अभी मुश्किल से दो महीने पहले की ही बात है, जब भारतीय अर्थव्यवस्था पर चौतरफा संकट छाया हुआ दिख रहा था। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों और लगातार बढ़ते आयात बिल की वजह से भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तरों पर आ गया था। उस समय खर्चे इस कदर बढ़ गए थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश के लोगों से सोने की खरीदारी कम करने की सार्वजनिक अपील तक करनी पड़ी थी, ताकि आयात के बढ़ते आर्थिक बोझ को नियंत्रित किया जा सके। उस कठिन दौर में आलोचकों ने भारत की अर्थव्यवस्था के पटरी से उतरने और इसके पूरी तरह ठप पड़ने के दावे करने शुरू कर दिए थे। हालांकि, विषम परिस्थितियों के बावजूद भारत सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने कुछ कड़े और दूरदर्शी वित्तीय फैसले लिए, जिनके नतीजतन महज दो महीनों के भीतर पूरी स्थिति बदल गई। आज भारत की बैंकिंग प्रणाली में 10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की रिकॉर्ड सरप्लस नकदी मौजूद है।
बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी का नया रिकॉर्ड
केंद्रीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, देश के बैंकिंग तंत्र में इस समय रिकॉर्ड 10.30 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त नकदी यानी लिक्विडिटी मौजूद है। बैंकिंग इतिहास में यह पहला मौका है जब बैंकों के पास इतनी बड़ी मात्रा में बिना इस्तेमाल हुआ पैसा पड़ा है। इससे पहले सरप्लस नकदी का पिछला सर्वकालिक रिकॉर्ड सितंबर 2021 में दर्ज किया गया था, जब सिस्टम में 9.2 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त नकदी मौजूद थी। रिजर्व बैंक ने स्पष्ट किया है कि बैंकिंग परिचालन को सुचारू बनाए रखने और अर्थव्यवस्था में संतुलन स्थापित करने के लिए वह इस अतिरिक्त पैसे को वापस सोखने की प्रक्रिया में जुटा हुआ है।
इसी लिक्विडिटी मैनेजमेंट के तहत आरबीआई ने 4 सितंबर को करीब 6 लाख करोड़ रुपये की नीलामी प्रक्रिया पूरी की थी। इसके बाद केंद्रीय बैंक ने 7 सितंबर को भी 30 दिनों की अवधि के लिए 7 लाख करोड़ रुपये की एक और बड़ी नीलामी की पूरी तैयारी कर ली थी। इस नीलामी का मुख्य उद्देश्य बैंकों से 30 दिनों के लिए अतिरिक्त पैसा वापस लेकर उन्हें तय ब्याज देना था। हालांकि, कुछ तकनीकी खामियां आ जाने की वजह से 7 सितंबर वाली यह नीलामी प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो सकी। इस घटनाक्रम ने बाजार विश्लेषकों और आम नागरिकों के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इतना विशाल फंड बैंकों में आया कहां से और इसका देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा।
आखिर कहां से आई 10.30 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त नकदी?
सामान्य तौर पर बैंकिंग सिस्टम में नकदी के प्रवाह के कई नियमित माध्यम होते हैं, लेकिन इस बार रिकॉर्ड सरप्लस बनने की सबसे मुख्य वजह आरबीआई की विशेष एफसीएनआर (बी) यानी फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट (बैंक) डॉलर जमा योजना रही है। जब देश में कच्चे तेल के महंगे होने से आयात बिल बढ़ रहा था और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव था, तब इस योजना को लागू किया गया था। इस योजना के तहत भारतीय व्यावसायिक बैंकों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार से लगभग 127 अरब डॉलर जुटाए थे। बाद में डॉलर और रुपये की स्वैपिंग व्यवस्था के जरिए यह विशाल रकम भारतीय बैंकिंग सिस्टम में शामिल हो गई, जिससे देश के भीतर रुपयों की लिक्विडिटी रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई।
वैसे केंद्रीय बैंक आमतौर पर आपातकालीन स्थितियों को छोड़कर एफसीएनआर (बी) जैसी योजनाओं का सहारा नहीं लेता। सामान्य दिनों में जब भी बैंकिंग सिस्टम में नकदी की किल्लत होती है, तो रिजर्व बैंक खुले बाजार में सरकारी बॉन्ड खरीदकर वित्तीय प्रणाली में पैसे डालता है। इसके अलावा, जब केंद्र या राज्य सरकारें अपने खजाने से बुनियादी ढांचे, सड़क निर्माण, कर्मचारियों के वेतन और विभिन्न सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं के मद में बड़ा भुगतान करती हैं, तो भी वह पैसा सीधे व्यावसायिक बैंकों के खातों में जाता है और लिक्विडिटी बढ़ाता है। एक और तरीका यह है कि जब आरबीआई भारतीय मुद्रा को थामने के लिए बाजार से विदेशी डॉलर खरीदता है, तो उसके बदले वह बाजार में रुपये जारी करता है। साथ ही, जब देश की कंपनियां और आम नागरिक बैंकों में अपना पैसा जमा तो करते हैं लेकिन उसकी तुलना में नया कर्ज कम लेते हैं, तो भी बैंकों के पास सरप्लस फंड इकट्ठा हो जाता है।
आरबीआई क्यों सोखता है सरप्लस पैसा?
अगर बैंकिंग सिस्टम में जरूरत से ज्यादा नकदी लंबे समय तक बनी रहे, तो इससे वित्तीय प्रबंधन और मौद्रिक नीति पर विपरीत असर पड़ सकता है। अत्यधिक लिक्विडिटी से बाजार में मुद्रास्फीति यानी महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है। यही वजह है कि रिजर्व बैंकVariable Rate Reverse Repo (VRRR) और नीलामियों के जरिए तुरंत इस अतिरिक्त नकदी को सोखने की कोशिश करता है। इस प्रक्रिया में केंद्रीय बैंक बैंकों से उनका सरप्लस पैसा अपने पास जमा रखता है और उसके बदले उन्हें निर्धारित दर से ब्याज का भुगतान करता है। 7 सितंबर को प्रस्तावित 7 लाख करोड़ रुपये की नीलामी का मकसद भी यही था कि बैंक 30 दिनों के लिए अपना पैसा आरबीआई के पास रखें और उस पर सुरक्षित ब्याज कमाएं।
देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी पर क्या होगा असर?
बैंकिंग सिस्टम में 10.30 लाख करोड़ रुपये की मौजूदगी का सीधा संकेत यह है कि देश के पास अपनी विकास जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रचुर मात्रा में पूंजी उपलब्ध है। बैंकों के पास पर्याप्त पैसा होने की वजह से वे कारोबारियों और उद्योग-धंधों को बेहद कम ब्याज दरों पर आसानी से कर्ज दे सकेंगे। जब कंपनियों को सस्ता और त्वरित लोन मिलेगा, तो वे अपने विनिर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों का विस्तार करेंगी। इससे नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे, उत्पादन बढ़ेगा और देश की समग्र जीडीपी विकास दर में तेजी आएगी। इसके अलावा, बैंकों के पास मौजूद इस अतिरिक्त पूंजी का एक बड़ा हिस्सा शेयर बाजार और रियल एस्टेट सेक्टर में भी निवेश हो सकता है, जिससे पूंजी बाजार में तेजी आने की मजबूत संभावना बनती है।
आम नागरिकों के लिए सरप्लस नकदी के दो पहलू हैं। इसका पहला और सबसे बड़ा फायदा यह है कि कम ब्याज दरों के कारण होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन और एमएसएमई लोन काफी सस्ते हो सकते हैं। बैंक ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए लोन प्रोसेसिंग फीस और ब्याज दरों में छूट दे सकते हैं। हालांकि, इसका दूसरा पहलू उन लोगों के लिए चिंताजनक हो सकता है जो अपनी बचत पर निर्भर हैं। बैंकों के पास पहले से ही भरपूर पैसा होने के कारण वे फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) पर मिलने वाली ब्याज दरों में कटौती कर सकते हैं, जिससे बुजुर्गों और पारंपरिक बचतकर्ताओं की आय घट सकती है। इसके अलावा, बाजार में लोन के जरिए ज्यादा पैसा आने से कंज्यूमर डिमांड अचानक बढ़ सकती है, जिससे वस्तुओं और सेवाओं के दाम बढ़कर महंगाई का रूप ले सकते हैं। यही वजह है कि आरबीआई अर्थव्यवस्था में संतुलन बनाए रखने के लिए लगातार सक्रिय रहता है।



















