झारखंड के बोकारो जिले में मानसून के आगमन के साथ ही पशुओं के स्वास्थ्य पर परजीवियों का संकट गहराने लगा है। लगातार होने वाली बारिश और हवा में घुली नमी के कारण मवेशियों में विभिन्न प्रकार के संक्रमण तेजी से फैलते हैं। यदि पशुशाला में साफ-सफाई का ठीक से ध्यान न रखा जाए, तो यह खतरा और भी गंभीर हो जाता है। विशेषकर खुले आसमान के नीचे या कीचड़ में बांधे जाने वाले गोवंश बहुत जल्द इस चपेट में आ जाते हैं। इस मौसम में गोल कृमि, हुकवर्म और मुख्य रूप से फीता कृमि पशुओं के शरीर को अंदर से खोखला करने लगते हैं। बोकारो पेट क्लिनिक से जुड़े पशु चिकित्सक डॉ. जावेद ने इस समस्या के बारे में विस्तार से बात करते हुए बताया कि गंदी जगहों पर मवेशियों को रखने से परजीवी पनपने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है और दूषित चारा खाने से भी वे इनकी चपेट में आ जाते हैं।
विशेषज्ञ के अनुसार, जब फीता कृमि किसी पशु के पेट के अंदर प्रवेश करता है, तो वह मवेशी के खाए हुए भोजन के सभी पोषक तत्वों को खुद चूसने लगता है। इसके कारण हट्टा-कट्टा पशु भी धीरे-धीरे बेहद कमजोर होने लगता है। ऐसे पीड़ित पशुओं को दस्त की गंभीर शिकायत रहने लगती है और उनकी शारीरिक बनावट पर भी बुरा असर पड़ता है। इसका सीधा असर उनके दूध देने की क्षमता पर भी पड़ता है जिससे दूध का उत्पादन काफी घट जाता है। कई मामलों में तो पशुओं का वजन तेजी से गिरने लगता है और उनके शरीर की त्वचा पर भी बीमारियां उभरने लगती हैं।
डॉ. जावेद ने चेतावनी दी है कि इस परजीवी का सबसे खतरनाक और बुरा प्रभाव छोटे बछड़ों पर पड़ता है। संक्रमण की गिरफ्त में आने पर बछड़े सुस्त दिखने लगते हैं और उनकी शारीरिक वृद्धि पूरी तरह रुक सकती है। उन्हें बार-बार दस्त लग सकते हैं और उनके पेट या गले का हिस्सा असामान्य रूप से सूजा हुआ नजर आ सकता है। यदि ऐसे मामलों में समय रहते इलाज न किया जाए, तो बछड़ों की कमजोरी इतनी बढ़ जाती है कि उनकी जान पर भी संकट आ सकता है।
इस तरह के खतरनाक संक्रमणों से मवेशियों को सुरक्षित रखने के लिए पशुशाला की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी है। पशुओं को कभी भी कीचड़ से भरी और गंदी जगहों पर नहीं बांधना चाहिए। बरसात के दौरान पशुओं के रहने के स्थान पर पानी का ठहराव नहीं होना चाहिए और शेड को हमेशा सूखा रखने का प्रयास करना चाहिए। इसके साथ ही, मवेशियों को दाना और पानी देने वाले बर्तनों की भी नियमित रूप से धुलाई होनी चाहिए। उन्हें किसी भी स्थिति में सड़ा हुआ चारा या गंदी घास नहीं खिलाना चाहिए तथा खाने-पीने की सभी चीजों को पूरी तरह स्वच्छ स्थान पर रखना चाहिए।
पशु चिकित्सक का कहना है कि समय-समय पर कृमिनाशक दवा देने से इस तरह के परजीवियों से काफी हद तक बचाव किया जा सकता है। उन्होंने सलाह दी है कि बड़ी और वयस्क गायों को हर छह महीने के अंतराल पर यह दवा दी जानी चाहिए। वहीं दूसरी ओर, छह महीने तक की आयु वाले छोटे बछड़ों को हर महीने यह दवा पिलानी आवश्यक होती है। हालांकि, दवा की सही खुराक हमेशा पशु की उम्र, वजन और उसकी शारीरिक स्थिति को देखकर किसी डॉक्टर से ही तय करवानी चाहिए। मानसून के इस मौसम में मवेशियों की साफ-सफाई और उनके खानपान पर पूरी सतर्कता बरतकर इस गंभीर खतरे को टाला जा सकता है और कोई भी लक्षण दिखते ही तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।



















