साहित्यिक कृतियों का सिनेमाई रूपांतरण हमेशा से फिल्मकारों के बीच लोकप्रिय रहा है। साल 1899 में प्रकाशित हुए एक उर्दू उपन्यास उमराव जान अदा को अपनी विधा की पहली आधुनिक रचना माना जाता है। उन्नीसवीं सदी के लखनऊ की पृष्ठभूमि पर रची गई यह कहानी एक तवायफ के जीवन संघर्षों को सामने लाती है। समय के साथ इस उपन्यास ने कई फिल्म निर्देशकों का ध्यान अपनी ओर खींचा और विभिन्न देशों में इसे पर्दे पर उतारा गया।
पहली cinematic प्रस्तुति और पाकिस्तान का सफर
इस साहित्यिक कृति पर सबसे पहले cinematic प्रयोग पड़ोसी देश पाकिस्तान में हुआ। साल 1972 में इसी उपन्यास के नाम पर एक म्यूजिकल रोमांटिक फिल्म बनाई गई, जिसे हसन तारीक ने निर्देशित किया था। इस पाकिस्तानी प्रोजेक्ट में मुख्य भूमिका रानी बेगम ने निभाई थी। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल रही और सिनेमाघरों में अपने पचास दिन पूरे करने में कामयाब रही। इसके अलावा, पाकिस्तान में इस पर एक टेलीविजन धारावाहिक का निर्माण भी किया गया था, जो इस कहानी की लोकप्रियता को दर्शाता है।
रेखा की क्लासिक फिल्म और उसका संगीत
भारतीय सिनेमा के इतिहास में इस उपन्यास का सबसे यादगार रूपांतरण साल 1981 में आया। मुजफ्फर अली ने इस किताब की गहराई को समझते हुए फिल्म उमराव जान का निर्देशन किया। इस प्रोजेक्ट में रेखा ने मुख्य तवायफ का किरदार निभाया और अपने अभिनय से इतिहास रच दिया। उनके साथ फारूख शेख, नसीरुद्दीन शाह, राज बब्बर, शौकत कैफी और सतीश शाह जैसे दिग्गज कलाकार नजर आए। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके गीत थे। खय्याम के संगीत, शहरयार के बोल और आशा भोसले की आवाज ने मिलकर ऐसा जादू चलाया कि दिल चीज क्या है और ये क्या जगह है दोस्तों जैसे गाने अमर हो गए।
राष्ट्रीय पुरस्कार और कल्ट का दर्जा
मुजफ्फर अली की यह प्रस्तुति बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर साबित हुई और इसे एक कल्ट क्लासिक का दर्जा मिला। 29वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में इस प्रोजेक्ट ने चार राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम किए। इसमें रेखा को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के खिताब से नवाजा गया, जबकि फिल्मफेयर पुरस्कारों में भी इसका दबदबा रहा। दर्शकों ने रेखा के काम को खूब सराहा और यह भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन कृतियों में गिनी जाने लगी।
ऐश्वर्या राय स्टारर रीमेक और बॉक्स ऑफिस पर नाकामी
पुरानी सफलता को भुनाने के प्रयास में साल 2006 में जे.पी. दत्ता ने इसी नाम से एक नया प्रोजेक्ट तैयार किया। इस बार मुख्य भूमिका में ऐश्वर्या राय नजर आईं, जिनके साथ अभिषेक बच्चन, शबाना आजमी, सुनील शेट्टी, दिव्या दत्ता, हिमानी शिवपुरी और कुलभूषण खरबंदा ने काम किया। इस संस्करण में अनु मलिक ने संगीत दिया और जावेद अख्तर ने गीत लिखे, जबकि अलका याज्ञनिक, सोनू निगम और रिचा शर्मा जैसे गायकों ने अपनी आवाज दी। सलाम और अगले जन्म मोहे बिटिया जैसे गाने कुछ हद तक चर्चा में आए।
धीमी गति और टॉक्सिक प्रतिक्रिया
नवीनतम संस्करण दर्शकों और समीक्षकों दोनों के दिलों पर छाप छोड़ने में पूरी तरह विफल रहा। यह फिल्म अपने बजट की आधी रकम भी सिनेमाघरों से वसूल नहीं कर पाई। जानकारों और दर्शकों का मानना था कि इसकी धीमी गति, नीरस पटकथा और अत्यधिक लंबाई ने इसका बेड़ा गर्क कर दिया। 1981 की क्लासिक फिल्म के जादुई प्रभाव को यह संस्करण दोहरा नहीं सका, जिसके चलते लोगों ने इसे निराशाजनक और टॉक्सिक करार दिया।



















