जीवन की सबसे बड़ी बाधाओं को दरकिनार करते हुए फरीदाबाद के पैरा एथलीट प्रणव सूरमा ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर सफलता के नए मुकाम हासिल किए हैं। महज सोलह वर्ष की कच्ची उम्र में उन्हें एक भयानक दुर्घटना का सामना करना पड़ा था, जिसकी वजह से उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई। उस वक्त डॉक्टरों ने यह साफ कह दिया था कि अब उनका दोबारा अपने पैरों पर खड़ा हो पाना बेहद मुश्किल है और उन्हें अपनी बाकी की जिंदगी व्हीलचेयर पर ही गुजारनी होगी। ऐसी कठिन और नाउम्मीदी भरी परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और हर चुनौती का डटकर मुकाबला किया।
हादसे से लेकर खेलों के मैदान तक का सफर
दुर्घटना के बाद का समय प्रणव और उनके पूरे परिवार के लिए किसी बड़े इम्तिहान से कम नहीं था। शुरुआत में यह समझ पाना बेहद कठिन था कि आने वाले समय में जिंदगी किस दिशा में आगे बढ़ेगी। तमाम मुश्किलों और निराशा के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू की और आगे चलकर नौकरी भी की। हालांकि उनके भीतर खेल के प्रति एक अलग ही जुनून था, जिसने उन्हें साल 2018 में पैरा एथलेटिक्स की दुनिया में कदम रखने के लिए प्रेरित किया। शुरुआत में उन्होंने घरेलू स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया, लेकिन बीच में कोरोना महामारी के कारण उनकी खेल यात्रा में कुछ बाधा जरूर आई। इसके बाद साल 2022 में उन्होंने कोच नवल के मार्गदर्शन में एक बार फिर से अपनी ट्रेनिंग की शुरुआत की और यहीं से उनके करियर को एक नई और सही दिशा मिल गई।
रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन और अंतरराष्ट्रीय मंच पर सफलता
कड़ी मेहनत और निरंतर अभ्यास का ही परिणाम था कि प्रणव ने साल 2023 में आयोजित एशियन पैरा गेम्स में पहली बार भाग लिया और क्लब थ्रो स्पर्धा में स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इसके बाद उन्होंने साल 2024 में पेरिस पैरालंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया और क्लब थ्रो स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए रजत पदक जीता। हाल ही में उन्होंने एशियन पैरा गेम्स-2026 में दो स्वर्ण पदक जीतकर अपनी इस सफलता के सिलसिले को और आगे बढ़ाया है। उन्होंने क्लब थ्रो एफ-51 स्पर्धा में 32.87 मीटर का बेहतरीन थ्रो फेंककर नया गेम्स रिकॉर्ड कायम किया, जबकि डिस्कस थ्रो स्पर्धा में 11.66 मीटर का प्रदर्शन करते हुए एशियाई रिकॉर्ड अपने नाम किया और स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया।
मानसिक दृढ़ता और सकारात्मक सोच का महत्व
किसी भी बड़े और अंतरराष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट में उतरने से पहले खिलाड़ियों के मन में तमाम तरह की उथल-पुथल चलती रहती है। पहली बार जब कोई खिलाड़ी वैश्विक मंच पर उतरता है, तो उसे खुशी के साथ-साथ घबराहट का भी अहसास होता है। प्रणव का मानना है कि इस तरह के दबाव से निपटने के लिए शारीरिक ताकत के साथ-साथ मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत होना भी उतना ही आवश्यक है। वह हमेशा अपने प्रदर्शन को लेकर सकारात्मक कल्पना करते थे और अपने भीतर कभी भी नकारात्मक विचारों को नहीं आने देते थे। अब इन दोहरी स्वर्ण सफलताओं के बाद उनका पूरा ध्यान आगामी वर्ल्ड चैंपियनशिप और पैरालंपिक खेलों की तैयारियों पर केंद्रित है।
परिवार का साथ और पिता का अटूट समर्थन
इस पूरे सफर में प्रणव के पिता संजीव शर्मा का सहयोग उनके लिए सबसे बड़ा संबल रहा है। एक पिता के रूप में वह अपने बेटे के हर अभ्यास सत्र के दौरान साथ रहते थे और उसकी जरूरत का पूरा ध्यान रखते थे। खानपान के मामले में भी परिवार पूरी तरह सतर्क रहता है और प्रणव बाहर के खाने के बजाय घर का बना भोजन ही पसंद करते हैं। संजीव शर्मा का कहना है कि जब अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लहराता है और देश का राष्ट्रगान गूंजता है, तो उस पल को शब्दों में बयां कर पाना किसी के लिए भी मुसंभल नहीं होता। हालांकि, जब प्रणव प्रतियोगिता के लिए रवाना हो रहे थे, उसी दौरान उनके दादाजी का निधन हो गया था, जिससे परिवार और खुद प्रणव काफी आहत थे, क्योंकि दादाजी से उनका जुड़ाव बहुत गहरा था। इसके बावजूद उन्होंने अपने दुख को पीछे छोड़ते हुए देश के लिए खेलने का कठिन फैसला लिया और अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई।
देश के शीर्ष नेतृत्व से मिल चुका है सम्मान
अपनी खेल उपलब्धियों के दम पर प्रणव देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी दो बार मुलाकात कर चुके हैं। उनका मानना है कि सरकार की तरफ से मिलने वाला समर्थन और प्रोत्साहन खिलाड़ियों के भीतर एक नया जोश भर देता है। उन्हें पूरी उम्मीद है कि इस बार एशियन पैरा गेम्स में मिली ऐतिहासिक सफलता के बाद उन्हें प्रधानमंत्री से एक बार फिर मिलने का सौभाग्य प्राप्त होगा। उनकी यह संघर्ष गाथा इस बात की सबसे बड़ी मिसाल है कि अगर इंसान के भीतर सच्ची लगन और कुछ कर दिखाने का जज्बा हो, तो वह हर नामुमकिन चीज को मुमकिन बना सकता है।


















