मनोरंजन उद्योग की चकाचौंध के पीछे छिपे अनिश्चितता के दौर कई बार कलाकारों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। अभिनेता एवं फिल्म निर्देशक राजू खेर ने अपने जीवन के ऐसे ही एक कठिन आर्थिक संकट को याद करते हुए बताया कि कैसे एक महत्वकांक्षी टीवी शो में अपनी सारी जमा पूंजी लगा देने के बाद वह बेसहारा महसूस करने लगे थे। उन्होंने एक प्रसारण मंच के लिए बड़ा दांव खेला था, लेकिन परियोजना शुरू होने से पहले ही वह उपक्रम अचानक बंद हो गया। इस उथल-पुथल के बीच जब उनके सिर पर छत और दैनिक खर्चों का संकट मंडराने लगा, तब अपने सगे भाई अनुपम खेर से अपेक्षित सहारा न मिलने का दर्द भी उनके मन में लंबे समय तक कचोटता रहा।
मकान की बिक्री और टीवी शो में पूरी पूंजी का निवेश
सिद्धार्थ कन्नन के साथ एक साक्षात्कार के दौरान राजू खेर ने उस दौर की तंगहाली का ब्योरा साझा किया। उस समय भारतीय टेलीविजन बाजार में एक नया चैनल अपनी शुरुआत की तैयारी कर रहा था, जिसके चलते कई निर्माण कंपनियां नए कार्यक्रमों के पायलट संस्करण तैयार कर रही थीं। कई समझौतों पर हस्ताक्षर होने के बाद राजू ने भी अपनी पूरी ऊर्जा और संसाधन झोंकते हुए ‘लाइफ के लिए कुछ भी करेगा’ शीर्षक से एक नया धारावाहिक विकसित करने की योजना बनाई।
इस निर्माण कार्य के लिए आवश्यक बजट जुटाने के वास्ते उन्होंने अपनी बचत के साथ-साथ अपने चार कमरों वाले सुव्यवस्थित मकान को बेचकर प्राप्त हुई बड़ी धनराशि भी लगा दी थी। उस वक्त उन्हें पूरा विश्वास था कि यह उपक्रम उनकी पेशेवर दिशा और घरेलू सुरक्षा दोनों को एक मजबूत आधार प्रदान करेगा। मगर स्थिति ने अचानक प्रतिकूल मोड़ ले लिया। बिना किसी पूर्व सूचना अथवा आधिकारिक स्पष्टीकरण के वह प्रसारण संस्थान रातोंरात बंद हो गया। जब राजू वहां पहुंचे, तो कार्यालय के मुख्य द्वार पर ताला लटका मिला और प्रबंधन पूरी तरह गायब था, जिससे उनका समूचा निवेश अचानक डूब गया।
आजीविका का ठहराव और घर का भाड़ा भरने की चुनौती
पूंजी डूब जाने के तुरंत बाद उनके सामने दिन-प्रतिदिन के खर्चों का दबाव बढ़ने लगा। उद्योग में उस समय उन्हें नियमित अभिनय या निर्देशन के नए अवसर भी प्राप्त नहीं हो रहे थे, जबकि परिवार के निर्वाह और किराए के मकान का भुगतान करने का दबाव लगातार बना हुआ था। इस अप्रत्याशित वित्तीय झटके से बाहर निकलने का कोई सीधा रास्ता उन्हें नहीं सूझ रहा था।
अपनी इस मानसिक और आर्थिक उलझन को साझा करने के लिए उनके पास सीमित विकल्प थे। ऐसी नाजुक स्थिति में उनका ध्यान स्वाभाविक रूप से अपने बड़े भाई की ओर गया। चूंकि अनुपम खेर उस समय तक सिनेमा में एक प्रतिष्ठित और सफल नाम बन चुके थे, इसलिए छोटे भाई के नाते उनके मन में यह स्वाभाविक उम्मीद बंधी कि परिवार का यह बड़ा सदस्य उन्हें इस दलदल से उबारने के लिए वित्तीय संबल जरूर देगा।
बड़े भाई से अपेक्षित सहयोग न मिलने का मलाल
राजू ने खुलकर साझा किया कि उस मुश्किल घड़ी में मदद न मिलने पर उनके मन में भारी मायूसी और शिकायत पैदा हो गई थी। उन्हें लगा था कि सगा भाई होने के नाते अनुपम को संकट के समय खुद आगे आकर जिम्मेदारी उठानी चाहिए थी। जब बात नहीं बनी और कोई आर्थिक सहारा हासिल नहीं हुआ, तो यह दूरी उनके भीतर खटास छोड़ गई।
हालांकि उस समय की जमीनी सच्चाई यह भी थी कि अनुपम स्वयं अपने पेशेवर जीवन के एक जटिल पड़ाव से जूझ रहे थे। वह केवल संख्या बढ़ाने के लिए सामान्य किरदारों को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे, बल्कि सार्थक एवं चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं की प्रतीक्षा कर रहे थे। अपने इस कलात्मक चयन के चलते उन्होंने उस अवधि में नई फिल्मों में काम करने की गति काफी धीमी कर रखी थी। राजू मानते हैं कि उस समय वह केवल अपनी तात्कालिक जरूरतों को देख रहे थे और इस वजह से उन्हें लगा कि उनके भाई ने उनकी उपेक्षा की।
समय के साथ बदली पारिवारिक दृष्टिकोण की समझ
वर्षों बीत जाने के बाद राजू के सोचने के नजरिए में गहरा बदलाव आया और उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने अपने भाई की स्थिति का सतही मूल्यांकन किया था। एक साक्षात्कार में जब उन्होंने अपने भाई द्वारा स्वयं की निजी भावनाओं और अपनी संतान न होने के दर्द पर बात करते हुए पढ़ा, तो उनकी सोच की दिशा बदल गई।
इस आत्ममंथन ने उन्हें यह समझाया कि किसी व्यक्ति की बाहरी आर्थिक मजबूती का अर्थ यह नहीं होता कि उसका आंतरिक जीवन संघर्षों से मुक्त है। अनुपम के भीतर भी अपने अनकहे व्यक्तिगत अभाव, जटिलताएं और भावनात्मक लड़ाइयां चल रही थीं। राजू ने स्वीकार किया कि उस संकटकाल में वह अपने भाई के आंतरिक संघर्षों और परिस्थितियों को समग्रता से समझने में चूक गए थे और उन्होंने अपने रिश्ते को केवल अपनी अपेक्षाओं के चश्मे से आंका था।
सिनेमा और धारावाहिकों में खेर बंधुओं का सफर
हिंदी मनोरंजन जगत में खेर परिवार के दोनों भाइयों ने अपनी विशिष्ट अभिनय शैली से दर्शकों के बीच पहचान कायम की है। अनुपम खेर जहां चरित्र और मुख्य भूमिकाओं में राष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष पायदान पर पहुंचे, वहीं राजू खेर ने नब्बे के दशक में अभिनय की दुनिया में कदम रखा और बाद में निर्देशन की कमान भी संभाली।
छोटे पर्दे पर अपनी गहरी छाप छोड़ने के अलावा राजू ने कई चर्चित फिल्मों में अपने अभिनय का हुनर दिखाया है। उनके उल्लेखनीय अभिनय सफर में ‘गुलाम’, ‘जंगल’, ‘ओम जय जगदीश’, ‘शूटआउट एट वडाला’, ‘कृष 3’, ‘मैं तेरा हीरो’, ‘उंचाई’ तथा ‘पटना शुक्ला’ जैसी फिल्में शामिल रही हैं, जहां उन्होंने विविध किरदारों को सहजता से पर्दे पर जिया।


















