पारंपरिक खेती के तरीकों में बदलाव लाकर आधुनिक सूझबूझ का इस्तेमाल करने वाले किसान अब अपनी मेहनत का बेहतर फल हासिल कर रहे हैं। आम तौर पर केले की बागवानी करने वाले काश्तकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि पौधों के पूरी तरह विकसित होने तक खेत का एक बड़ा हिस्सा महीनों तक खाली पड़ा रहता है। उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के अंतर्गत मिर्जापुर गांव के रहने वाले युवा काश्तकार त्रिलोकी ने इसी खाली पड़ी जमीन का सदुपयोग करने के लिए सह-फसली खेती यानी इंटरक्रॉपिंग का एक बेहद असरदार तरीका निकाला है। इस तकनीक के दम पर केले की देखरेख, खाद और जुताई में लगने वाला पूरा खर्च बीच की फसलों की आमदनी से ही चुकता हो जाता है, जिससे केले की मुख्य उपज से मिलने वाला पूरा पैसा सीधे शुद्ध बचत में बदल जाता है।
हरी खाद के लिए ढैंचे के स्थान पर तिल का चयन
जमीन की उर्वरा शक्ति को मजबूत करने और प्राकृतिक हरी खाद तैयार करने के लिए ज्यादातर किसान ढैंचा उगाने को प्राथमिकता देते हैं। इसके विपरीत त्रिलोकी ने अपने खेत में तिल की बुवाई का रास्ता चुना। इसके पीछे की व्यावहारिक वजह साझा करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि ढैंचे के पौधों को जमीन में सड़कर पूरी तरह मिट्टी का हिस्सा बनने में काफी लंबा वक्त लग जाता है। चूंकि उन्हें अगली फसल के तौर पर एक सप्ताह के भीतर ही शिमला मिर्च की पौध तैयार कर खेत में रोपनी थी, इसलिए तिल बोना ज्यादा मुफीद साबित हुआ। तिल के हरे पौधों को जोतकर खेत में पलटने से मिट्टी को जरूरी जैविक पोषक तत्व भी तेजी से मिल जाते हैं। इसके अतिरिक्त यदि किसी परिस्थिति में तिल को पकने दिया जाए, तो बाजार में तिल के बीज और उसके तेल की बिक्री से अच्छे दाम भी मिल सकते हैं।
केले के साथ तीन चरणों में अतिरिक्त फसलों का चक्र
त्रिलोकी की कार्ययोजना के मुताबिक केले की मुख्य बागवानी जब तक फल देने की स्थिति में पहुंचेगी, तब तक वे उसी जमीन से कुल तीन अतिरिक्त उपज समेट चुके होंगे। फसल चक्र के पहले चरण में तिल की बुवाई की गई, जिसे बाद में खेत जोतकर हरी खाद का रूप दिया जाएगा ताकि जमीन को पर्याप्त जैविक खुराक मिल सके। तिल को मिट्टी में मिलाने के तुरंत बाद खाली क्यारियों में शिमला मिर्च की रोपाई की जाएगी। शिमला मिर्च की पैदावार और उसकी नियमित बाजार बिक्री मार्च से अप्रैल के महीने तक निरंतर जारी रहेगी। इसके बाद जब शिमला मिर्च की तुड़ाई का सिलसिला समाप्त हो जाएगा, तो बचे हुए खाली वक्त में हरी पत्तेदार धनिया की बुवाई कर ली जाती है। इस प्रकार एक ही भूखंड से समय गंवाए बिना लगातार पैदावार हासिल होती रहती है।
5 बीघे में 150 क्विंटल उपज और आय का लेखा-जोखा
त्रिलोकी के पास वर्तमान में कुल 5 बीघे का सब्जी वाले केले का बागान है। सामान्य तौर पर उनके खेत में 1 बीघे से करीब 30 से 35 क्विंटल सब्जी वाले केले की पैदावार मिल जाती है। इस हिसाब से पूरे 5 बीघे के बागान से लगभग 150 क्विंटल केले की कुल पैदावार तैयार होती है। स्थानीय मंडियों और बाजारों में इस किस्म के केले का भाव औसतन ₹15 प्रति किलोग्राम तक आसानी से मिल जाता है। सह-फसली मॉडल का सबसे मुख्य आर्थिक लाभ यह रहता है कि बीच में उगाई जाने वाली तीनों फसलें तिल, शिमला मिर्च और हरी धनिया केले की खेती में लगने वाले पानी, खाद, मजदूरी और जुताई के पूरे निवेश की भरपाई कर देती हैं। नतीजतन जब केले की मुख्य फसल कटकर बाजार में बिकती है, तो मिलने वाला समूचा राजस्व किसान के खाते में बिना किसी लागत कटौती के शुद्ध लाभ के तौर पर दर्ज होता है।
साथी काश्तकारों के लिए आमदनी बढ़ाने की सलाह
त्रिलोकी का मानना है कि इलाके के अन्य किसान भी अपनी जोत में इस बहुफसली व्यवस्था को लागू करके अपनी कमाई के स्तर को कई गुना बढ़ा सकते हैं। केले की कतारों के बीच मौजूद खुली जगह में केवल तिल या धनिया ही नहीं, बल्कि मौसम के अनुकूल लौकी, कद्दू, शिमला मिर्च या अन्य हरी मौसमी सब्जियों की अंतरवर्तीय खेती की जा सकती है। इस सुनियोजित तालमेल से सीमित जमीन और कम निवेश के बावजूद दोहरा लाभ आसानी से सुनिश्चित किया जा सकता है।

















