बिहार के बेगूसराय जिले में कृषि क्षेत्र के उत्थान और किसानों की समृद्धि के लिए एक अत्यंत अनूठी और दूरगामी पहल की शुरुआत हुई है। बेगूसराय राज्य का पहला ऐसा जिला बनकर उभरा है जहाँ स्थानीय किसानों को सीधे कार्बन क्रेडिट योजना से जोड़ने का अभियान आरंभ किया गया है। इस नई व्यवस्था के लागू होने से ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की आय का ढांचा पूरी तरह बदलने वाला है। अब किसान केवल अपनी फसलों की पैदावार और बाजार में उपज बेचकर कमाई करने तक ही सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जलवायु सुधार में योगदान देकर भी अतिरिक्त वित्तीय लाभ अर्जित कर सकेंगे।
कृषि पद्धतियों में बदलाव और कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन
कार्बन क्रेडिट योजना का बुनियादी मकसद किसानों को ऐसी टिकाऊ और आधुनिक कृषि पद्धतियाँ अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है जिनसे खेतों से होने वाले विषैले कार्बन उत्सर्जन में गिरावट आए। इस परियोजना की कार्यप्रणाली को समझाने के लिए बेगूसराय जिला कृषि कार्यालय में एक विशेष सत्र आयोजित किया गया था। इस मौके पर योजना से जुड़ी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी और विभागीय विशेषज्ञ प्रवीण मिश्रा ने विस्तृत जानकारी साझा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि सामान्य अथवा पारंपरिक कृषि पद्धतियों के दौरान अनजाने में ही सही, लेकिन वातावरण में कार्बन का कुछ मात्रा में उत्सर्जन अवश्य होता है।
जब कोई किसान नई वैज्ञानिक तकनीकों, जैविक खाद और उन्नत पराली प्रबंधन जैसे तरीकों को अपनाकर कार्बन उत्सर्जन को कम करता है, अथवा वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड को खींचकर अपनी खेत की मिट्टी में जमा करता है, तो इसे वैज्ञानिक भाषा में कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन कहा जाता है। बेगूसराय में शुरू हुई इस पहल के जरिए यह देखा जाएगा कि किसान खेती के दौरान कितना अधिक ऑक्सीजन उत्पादन सुनिश्चित कर रहे हैं और पर्यावरण को कार्बन मुक्त बनाने में उनका कितना सहयोग है।
डीएमआरवी तकनीक से होगी निगरानी और डिजिटल आकलन
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसानों द्वारा किए गए इन सकारात्मक बदलावों का आकलन किसी इंसानी अनुमान से नहीं, बल्कि पूरी तरह से अत्याधुनिक डिजिटल तकनीकों के माध्यम से वैज्ञानिक आधार पर किया जाएगा। इसके लिए DMRV यानी डिजिटल मेजरमेंट, रिपोर्टिंग एंड वेरिफिकेशन तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। यह प्रणाली उन्नत सैटेलाइट तस्वीरों, सुदूर संवेदन उपकरणों और खेतों से एकत्र किए गए भौतिक आंकड़ों को एक साथ मिलाकर निष्पक्ष रिपोर्ट तैयार करती है।
इसके माध्यम से यह सटीक माप निकाला जाएगा कि किसान द्वारा अपनी खेती के तरीकों में बदलाव करने के बाद कार्बन उत्सर्जन में कितनी कमी आई है और मिट्टी में सॉइल ऑर्गेनिक कार्बन का स्तर कितना बढ़ा है। इन सभी आंकड़ों के डिजिटल सत्यापन के पश्चात ही संबंधित किसान के खाते से जुड़े कार्बन क्रेडिट तैयार किए जाएंगे। अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार, एक कार्बन क्रेडिट का अर्थ वातावरण से एक टन CO2 equivalent उत्सर्जन को कम करना या उसे मिट्टी में स्टोर करना होता है।
अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बिक्री और किसानों तक आय का हस्तांतरण
एक बार जब DMRV तकनीक द्वारा कार्बन क्रेडिट की पुष्टि और सत्यापन हो जाता है, तब इन्हें अंतर्राष्ट्रीय कार्बन बाजार में व्यापार के लिए सूचीबद्ध किया जाता है। वैश्विक कार्बन बाजारों में इन क्रेडिट्स की भारी मांग रहती है, जहाँ बड़ी कंपनियाँ और संस्थाएँ अपने कार्बन पदचिह्न को कम करने के लिए इन्हें खरीदती हैं। इस बिक्री से प्राप्त होने वाले राजस्व का एक तय और पूर्व-निर्धारित हिस्सा परियोजना समझौते की शर्तों के अनुसार सीधे भाग लेने वाले किसानों के बैंक खातों में स्थानांतरित किया जाएगा।
आने वाले वर्षों में यह नई व्यवस्था भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए कमाई का एक टिकाऊ और स्थायी ढांचा बनकर उभर सकती है। इससे किसान अपनी फसलों से उपज प्राप्त करने के साथ-साथ इस बात के लिए भी वित्तीय रूप से पुरस्कृत होंगे कि उन्होंने धरती की उर्वरता बढ़ाई और वायुमंडल को कार्बन मुक्त रखने में अपना योगदान दिया।
केंद्र सरकार का वॉलंटरी कार्बन मार्केट फ्रेमवर्क
बिहार के जिला स्तर पर शुरू हुए इस प्रयास को केंद्र सरकार की नीतियों का भी मजबूत समर्थन प्राप्त है। भारत सरकार के कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने देश भर के कृषि क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए वॉलंटरी कार्बन मार्केट के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय फ्रेमवर्क तैयार किया है। इस नीति का प्राथमिक उद्देश्य पूरे देश के कृषक समुदाय को पर्यावरण के अनुकूल खेती पद्धतियाँ अपनाने के लिए प्रेरित करना और उनके लिए वित्तीय प्रोत्साहन के नए स्रोत बनाना है।
केंद्र सरकार की इस योजना से किसानों को अपनी पारंपरिक आदतों में सुधार करने और मिट्टी की सेहत सुधारने का सीधा लाभ मिलेगा। बेगूसराय में शुरू किया गया यह प्रोजेक्ट उसी राष्ट्रीय विज़न का एक व्यावहारिक उदाहरण है, जो आने वाले समय में बिहार के अन्य जिलों और भारत के अन्य राज्यों के लिए भी एक अनुकरणीय मॉडल साबित हो सकता है।



















