किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि अमेरिकी मिशनरियों के घर में पला-बढ़ा एक लड़का एक दिन हिंदी सिनेमा की पहचान बन जाएगा। मगर टॉम अल्टर ने यही किया। 22 जून 1950 को मसूरी में जन्मे टॉम के दादा-दादी एम्मेट और मार्था अल्टर 1916 में ईसाई मिशनरी के रूप में भारत आए थे। 1947 के विभाजन ने परिवार को तोड़ा। दादा-दादी लाहौर में रह गए, जबकि टॉम के माता-पिता मसूरी के पास राजपुर में बस गए और भारत को ही अपना घर बना लिया।
एक फिल्म ने बदल दी ज़िंदगी की दिशा
बचपन में राजेश खन्ना की फिल्म 'आराधना' देखना टॉम अल्टर के लिए एक निर्णायक पल साबित हुआ। उस फिल्म ने उनके भीतर अभिनेता बनने की ऐसी आग जलाई जो कभी बुझी नहीं। इस सपने को अमली जामा पहनाने के लिए वह पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (FTII) पहुँचे और 1974 में गोल्ड मेडल के साथ वहाँ से निकले।
गोरी रंगत ने बनाया विलेन, लेकिन हुनर ने बनाया अमर
मुंबई में क़दम रखते ही उनकी गोरी रंगत ने उनकी पहचान तय कर दी। अंग्रेज़ अफसर, विदेशी खलनायक, ऐसे ही किरदार उनके पास आते रहे। लेकिन टॉम ने हिंदी और उर्दू पर अपनी बेमिसाल पकड़ और संवाद अदायगी की ताकत से हर भूमिका को यादगार बना दिया। धर्मेंद्र के साथ फिल्म 'चरस' में उन्होंने चीफ कस्टम ऑफिसर का किरदार निभाया।
असली पहचान देव आनंद की फिल्म 'साहेब बहादुर' से मिली। इसके बाद सत्यजीत रे ने उन्हें अपनी ऐतिहासिक फिल्म 'शतरंज के खिलाड़ी' में कैप्टन वेस्टन की भूमिका सौंपी, जो उनके करियर की एक बड़ी उपलब्धि बनी। 'क्रांति' और 'गांधी' जैसी फिल्मों में ऐतिहासिक किरदार, 'परिंदा' में अंडरवर्ल्ड डॉन मूसा की दहशत भरी भूमिका और 'राम तेरी गंगा मैली' में करम सिंह का किरदार, इन सबने टॉम को एक अलग मुकाम दिला दिया।
'आशिकी' में बने सख्त हॉस्टल वॉर्डन
1990 में महेश भट्ट की ब्लॉकबस्टर फिल्म 'आशिकी' में एक बार फिर टॉम अल्टर नकारात्मक भूमिका में दिखे। उन्होंने आर्नी कैंपबेल का किरदार निभाया, जो फिल्म में एक सख्त और नकारात्मक गर्ल्स हॉस्टल वॉर्डन था। इस फिल्म में उनका काम राहुल (राहुल रॉय) और अनु (अनु अग्रवाल) के बीच दीवार बनना था।
क्रिकेट से लगाव और सचिन का वह पहला इंटरव्यू
टॉम अल्टर सिर्फ सिनेमा के कलाकार नहीं थे, क्रिकेट से उनका रिश्ता भी बेहद गहरा था। 1983 में भारत की विश्व कप जीत के बाद उन्होंने सुनील गावस्कर की अगुवाई वाली 'इंडियन इलेवन' टीम की तरफ से अमेरिका में एक प्रदर्शनी मैच खेला और एक विकेट भी अपने नाम किया।
खेल पत्रकारिता में उनका एक किस्सा इतिहास के पन्नों में दर्ज है। 19 जनवरी 1989 को मुंबई के CCI नेट्स पर उन्होंने एक 15 साल के शर्मीले और घुंघराले बालों वाले लड़के का पहला टीवी इंटरव्यू लिया था। वह लड़का कोई और नहीं, सचिन तेंदुलकर थे, जो आगे चलकर क्रिकेट की दुनिया का सबसे बड़ा नाम बने।
टेलीविजन ने दिलाई घर-घर पहचान
छोटे पर्दे पर भी टॉम अल्टर का जादू खूब चला। 'ज़बान संभाल के' में चार्ल्स स्पेंसर्स, 'जुनून' में केशव कालसी और बच्चों के चहेते शो 'शक्तिमान' में महागुरु का किरदार निभाकर उन्होंने हर उम्र के दर्शकों में खास जगह बनाई।
कैंसर से जूझते हुए भी नहीं थमे कदम
2016 में उन्हें त्वचा के दुर्लभ और आक्रामक कैंसर स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा का पता चला। इस भयंकर बीमारी से लड़ते हुए भी उन्होंने मार्च 2017 में अपने नाटक 'संस ऑफ बाबर' का मंचन किया। आखिरकार 29 सितंबर 2017 को यह बहुमुखी और अनूठा कलाकार इस दुनिया से विदा हो गया, लेकिन अपनी फिल्मों, टीवी शोज़ और थिएटर के ज़रिए वह हमेशा के लिए ज़िंदा हैं।













