भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसी शुरुआत होती हैं जो दर्शकों की यादों में हमेशा के लिए दर्ज हो जाती हैं। आज से इकतीस बरस पहले जब सिनेमाघरों में दो नए चेहरों की दस्तक हुई, तो पूरा देश उत्सुकता से भर उठा था। एक ओर दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र के छोटे सुपुत्र बड़े पर्दे पर अपनी किस्मत आजमाने उतरे थे, तो दूसरी ओर पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना और अदाकारा डिंपल कपाड़िया की लाडली बेटी का जादू बिखरने वाला था। छह अक्टूबर उन्नीस सौ पचानवे को पर्दे पर आई इस रोमांटिक गाथा ने न सिर्फ युवाओं को दीवाना बनाया, बल्कि उस दौर के कड़े मुकाबले के बीच बॉक्स ऑफिस पर एक यादगार मुकाम भी हासिल किया।
दो बड़े फिल्मी परिवारों का ऐतिहासिक संगम और वर्षों की मेहनत
नब्बे के दशक में जब स्टार संतानों के पदार्पण को लेकर खास चर्चाएं नहीं होती थीं, तब इस बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट के ऐलान ने हर किसी को रोमांचित कर दिया था। धर्मेंद्र अपने लाडले बेटे की शुरुआत को सबसे भव्य और यादगार रूप देना चाहते थे। इसी सोच के तहत निर्देशन की कमान राजकुमार संतोषी के हाथों में सौंपी गई, जिन्होंने उस वक्त तक घायल और दामिनी जैसी कालजयी और दमदार कृतियों से अपनी खास पहचान बनाई थी।
बड़े पर्दे पर कदम रखने से पहले किसी भी तरह की कसर बाकी नहीं छोड़ी गई थी। मुख्य अभिनेता ने लगभग दो से तीन साल तक कड़ा अभ्यास किया, जिसमें घुड़सवारी सीखने से लेकर मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग और अभिनय की बारीकियां समझना शामिल था। दूसरी तरफ, नवोदित अभिनेत्री की सहज मासूमियत और आकर्षण ने उन्हें इस प्रेम कहानी की नायिका के तौर पर एकदम मुकम्मल साबित किया। जब यह पेशकश दर्शकों के सामने पहुंची, तो उम्मीदों के भारी दबाव के बावजूद दोनों नए कलाकारों ने अपनी अदाकारी से हर वर्ग को प्रभावित किया।
सादगी और टकराव के ताने-बाने पर टिकी भावनात्मक कहानी
कथानक का मुख्य केंद्र एक सीधा-सादा और निडर ग्रामीण युवक है, जिसका नाम बादल है। वह उच्च शिक्षा हासिल करने के उद्देश्य से शहर के एक कॉलेज में दाखिला लेता है। वहीं उसकी भेंट टीना नाम की एक संपन्न, हठी मगर दिल की बेहद साफ लड़की से होती है। शुरुआती तकरार, नोकझोंक और गलतफहमियों के दौर से गुजरते हुए दोनों के दिलों में एक गहरा और अटूट लगाव जन्म ले लेता है।
लेकिन यह सफर इतना आसान नहीं रहता। कहानी में नया मोड़ तब आता है जब नायिका का मतलबी सौतेला पिता और पुलिस महकमे में तैनात उसका भाई इस रिश्ते की राह में दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं। नायक पर झूठे और मनगढ़ंत आरोप मढ़ दिए जाते हैं, उसे हवालात के पीछे धकेला जाता है और अमानवीय यातनाएं दी जाती हैं। इन तमाम अड़चनों के बावजूद बादल अपने प्यार की खातिर हर जुल्म का डटकर मुकाबला करता है। निर्देशक ने गांव के शांत वातावरण और शहरी चकाचौंध के अंतर्विरोध को बेहद बारीकी से कैमरे में कैद किया। इसके अलावा परेश रावल, डैनी डेन्जोंगपा और मुकेश ऋषि जैसे मंझे हुए कलाकारों ने नकारात्मक किरदारों में जान फूंक दी, जिससे पर्दे पर होने वाला संघर्ष और अधिक रोमांचक बन गया।
नदीम-श्रवण का सुरीला संगीत जिसने रिलीज से पहले ही मचाई धूम
उस जमाने में किसी भी प्रेम कथा की कामयाबी के लिए कर्णप्रिय धुनों का होना पहली शर्त मानी जाती थी। संगीतकार जोड़ी नदीम-श्रवण ने इस प्रोजेक्ट के लिए ऐसा अद्भुत संगीत तैयार किया जो तीन दशक बीत जाने के बाद भी श्रोताओं की जुबान पर चढ़ा हुआ है। एल्बम के सभी प्रमुख नगमे कैसेट प्लेयरों और ऑल इंडिया रेडियो पर लगातार गूंजते रहते थे।
अलका याग्निक, कुमार सानू तथा सोनू निगम के सुरों से सजे गीतों ने हर आशिक के दिल को छू लिया। फिल्म के थियेटरों में पहुंचने से कई महीने पहले ही इसके ऑडियो कैसेट्स ने बिक्री के तमाम पिछले कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए थे। गानों की इस जबरदस्त लोकप्रियता ने सिनेमाघरों की टिकट खिड़कियों पर दर्शकों की लंबी कतारें लगवाने में सबसे अहम भूमिका निभाई।
जबरदस्त बॉक्स ऑफिस मुकाबला और सुपरहिट का तमगा
जिस दौर में यह फिल्म रिलीज हुई, वह साल हिंदी सिनेमा के सबसे कठिन और प्रतिस्पर्धी वर्षों में गिना जाता है। उसी वर्ष शाहरुख खान की दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे और करण अर्जुन जैसी रिकॉर्ड तोड़ फिल्में भी दर्शकों के सामने आई थीं। इतने बड़े सितारों और भारी चर्चाओं के बीच दो नए कलाकारों की इस पेशकश ने अपनी एक अलग और ठोस जगह बनाई।
शुरुआती वीकेंड से ही सिनेमाघरों पर हाउसफुल के बोर्ड टंगने लगे थे। व्यापार विशेषज्ञों और बॉक्स ऑफिस विश्लेषकों के आंकड़ों के अनुसार, इस प्रस्तुति ने अपने पूरे प्रदर्शन के दौरान उन्नीस करोड़ रुपये से अधिक का शुद्ध कारोबार किया, जिसकी कीमत मौजूदा दौर के हिसाब से सौ करोड़ रुपये से भी अधिक बैठती है। इस शानदार प्रदर्शन के बलबूते यह उस पूरे साल की चौथी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली पेशकश बन गई और ट्रेड पंडितों ने इसे आधिकारिक रूप से सुपरहिट का दर्जा दिया। इसने यह साबित किया कि नामचीन सितारों के बिना भी नई ऊर्जा और सच्ची कहानी दर्शकों को थियेटर तक खींच सकती है।
युवाओं के नए स्टाइल आइकन और फिल्मफेयर का सम्मान
इस अप्रत्याशित कामयाबी ने दोनों युवा कलाकारों को एक ही झटके में पूरे देश का चहेता बना दिया। पहली ही झलक में वे उस दौर की युवा पीढ़ी के सबसे बड़े आदर्श बन गए। मुख्य अभिनेता के घुंघराले बाल, लंबे केश, काला चश्मा और लेदर जैकेट का पहनावा कॉलेज के छात्रों के बीच एक बड़ा फैशन स्टेटमेंट बन गया। हर नौजवान उनके जैसा दिखने की हसरत पाले नजर आता था। इस बेमिसाल शुरुआत के लिए उन्हें उस साल के सर्वश्रेष्ठ मेल डेब्यू का फिल्मफेयर पुरस्कार प्रदान किया गया।
वहीं दूसरी ओर अपनी मां की छवि मानी जाने वाली अभिनेत्री ने अपनी सादगी भरी मुस्कान और चुलबुले अंदाज से अनगिनत दिलों पर राज किया। उन्हें भी बेहतरीन अभिनय के लिए बेस्ट फीमेल डेब्यू का फिल्मफेयर ट्रॉफी दी गई और उनके पास नए प्रोजेक्ट्स की लाइन लग गई। हालांकि समय के साथ दोनों ने अपने जीवन और करियर में अलग-अलग राहें चुनीं, लेकिन यह पहली यात्रा उनके फिल्मी जीवन का सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित हुई जिसे तीन दशक बाद भी बेहद सम्मान के साथ याद किया जाता है।



















