फरीदाबाद के रहने वाले पैरा एथलीट प्रणव सूरमा ने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प के दम पर खेल के मैदान पर एक नया इतिहास रच दिया है। उन्होंने एशियन पैरा गेम्स में शानदार प्रदर्शन करते हुए दो स्वर्ण पदक अपने नाम किए हैं और देश का मान बढ़ाया है। एक समय ऐसा था जब महज 16 साल की उम्र में हुए एक गंभीर हादसे ने उनकी पूरी जिंदगी को बदल कर रख दिया था, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और हर बाधा को पार करते हुए आज इस मुकाम को हासिल किया है।
हादसे के बाद बदली जिंदगी और संघर्ष के दिन
साल 2011 में प्रणव सूरमा के साथ एक ऐसा हादसा हुआ जिसने उनकी सामान्य जिंदगी को पूरी तरह प्रभावित कर दिया। इस दुर्घटना में उनकी रीढ़ की हड्डी और दाहिने पैर में गंभीर चोटें आईं। उस समय वह केवल 16 वर्ष के थे और डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि वह शायद कभी दोबारा अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पाएंगे और उन्हें जीवन भर व्हीलचेयर का सहारा लेना होगा। वह समय प्रणव और उनके पूरे परिवार के लिए बेहद कठिन था और भविष्य को लेकर काफी अनिश्चितता बनी हुई थी, लेकिन उन्होंने इस निराशा को खुद पर हावी नहीं होने दिया।
पढ़ाई से लेकर खेलों तक का सफर
मुश्किलों से हार न मानते हुए प्रणव सूरमा ने धीरे-धीरे अपनी सामान्य जिंदगी पटरी पर लौटाई और सबसे पहले अपनी पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने नौकरी की और फिर अपने अंदर छिपे खिलाड़ी को बाहर निकालते हुए खेलों की दुनिया में कदम रखा। उन्होंने साल 2018 से पैरा एथलेटिक्स की विधिवत शुरुआत की। शुरुआत में उन्होंने राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया, हालांकि बीच में कोरोना महामारी के कारण उनकी खेल यात्रा में कुछ रुकावटें भी आईं। इसके बाद साल 2022 में उन्होंने कोच नवल के मार्गदर्शन में एक बार फिर से अपनी ट्रेनिंग और अभ्यास की शुरुआत की।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर ऐतिहासिक प्रदर्शन
कोच के मार्गदर्शन में अभ्यास शुरू करने के बाद प्रणव सूरमा की खेल यात्रा ने एक नई रफ्तार पकड़ी। साल 2023 में उन्होंने पहली बार एशियन पैरा गेम्स में भाग लिया और क्लब थ्रो प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर अपनी काबिलियत साबित कर दी। इसके बाद साल 2024 में उन्होंने पेरिस पैरालंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करते हुए क्लब थ्रो इवेंट में रजत पदक अपने नाम किया। अब हाल ही में एशियन पैरा गेम्स में दो गोल्ड मेडल जीतना उनके खेल करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक बन गया है। इस दौरान उन्होंने क्लब थ्रो एफ-51 स्पर्धा में 32.87 मीटर का थ्रो फेंकते हुए नया गेम्स रिकॉर्ड बनाया और डिस्कस थ्रो में 11.66 मीटर का प्रदर्शन करते हुए एशियाई रिकॉर्ड अपने नाम किया।
मानसिक मजबूती और सकारात्मक सोच का महत्व
किसी भी बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में उतरने से पहले खिलाड़ियों को शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी बेहद मजबूत रहना पड़ता है। प्रणव का मानना है कि बड़े मंच पर पहली बार जाने पर उत्साह के साथ-साथ थोड़ा तनाव भी रहता है कि प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक होगा या नहीं। इस दबाव से निपटने के लिए उन्होंने हमेशा सकारात्मक सोच बनाए रखी और खुद को मानसिक तौर पर तैयार किया। अब दो स्वर्ण पदक जीतने के बाद उनका पूरा ध्यान आने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप और पैरालंपिक पर है, जिसके लिए वह अपनी तैयारी में जुट गए हैं।
परिवार का साथ और पिता का योगदान
इस पूरी सफलता के पीछे प्रणव सूरमा के परिवार और उनके पिता संजीव शर्मा का बहुत बड़ा योगदान रहा है। संजीव शर्मा अपने बेटे की इस कामयाबी पर बेहद गर्व महसूस करते हैं और उनका कहना है कि आज लोग उन्हें उनके बेटे के नाम से जानते हैं जो उनके लिए सबसे बड़ी खुशी है। प्रशिक्षण के दौरान पिता ने हर कदम पर उनका साथ दिया और उनके खानपान का विशेष ख्याल रखा। प्रणव बाहर के भोजन के बजाय हमेशा घर का बना सादा खाना ही पसंद करते हैं। जब भी विदेश की धरती पर तिरंगा फहराता है और राष्ट्रगान बजता है, तो वह पल पूरे परिवार के लिए भावनाओं से भर जाता है।
दुख की घड़ी में भी नहीं छोड़ी हिम्मत
प्रणव सूरमा के जीवन में एक ऐसा दौर भी आया जब प्रतियोगिता के लिए रवाना होने से ठीक पहले उनके दादाजी का निधन हो गया। दादाजी के साथ उनका जुड़ाव बहुत गहरा था, जिसके कारण पूरा परिवार गहरे सदमे में था और प्रणव भी काफी आहत हुए। इसके बावजूद उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का कठिन फैसला किया और मैदान पर उतरकर शानदार प्रदर्शन किया। परिवार के सदस्यों का कहना है कि प्रणव ने अपनी इस उपलब्धि से न केवल अपने घर और फरीदाबाद बल्कि पूरे हरियाणा और देश का नाम रोशन किया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हो चुकी है मुलाकात
अपने खेल करियर के दौरान प्रणव सूरमा को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दो बार मिलने का अवसर मिल चुका है। उनका मानना है कि सरकार और प्रशासन की तरफ से खिलाड़ियों को मिलने वाला प्रोत्साहन उनके हौसले को और ज्यादा बुलंद करता है। उन्हें पूरी उम्मीद है कि इस शानदार उपलब्धि के बाद उन्हें प्रधानमंत्री से एक बार फिर से मुलाकात करने का मौका मिलेगा। उनकी यह पूरी कहानी इस बात की गवाही देती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अगर मेहनत और सकारात्मक सोच को न छोड़ा जाए, तो किसी भी असंभव लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।
























