अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में पिछले कुछ दिनों से जारी भारी उथल-पुथल के बीच अचानक एक अप्रत्याशित शांति देखने को मिल रही है। चार दिन पहले तक कच्चे तेल की दरें 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रही थीं, लेकिन हालिया सत्रों में कीमतों में तेज नरमी आई है। बुधवार को भी कच्चे तेल के भाव में एक फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। यह गिरावट ऐसे नाजुक दौर में सामने आई है जब अमेरिका ने ईरान के ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं और पूरे क्षेत्र में तनाव का माहौल बना हुआ है। इसके बावजूद तेल बाजार में आई इस मंदी के पीछे भू-राजनीतिक बदलाव, समुद्री जहाजों की आवाजाही और व्यापारियों की मनोवैज्ञानिक धारणा से जुड़े कई महत्वपूर्ण कारक काम कर रहे हैं।
टैंकरों की सुरक्षित रवानगी और मनोवैज्ञानिक राहत
ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा ने स्पष्ट किया है कि कच्चे तेल का पूरा कारोबार काफी हद तक मनोवैज्ञानिक धारणाओं और डर पर निर्भर करता है। जब तक अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों के मन में यह आशंका बनी रहती है कि युद्ध के कारण तेल आपूर्ति पूरी तरह ठप हो जाएगी, तब तक सट्टेबाजी के कारण कीमतें लगातार आसमान छूती रहती हैं। हालांकि, जैसे ही बाजार को यह संकेत मिलता है कि युद्धग्रस्त और तनावपूर्ण माहौल के बावजूद तेल से भरे जहाज बिना किसी रुकावट के सुरक्षित रूप से अपने गंतव्य की ओर निकल चुके हैं, वैश्विक स्तर पर तत्काल राहत की सांस ली जाती है। इसी मनोवैज्ञानिक तसल्ली के चलते खरीदार आक्रामक बोलियां लगाना बंद कर देते हैं, जिससे कच्चे तेल के दामों में स्वाभाविक नरमी आने लगती है।
फुजैराह बंदरगाह से आपूर्ति का निर्बाध प्रवाह
सप्लाई नेटवर्क को लेकर नरेंद्र तनेजा ने एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान दिलाया है। संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई का फुजैराह पोर्ट वैश्विक स्तर पर तेल परिवहन और आपूर्ति का बहुत बड़ा आधार माना जाता है। वैश्विक बाजार की नजर हमेशा इस रणनीतिक बंदरगाह पर टिकी रहती है। जब भी फुजैराह बंदरगाह से तेल निकासी और लोडिंग की गति में मामूली सुधार या तेजी दर्ज की जाती है, तो दुनिया भर के निवेशकों और रिफाइनरियों के बीच यह स्पष्ट संदेश जाता है कि निकट भविष्य में ईंधन की कोई भारी किल्लत पैदा नहीं होने वाली है। जब आपूर्ति शृंखला के चालू रहने की पुष्टि होती है, तो घबराहट में की जाने वाली खरीदारी अचानक रुक जाती है और बाजार में कीमतें स्थिर होकर गिरने लगती हैं।
अमेरिकी मिडटर्म चुनाव और वाशिंगटन में सत्ता का नया समीकरण
कच्चे तेल के दामों पर वाशिंगटन के घरेलू राजनीतिक घटनाक्रमों का भी गहरा असर पड़ा है। अमेरिका में हाल ही में संपन्न हुए मिडटर्म इलेक्शन में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को भारी पराजय का सामना करना पड़ा है। इस राजनीतिक उलटफेर के बाद विपक्षी डेमोक्रेट्स ने अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के दोनों प्रमुख सदनों, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और सीनेट पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया है। खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बात को स्वीकार किया है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के सैन्य टकराव का इस चुनावी हार में काफी बड़ा हाथ रहा है।
संसद के दोनों सदनों में विपक्ष का बहुमत होने से बाजार यह मानकर चल रहा है कि राष्ट्रपति के लिए किसी भी सैन्य अभियान को लंबे समय तक खींचना या मनमाने कड़े फैसले लेना अब बेहद जटिल हो जाएगा। इसके अलावा, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्वयं भी यह बयान दिया है कि फिलहाल अमेरिका की ईरान पर तुरंत कोई नया बड़ा सैन्य प्रहार करने की योजना नहीं है। राष्ट्रपति के इस रुख ने तेल व्यापारियों को आश्वस्त किया है कि युद्ध तुरंत बड़े क्षेत्रीय संकट में तब्दील नहीं होने जा रहा, जिससे बाजार की बेचैनी काफी हद तक ठंडी पड़ गई है।
व्यापारियों में अनिश्चितता और मुनाफे की वसूली
बाजार विशेषज्ञ प्रियंका सचदेवा ने बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के परस्पर विरोधी बयानों ने वैश्विक कारोबारियों के बीच भारी भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। एक तरफ जहां अमेरिकी सेना ईरान के ठिकानों पर प्रत्यक्ष हमले कर रही है, वहीं दूसरी तरफ ट्रंप प्रशासन यह संकेत दे रहा है कि सैन्य टकराव को और अधिक नहीं बढ़ाया जाएगा। इस भारी असमंजस के कारण संस्थागत तेल व्यापारी लंबी अवधि की कोई ठोस स्थिति बनाने से बच रहे हैं। अक्टूबर के दौरान जब कीमतों में अप्रत्याशित उछाल आया था, उस समय पोजीशन बनाने वाले व्यापारियों ने अब व्यापक स्तर पर मुनाफावसूली शुरू कर दी है, जिसके चलते बाजार में बिकवाली का दबाव बना हुआ है।
इसके साथ ही निवेशकों की नजर युद्धविराम के लिए चल रहे कूटनीतिक प्रयासों पर भी लगी हुई है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच इस सैन्य गतिरोध को समाप्त कराने के उद्देश्य से कतर लगातार मध्यस्थता करने में जुटा हुआ है। यद्यपि एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि किसी अंतिम और औपचारिक समझौते पर पहुंचने में अभी काफी वक्त लग सकता है, फिर भी बातचीत की किसी भी पहल से अंतरराष्ट्रीय बाजार में जोखिम का प्रीमियम तुरंत घटने लगता है।
वोरटेक्सा के आंकड़े और वैश्विक बेंचमार्क की चाल
शिप-ट्रैकिंग और कमोडिटी डेटा फर्म वोरटेक्सा के आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर के महीने में कच्चे तेल और रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की कुल आपूर्ति 1.71 करोड़ बैरल प्रतिदिन दर्ज की गई। यह आंकड़ा सितंबर महीने के 1.89 करोड़ बैरल प्रतिदिन से जरूर कम है, लेकिन युद्ध पूर्व की सामान्य आपूर्ति का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा अभी भी निर्बाध रूप से वैश्विक बाजार में पहुंच रहा है। सैक्सो बैंक के विश्लेषक ओले हेन्सन का विश्लेषण है कि पश्चिम एशिया से कच्चे तेल के शिपमेंट में आ रहा निरंतर सुधार ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतों को नीचे खींचने का सबसे बड़ा आधार बन रहा है।
इस दबाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दोनों प्रमुख बेंचमार्क में नरमी दर्ज की गई है। वैश्विक तेल मानक ब्रेंट क्रूड का भाव 1.75 डॉलर यानी 0.7 फीसदी टूटकर 101.85 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया। वहीं दूसरी ओर, अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी डब्ल्यूटीआई का भाव 1.18 डॉलर यानी 1.2 फीसदी फिसलकर 94.91 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ। हालांकि इस कारोबारी माहौल में एक बेहद हैरान करने वाला पहलू भी सामने आया। अर्थशास्त्रियों को अनुमान था कि 30 अक्टूबर को समाप्त हुए सप्ताह में अमेरिका के कच्चे तेल के भंडार में 8.8 लाख बैरल की बढ़ोतरी दर्ज की जाएगी, लेकिन इसके विपरीत अमेरिकी वाणिज्यिक तेल भंडार में 52.7 लाख यानी 5.27 मिलियन बैरल की भारी गिरावट दर्ज की गई। इस इन्वेंट्री गिरावट के बावजूद बाजार ने आपूर्ति स्थिरता और राजनीतिक दबावों को ज्यादा तवज्जो दी।



















