इस हफ्ते बाजार की नजर ECB की बैठक पर टिकी है, लेकिन कॉमर्जबैंक के विश्लेषकों का मानना है कि इससे यूरो को बहुत बड़ा सहारा मिलने की उम्मीद नहीं है। उनका कहना है कि EUR/USD करेंसी जोड़ी में यूरो की भूमिका हमेशा से सीमित रही है, और असली खेल डॉलर की तरफ से ही चल रहा है।
डॉलर तय कर रहा है दिशा, यूरो सिर्फ असर बढ़ाता या घटाता है
कॉमर्जबैंक के मुताबिक, जब भी EUR/USD में कोई बड़ा उतार-चढ़ाव आता है, तो उसकी शुरुआत लगभग हमेशा अमेरिकी डॉलर की तरफ से होती है। यूरो जोन में होने वाली घटनाएं, जैसे ब्याज दरों में बदलाव या आर्थिक आंकड़े, इस ट्रेंड को थोड़ा तेज या धीमा जरूर कर सकती हैं, लेकिन वे उस ट्रेंड की दिशा पूरी तरह पलट नहीं पातीं। यानी अगर डॉलर मजबूत होने के मूड में है, तो यूरो की तरफ से आने वाली अच्छी खबरें भी सिर्फ गिरावट की रफ्तार को धीमा कर सकती हैं, उसे रोक नहीं सकतीं। इसी तरह अगर डॉलर कमजोर पड़ रहा है, तो यूरो की कमजोर खबरें भी उस गिरावट को थोड़ा टाल भर सकती हैं।
डॉलर के दबदबे की वजह क्या है
विश्लेषकों ने इसकी वजह भी साफ बताई है। अमेरिकी डॉलर दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे भरोसेमंद रिजर्व करेंसी है। दुनिया भर के केंद्रीय बैंक, बड़े संस्थागत निवेशक और कंपनियां अपने पास डॉलर के रूप में भंडार रखना पसंद करती हैं। इसी वजह से डॉलर में होने वाला हर बड़ा फैसला या बदलाव कहीं ज्यादा बड़ी और असरदार पूंजी को हिलाता है, जबकि यूरो जैसी करेंसी में इतनी बड़ी पूंजी नहीं जुड़ी होती। सीधे शब्दों में कहें तो डॉलर के पास वह ताकत है जो अभी यूरो के पास नहीं है, और यही वजह है कि वैश्विक करेंसी बाजार में डॉलर की चाल सबसे ज्यादा मायने रखती है।
ECB की सख्ती का मतलब बढ़त नहीं, बचाव है
कॉमर्जबैंक के विश्लेषकों ने एक दिलचस्प पहलू यह भी बताया कि निवेशकों की सोच में ECB की पिछली नीतिगत दर पहले से ही कम मानी जा रही थी। यानी बाजार को लगता था कि यूरोपीय सेंट्रल बैंक ने ब्याज दरें जितनी बढ़ानी चाहिए थीं, उतनी नहीं बढ़ाईं थीं। ऐसे में जब अब ECB अपनी नीति को सख्त कर रहा है, तो निवेशक इसे यूरो को नई ऊंचाई पर ले जाने वाला कदम नहीं मानते। बल्कि इसे यूरो की मौजूदा कीमत को गिरने से बचाने और उसका मूल्य बनाए रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। दूसरे शब्दों में, यह सख्ती यूरो को आगे बढ़ाने के बजाय उसे पीछे जाने से रोकने का काम ज्यादा कर रही है।
निवेशकों और कारोबारियों के लिए इसका मतलब
इस विश्लेषण का सार यह है कि जो लोग यूरो में बड़ी तेजी की उम्मीद में बैठे हैं, उन्हें अपनी उम्मीदें थोड़ी सीमित रखनी होंगी। क्योंकि जब तक डॉलर की दिशा नहीं बदलती, तब तक अकेले ECB की सख्ती के दम पर यूरो में बड़ा उछाल आना मुश्किल लगता है। इसका मतलब यह भी है कि EUR/USD पर नजर रखने वालों को ECB की घोषणाओं से ज्यादा अमेरिका से जुड़े आंकड़ों, वहां की ब्याज दर नीति और डॉलर से जुड़े रुझानों पर ध्यान देना होगा, क्योंकि असली दिशा वहीं से तय हो रही है।



















