाइल्ड प्लेबैक सिंगर मिल गई।
किशोर कुमार के साथ जुगलबंदी और 70 के दशक की हिट फिल्मों का सफर
पहली ही फिल्म से व्यापक लोकप्रियता हासिल करने के बाद सुषमा श्रेष्ठ बॉलीवुड के शीर्ष संगीत निर्देशकों की पहली पसंद बन गईं। 1970 के दशक में जब भी किसी फिल्म की पटकथा में बच्चों पर आधारित गीत की जरूरत होती, तो संगीतकारों के दिमाग में सबसे पहला नाम सुषमा का ही आता था। इसी दौर में उन्हें भारतीय संगीत जगत के एक और महानायक किशोर कुमार के साथ काम करने का अवसर मिला। वर्ष 1973 में आई फिल्म आ गले लग जा में उन्होंने किशोर कुमार के साथ कालजयी गीत तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई को अपनी आवाज दी।
एक तरफ जहां किशोर कुमार की चुलबुली, ऊर्जावान और सहज शैली थी, वहीं दूसरी तरफ मोहम्मद रफी की संजीदगी और अनुशासन था। इन दोनों महान दिग्गजों की छत्रछाया और मार्गदर्शन में काम करते हुए सुषमा के गायन कौशल में निरंतर निखार आता गया। 70 के दशक में उन्होंने एक के बाद एक कई प्रसिद्ध फिल्मों में अपनी आवाज का जादू बिखेरा। उन्होंने फिल्म द बर्निंग ट्रेन के बेहद भावुक और लोकप्रिय गीत तेरी है जमीन तेरा आसमां में अपनी आवाज दी, वहीं फिल्म पति पत्नी और वो के मस्ती भरे गीत ठंडे-ठंडे पानी से नहाना चाहिए को भी अपनी आवाज से यादगार बना दिया।
पंजाब एसोसिएशन का कार्यक्रम और पिता के निधन के बाद का कठिन इम्तिहान
सफलता के इस सुनहरे दौर के बीच सुषमा श्रेष्ठ के जीवन में एक ऐसी दुखद घटना घटी, जिसने उनके व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन को हिलाकर रख दिया। मुंबई की पंजाब एसोसिएशन की ओर से एक बहुत बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, जिसमें हिंदी सिनेमा जगत की शीर्ष हस्तियां जैसे राज कपूर, अभिनेता प्राण और संगीतकार जयदेव मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करने वाले थे। इस भव्य मंच पर सुषमा को अपनी गायकी का प्रदर्शन करना था। उनके पिता भोला श्रेष्ठ कई सप्ताह से अपनी बेटी को इस कार्यक्रम के लिए विशेष तैयारी और रियाज करा रहे थे। परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था, कार्यक्रम के आयोजन से ठीक एक दिन पहले अचानक उनके पिता का निधन हो गया।
पिता के आकस्मिक निधन से पूरा परिवार गहरे शोक और सदमे में डूब गया। ऐसे अत्यंत भावुक माहौल में ऐसा प्रतीत हो रहा था कि नन्हीं सुषमा अब किसी भी कीमत पर मंच पर जाकर नहीं गा पाएगी। लेकिन दुख की इस घड़ी में उनकी मां ने असीम धैर्य दिखाते हुए सुषमा को सांत्वना दी और पिता के अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए मंच पर जाने की हिम्मत बंधाई। उनके पिता के घनिष्ठ मित्र और महान गायक किशोर कुमार ने भी सुषमा के पास जाकर उन्हें प्रेरित किया और कहा कि पिता को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि वह मंच पर जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करे।
अगले दिन भारी मन से सुषमा कार्यक्रम स्थल पर पहुंचीं। मंच पर हारमोनियम पर उनका साथ देने के लिए उनके दिवंगत पिता की जगह प्रसिद्ध गायक नरेंद्र चंचल बैठे। गमगीन और भावुक माहौल के बीच सुषमा ने अपनी आंखों में आंसू लिए केवल दो गाने प्रस्तुत किए। उनकी प्रस्तुति समाप्त होते ही दिग्गज अभिनेता प्राण स्वयं मंच पर आए। उन्होंने माइक संभालकर सभागार में मौजूद तमाम दर्शकों को जानकारी दी कि जिस नन्हीं बच्ची ने अभी-अभी आपके सामने इतनी सुंदर प्रस्तुति दी है, उसने केवल एक दिन पहले ही अपने पिता को खोया है। यह सुनते ही पूरा हॉल स्तब्ध रह गया और सभी दर्शक अपनी सीटों से खड़े होकर कई मिनटों तक सुषमा के सम्मान और साहस में तालियां बजाते रहे। उसी मंच से पंजाब एसोसिएशन ने सुषमा की आगे की संगीत शिक्षा के खर्च को उठाने के लिए 250 रुपये प्रतिमाह की छात्रवृत्ति देने का ऐलान किया। सुषमा ने बाद में कई साक्षात्कारों में स्वीकार किया कि वास्तव में उनके संगीत करियर की असली और मजबूत नींव उसी भावुक शाम को पड़ी थी।
'इतनी शक्ति हमें देना दाता' की रचना और पूर्णिमा के रूप में नया अवतार
बाल कलाकार के तौर पर अपने लंबे और सफल सफर के अंतिम पड़ाव में सुषमा श्रेष्ठ ने वर्ष 1986 में फिल्म अंकुश के लिए अपनी आवाज रिकॉर्ड कराई। इस फिल्म का गीत इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना भारतीय संगीत इतिहास का एक मास्टरपीस साबित हुआ। सुदर्शन फाकिर द्वारा लिखे गए और कुलदीप सिंह द्वारा संगीतबद्ध किए गए इस गीत ने देश के कोने-कोने में अपनी पहचान बनाई। बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट सुषमा के नाम से गाया गया यह आखिरी प्रमुख फिल्मी गाना था, जो आज भी भारत के हजारों सरकारी व निजी विद्यालयों में रोजाना सुबह की प्रार्थना सभा का मुख्य हिस्सा बना हुआ है।
इसके बाद 1990 के दशक में सुषमा श्रेष्ठ ने अपने जीवन और करियर का एक नया अध्याय शुरू किया। उन्होंने वयस्कों के लिए पार्श्व गायन की दुनिया में कदम रखते हुए अपना नया नाम पूर्णिमा अपना लिया। पूर्णिमा के रूप में उन्होंने 90 के दशक के कमर्शियल बॉलीवुड सिनेमा में अपनी आवाज का सिक्का जमाया। उन्होंने गोविंदा, करिश्मा कपूर और रवीना टंडन जैसे बड़े कलाकारों की फिल्मों के लिए सरकाई लो खटिया जाड़ा लगे और चना के खेत में जैसे बेहद लोकप्रिय और मनोरंजक गीत गाए, जो आज भी भारतीय पॉप कल्चर का हिस्सा बने हुए हैं। एक नन्हीं बाल गायिका से लेकर देश की सर्वकालिक महान प्रार्थना की आवाज बनने और फिर 90 के दशक की स्टार सिंगर बनने तक का सुषमा श्रेष्ठ का यह सफर भारतीय संगीत जगत की सबसे विरली और प्रेरणादायक कहानियों में से एक है।



















