अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की पूर्व प्रमुख और जानी-मानी अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने तकनीक क्षेत्र में हो रहे भारी भरकम खर्च को लेकर दुनिया को आगाह किया है। उनका मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियों द्वारा किया जा रहा अंधाधुंध निवेश आने वाले समय में देश को आर्थिक मंदी की चपेट में ला सकता है। इस स्थिति के कारण बाजार में बड़ा करेक्शन देखने को मिल सकता है, जिससे कंपनियों के मुनाफे और खर्च का संतुलन बिगड़ जाएगा।
निवेश और मुनाफे का बड़ा अंतर
गीता गोपीनाथ ने इस बात पर जोर दिया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता इस समय वैश्विक स्तर पर निवेश का सबसे बड़ा केंद्र बन चुकी है। तमाम बड़ी कंपनियां इसके बुनियादी ढांचे और तकनीक विकास पर पानी की तरह पैसा बहा रही हैं। लागत के इस बढ़ते बोझ को संतुलित करने के लिए कुछ व्यावसायिक संस्थानों ने कर्मचारियों की छंटनी का रास्ता भी चुना है, लेकिन इससे मूल समस्या का समाधान होता नहीं दिख रहा है। हालांकि निवेशक इस दौड़ में शामिल होने के लिए उत्सुक हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि क्या ये कंपनियां अपनी लगाई गई लागत को सही समय पर वसूल कर पाएंगी। फिलहाल अमेरिका, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों में इस तकनीक के कारण तेजी जरूर दिखाई दे रही है, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है।
बाजार में सुधार और दो विपरीत रुझान
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और पूर्व अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष प्रमुख ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया है कि बाजार में एक बड़ा करेक्शन तय है, हालांकि उन्होंने इसके समय को लेकर कोई निश्चित तारीख नहीं बताई है। वैश्विक विकास को प्रभावित करने वाले उन्होंने दो विपरीत कारकों का जिक्र किया है। एक तरफ कृत्रिम बुद्धिमत्ता में हो रहा निवेश आर्थिक वृद्धि को गति दे रहा है, तो दूसरी तरफ भू-राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार को धीमा कर रहे हैं। यही वजह है कि मौजूदा वित्त वर्ष के वैश्विक वृद्धि के अनुमान और संभावित झटके एक दूसरे के बहुत करीब बने हुए हैं।
आपूर्ति श्रृंखला और देशों पर प्रभाव
आधुनिक समय में दुनिया के हालात पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि सतह पर सब कुछ सामान्य लग सकता है, लेकिन गहराई में जाकर देखने पर बड़े बदलाव नजर आते हैं। विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी आपूर्ति श्रृंखला वाले देशों में यह बदलाव साफ देखा जा सकता है। ताइवान और दक्षिण कोरिया की विकास दर अपनी सामान्य गति से दोगुनी हो गई है। ताइवान की एक एजेंसी ने तो इस तकनीक की बढ़ती मांग को देखते हुए अपने विकास दर के अनुमान को बढ़ाकर 11 फीसदी तक कर दिया है, जो कि वर्ष 1987 के बाद का सबसे ऊंचा अनुमान है। इसके विपरीत खाड़ी देश हैं, जिन्हें संघर्ष के कारण अपनी विकास दरों के अनुमानों में कटौती करनी पड़ रही है। अमेरिका इस समय उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन वहां असली जोखिम इस भारी निवेश और निवेशकों के मन में बैठे डर से जुड़ा हुआ है।
संभावित मंदी और तकनीकी जोखिम
अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से मिलने वाला धीमा रिटर्न वहां मंदी की आहट दे रहा है। वर्ष 2026 तक इस तकनीक पर 1 ट्रिलियन डॉलर का निवेश करने वाली कंपनियों को अभी से अपने राजस्व और मुनाफे को लेकर गहरी चिंता सताने लगी है। उन्होंने एनविडिया का उदाहरण देते हुए कहा कि कंपनी ने ऐसी प्रयोगशालाओं में निवेश किया है जो उसके चिप बाजार को समर्थन देती हैं। यदि उन प्रयोगशालाओं के प्रदर्शन में गिरावट आती है, तो चिप का कारोबार भी सीधे तौर पर प्रभावित होगा। इसका असर अन्य तकनीकी कंपनियों पर भी पड़ेगा और अमेरिका के सामने मंदी जैसी विकट परिस्थिति पैदा हो सकती है। अमेरिकी बाजार पहले से ही दबाव का सामना कर रहा है और यदि यह दबाव और बढ़ता है तो विकास दर शून्य या उससे नीचे जा सकती है, जो सीधे तौर पर मंदी का संकेत साबित होगी।


















