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फीफा वर्ल्ड कप के जोश में डूबे हैं? भारतीय सिनेमा की ये 8 फुटबॉल फिल्में आपके जुनून को कर देंगी दोगुनाबॉलीवुड
18 जून 2026, 4:23 am (132 दिन पहले)· 3

फीफा वर्ल्ड कप के जोश में डूबे हैं? भारतीय सिनेमा की ये 8 फुटबॉल फिल्में आपके जुनून को कर देंगी दोगुना

फीफा वर्ल्ड कप की दीवानगी के बीच भारतीय सिनेमा की उन 8 फिल्मों पर एक नजर, जिनमें फुटबॉल के साथ ड्रामा, इमोशन और देशप्रेम की कहानियां गुंथी हुई हैं।

इन दिनों पूरी दुनिया पर फुटबॉल का बुखार चढ़ा हुआ है। फीफा वर्ल्ड कप के मैचों को लेकर हर जगह रोमांच है और फैंस अपनी पसंदीदा टीमों के लिए जमकर नारे लगा रहे हैं। अगर आप भी इस खेल के दीवाने हैं और मैदान के बाहर भी फुटबॉल का रोमांच जीना चाहते हैं, तो भारतीय सिनेमा के पास आपके लिए एक शानदार पिटारा है। हिंदी से लेकर बंगाली, तमिल और मलयालम तक, कई भाषाओं में ऐसी फिल्में बनी हैं जो इस खेल के जज्बे को परदे पर बखूबी उतारती हैं। आइए जानते हैं ऐसी ही 8 फिल्मों के बारे में।

असल जिंदगी से निकली प्रेरक कहानियां

अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘झुंड’ (2022) फुटबॉल की बदलाव लाने वाली ताकत को सामने रखती है। यह कहानी विजय बारसे के असल जीवन से प्रेरित है, जो एक रिटायर्ड स्पोर्ट्स टीचर की भूमिका निभाते हैं। वह झुग्गी-झोपड़ियों में पल रहे गरीब बच्चों की बेलगाम ऊर्जा को फुटबॉल के जरिए सही राह दिखाता है और इसी खेल के दम पर उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल देता है।

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अजय देवगन की फिल्म ‘मैदान’ भारतीय फुटबॉल के दिग्गज कोच सैयद अब्दुल रहीम के जीवन पर बुनी गई है। यह 1952 से 1962 के उस सुनहरे दौर को परदे पर जिंदा करती है, जब भारतीय फुटबॉल अपने शिखर पर था और टीम ने एशियन गेम्स में ऐतिहासिक जीत हासिल की थी।

मलयालम सिनेमा की ‘कैप्टन’ (2018) उन दर्शकों के लिए है जो फुटबॉल के इतिहास में दिलचस्पी रखते हैं। यह फिल्म भारतीय फुटबॉल टीम के कप्तान रहे वीपी सत्यन के जीवन पर आधारित बायोपिक है।

संघर्ष, पहचान और हौसले की दास्तान

साल 2007 में आई जॉन अब्राहम की ‘धन धना धन गोल’ फुटबॉल प्रेमियों के बीच आज भी खास जगह रखती है। यह कहानी ब्रिटेन के साउथॉल में बसे एशियाई मूल के खिलाड़ियों के एक फुटबॉल क्लब की है, जो नस्लवाद और कड़ी आर्थिक तंगी से जूझते हुए अपनी पहचान की लड़ाई लड़ता है।

थलापति विजय की ब्लॉकबस्टर ‘बिगिल’ में ‘माइकल’ नाम का एक पूर्व फुटबॉलर महिलाओं की फुटबॉल टीम का कोच बन जाता है। वह खिलाड़ियों को सिर्फ खेल के दांवपेच ही नहीं सिखाता, बल्कि समाज और निजी जिंदगी की मुश्किलों से लड़ने का हौसला भी देता है।

जब फुटबॉल बना आजादी और आत्मसम्मान का प्रतीक

बंगाली फिल्म ‘एगारो’ भी हर फुटबॉल दीवाने की वॉचलिस्ट में होनी चाहिए। इसमें दिखाया गया है कि कैसे मोहन बागान ने 1911 में ब्रिटिश ईस्ट यॉर्कशायर रेजिमेंट को मात देकर आईएफए शील्ड अपने नाम की थी।

देशप्रेम और खेल के इसी मेल को आगे बढ़ाती हैं ‘खेलें हम जी जान से’ (2010) और देव अधिकारी की बंगाली फिल्म ‘गोलोंदाज’ (2021)। दोनों ही फिल्में फुटबॉल प्रेमियों के लिए देखने लायक हैं।

‘गोलोंदाज’ नागेंद्र प्रसाद सरबाधिकारी के जीवन के जरिए यह बताती है कि अंग्रेजों के शासनकाल में फुटबॉल महज एक खेल नहीं रह गया था। यह देश के आत्मसम्मान और आजादी की लड़ाई का एक मजबूत प्रतीक बन चुका था।

वर्ल्ड कप की इस गहमागहमी के बीच ये आठों फिल्में आपको खेल के रोमांच के साथ-साथ इमोशन, संघर्ष और देशभक्ति की भरपूर खुराक देती हैं।

सवाल-जवाब

‘झुंड’ फिल्म किसके जीवन से प्रेरित है?
अमिताभ बच्चन की ‘झुंड’ (2022) विजय बारसे के असल जीवन से प्रेरित है, जो एक रिटायर्ड स्पोर्ट्स टीचर की भूमिका में हैं।
‘मैदान’ फिल्म किस दौर पर आधारित है?
अजय देवगन की ‘मैदान’ कोच सैयद अब्दुल रहीम के जीवन और 1952 से 1962 के भारतीय फुटबॉल के स्वर्णिम युग पर आधारित है।
‘एगारो’ में कौन सी ऐतिहासिक घटना दिखाई गई है?
इस बंगाली फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे मोहन बागान ने 1911 में ब्रिटिश ईस्ट यॉर्कशायर रेजिमेंट को हराकर आईएफए शील्ड जीती थी।
मलयालम फिल्म ‘कैप्टन’ किस पर बनी है?
‘कैप्टन’ (2018) भारतीय फुटबॉल टीम के कप्तान रहे वीपी सत्यन की बायोपिक है।
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