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भारत के पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट प्रोजेक्ट से बाहर हुई हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड, निजी कंपनियों को मिलेगा मौकाव्यापार
28 सित॰ 2026, 6:11 pm (30 दिन पहले)· 1

भारत के पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट प्रोजेक्ट से बाहर हुई हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड, निजी कंपनियों को मिलेगा मौका

भारत के महत्वाकांक्षी एवांस्ड मिडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA प्रोजेक्ट से सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड बाहर हो गई है। करीब 15,000 करोड़ रुपये के इस स्वदेशी स्टील्थ फाइटर जेट प्रोजेक्ट के लिए अब तीन निजी कंसोर्टियम दौड़ में बचे हैं।

भारत के सबसे बड़े रक्षा अनुसंधान और निर्माण क्षेत्र से एक बेहद अहम और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। देश के पहले स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान यानी एवांस्ड मिडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट के विकास कार्य से सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को तकनीकी आधार पर बाहर कर दिया गया है। भारतीय रक्षा इतिहास में यह पहला अवसर है जब किसी घरेलू युद्धक विमान परियोजना से हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड जैसी प्रमुख सरकारी इकाई को इस प्रकार बाहर का रास्ता देखना पड़ा है। रक्षा सचिव आरके सिंह ने एक कार्यक्रम के दौरान इस बात की पुष्टि की है कि कंपनी कुछ अनिवार्य तकनीकी मानदंडों पर खरी नहीं उतर सकी, हालांकि उन्होंने उन विशिष्ट तकनीकी शर्तों का खुलासा नहीं किया जिन्हें पूरा करने में यह कंपनी असफल रही।

प्रोटोटाइप निर्माण की रेस में अब कौन हैं दावेदार

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के इस दौड़ से बाहर हो जाने के बाद अब इस अत्याधुनिक विमान के प्रोटोटाइप विकसित करने के लिए तीन निजी और संयुक्त उद्यम दावेदार मैदान में शेष रह गए हैं। इन शेष बचे दावेदारों में टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, लार्सन एंड टुब्रो-भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड-डायनेमैट कंसोर्टियम और भारत फोर्ज-भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड-डेटा पैटर्न्स कंसोर्टियम शामिल हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट हो चुका है कि देश के सबसे महंगे और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण लड़ाकू विमान निर्माण कार्यक्रम में पहली बार निजी क्षेत्र की कंपनियां मुख्य और निर्णायक भूमिका निभाने जा रही हैं।

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रक्षा मंत्रालय की नई रणनीति और मोनोपॉली खत्म करने की पहल

इस बड़े बदलाव के पीछे रक्षा मंत्रालय की एक स्पष्ट और दूरदर्शी नीति काम कर रही है। सरकार का यह उद्देश्य है कि भविष्य में लड़ाकू विमानों के उत्पादन के लिए देश की पूरी निर्भरता केवल एक ही संस्था पर टिकी न रहे। इसी दीर्घकालिक सोच के तहत एक समानांतर और दूसरी बड़ी फाइटर जेट उत्पादन लाइन स्थापित करने का खाका तैयार किया गया है। रक्षा क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ावा देने की यह नीति देश की विनिर्माण क्षमताओं को और अधिक मजबूत और प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।

पंद्रह हजार करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट

इस महत्वाकांक्षी परियोजना के शुरुआती प्रोटोटाइप तैयार करने के कार्य पर लगभग 15,000 करोड़ रुपये की भारी धनराशि खर्च होने का अनुमान लगाया गया है। इस संपूर्ण वित्तीय भार का वहन केंद्र सरकार द्वारा किया जाएगा। इस अनुबंध को हासिल करने वाली चयनित इकाई को कुल पांच उड़ने वाले प्रोटोटाइप विमानों का निर्माण करना होगा, इसके साथ ही एक अतिरिक्त ढांचागत विमान भी तैयार करना होगा जिसका उपयोग पूरी तरह से जमीन पर होने वाले विभिन्न तकनीकी परीक्षणों के लिए किया जाएगा। सरकार चाहती है कि अनुबंध पर हस्ताक्षर होने के लगभग 30 महीनों के भीतर इस विमान का पहला प्रोटोटाइप अपनी पहली उड़ान सफलतापूर्वक पूरी कर ले।

समयसीमा और स्टील्थ तकनीक की खासियत

रक्षा सचिव आरके सिंह द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार इस स्वदेशी स्टील्थ फाइटर का पहला प्रोटोटाइप सितंबर 2028 तक आसमान में उड़ान भर सकता है। यदि यह तय समयसीमा पूरी कर ली जाती है तो यह भारत की रक्षा तकनीक के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। इस विमान की सबसे बड़ी विशेषता इसकी स्टील्थ तकनीक है, जो इसे दुश्मन देशों के रडार की पकड़ से दूर रखने में सक्षम बनाती है। चूंकि वर्तमान समय तक भारत के पास कोई भी स्वदेशी स्टील्थ लड़ाकू विमान सक्रिय बेड़े में शामिल नहीं है, इसलिए भारतीय वायुसेना की आगामी सामरिक ताकत के लिहाज से यह परियोजना बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

चीन की बढ़ती सैन्य चुनौती और रणनीतिक दबाव

इस पूरे प्रोजेक्ट की तीव्र गति को पड़ोसी देश चीन की ओर से लगातार बढ़ रही सैन्य और रणनीतिक चुनौतियों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। चीन के पास पहले से ही जे-20 जैसे पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमान पर्याप्त संख्या में मौजूद हैं और वह जे-35 जैसे नए संस्करणों पर भी तेजी से काम कर रहा है। ऐसे क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को ध्यान में रखते हुए भारत के लिए अपने घरेलू स्तर पर पांचवीं पीढ़ी के विमान को जल्द से जल्द सेवा में शामिल करना रणनीतिक रूप से अत्यंत आवश्यक हो गया है। हालांकि भारत रूस के सुखोई-57 विमानों की सीमित खरीद के विकल्पों पर भी विचार कर रहा है, लेकिन दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता का मुख्य आधार यही स्वदेशी कार्यक्रम रहने वाला है।

इंजन की व्यवस्था और भविष्य की रूपरेखा

इस उन्नत विमान के शुरुआती प्रोटोटाइप में अमेरिकी निर्माता जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी के एफ-414 इंजनों का उपयोग किया जाएगा, जिनका चयन भारत के तेजस एमके-2 विमान के लिए भी किया गया है। हालांकि आने वाले समय में इस विमान के अधिक उन्नत और भारी संस्करणों के लिए और अधिक शक्तिशाली इंजनों की आवश्यकता होगी, और देश इस दिशा में भी समानांतर रूप से कार्य कर रहा है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड का इस दौड़ से बाहर होना इस बात का संकेत है कि सरकार अब रक्षा उत्पादन के मोर्चे पर बड़े बदलाव और निजी प्रतिस्पर्धा को प्राथमिकता दे रही है, जिससे यह परियोजना देश के रक्षा औद्योगिक सुधारों के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होगी।

सवाल-जवाब

AMCA प्रोजेक्ट से किस सरकारी कंपनी को बाहर किया गया है?
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को तकनीकी शर्तें पूरी न कर पाने के कारण इस प्रोजेक्ट से बाहर कर दिया गया है।
AMCA का पूरा नाम क्या है?
इसका पूरा नाम एडवांस्ड मिडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान है।
प्रोटोटाइप तैयार करने की रेस में अब कौन-सी निजी कंपनियां शामिल हैं?
इस दौड़ में टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, L&T-BEL-Dynamatic कंसोर्टियम और Bharat Forge-BEML-Data Patterns कंसोर्टियम शामिल हैं।
AMCA के शुरुआती प्रोटोटाइप बनाने पर कितना खर्च अनुमानित है?
इस कार्य पर लगभग 15,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है जिसका वहन सरकार करेगी।
AMCA का पहला प्रोटोटाइप कब तक उड़ान भर सकता है?
रक्षा सचिव आरके सिंह के अनुसार यह प्रोटोटाइप सितंबर 2028 में उड़ान भर सकता है।
शुरुआती प्रोटोटाइप में किस देश का इंजन इस्तेमाल होगा?
शुरुआती प्रोटोटाइप में अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक के F414 इंजन का इस्तेमाल किया जाएगा।
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टिप्पणियाँ 5

Divya Reddy@divya-reddy·29 दिन पहले

सरकारी कंपनी का इस तरह बाहर होना वाकई हैरान करने वाला है। क्या निजी कंपनियां वाकई तय समय के भीतर पाँच प्रोटोटाइप तैयार कर पाएँगी?

Michael Anderson@michael-anderson·29 दिन पहले

सरकारी कंपनियों की मोनोपॉली खत्म करने का यह फैसला वाकई बड़ा है। अमेरिका में भी रक्षा उत्पादन में निजी कंपनियों को आगे लाने से काफी तेजी आई है, भारत का यह कदम भी कुछ ऐसा ही असर दिखाएगा।

Sandeep Yadav@sandeep-yadav·29 दिन पहले

माइकल, सही कहा आपने! १५,००० करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट में अब टाटा और एलएंडटी जैसी निजी कंपनियों का आना सच में गेमचेंजर साबित होगा।

Ravikash Gupta@ravikash·29 दिन पहले

HAL का बाहर होना हैरान करने वाला है, अब टाटा या L&T के आने से रक्षा उत्पादन में मोनोपॉली टूटेगी।

Rohan Gupta@rohan-gupta·29 दिन पहले

रविकेश, सही कह रहे हो। पिछले साल जब मैं बेंगलुरु में HAL की फैसिलिटी कवर करने गया था, तब इंजीनियरों के बीच काम के दबाव को लेकर काफी चर्चा थी। उम्मीद है निजी कंपनियां इस रफ्तार को संभाल पाएँगी।

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