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हैदराबाद की गलियों में आज भी बरकरार है नवाबी पानदान की खनक और गिल्लौरी की मिठासकल्चर
25 अग॰ 2026, 11:49 am (45 दिन पहले)· 2

हैदराबाद की गलियों में आज भी बरकरार है नवाबी पानदान की खनक और गिल्लौरी की मिठास

आधुनिकता के इस दौर में भी हैदराबाद के पुराने इलाकों में शाही मेहमान-नवाज़ी की परंपरा जीवित है। चांदी और पीतल के पानदानों से सजी गिल्लौरी आज भी दावतों की शान बढ़ाती है।

हैदराबाद के पुराने मोहल्लों और ऐतिहासिक इमारतों में जब दिन ढलने लगता है, तो शाही दावतों के बाद एक खास आवाज गूंजती है। यह आवाज पीतल और चांदी से बने पानदानों और खासदानों के ढक्कन खुलने की होती है। आधुनिकता और भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच भी इस शहर की पारंपरिक मेहमान-नवाज़ी में पान की महक और गिल्लौरी का स्वाद आज भी उतना ही ताजा है जितना निजामों के शासनकाल में हुआ करता था। इस शहर में भोजन करना मात्र क्षुधा शांत करने का माध्यम नहीं है, बल्कि एक पूरी परंपरा है। प्रसिद्ध व्यंजनों जैसे बिरयानी, नहारी और विभिन्न मिठाइयों के बाद जब तक चांदी के वर्क से सजी गिल्लौरी मेहमानों के सामने नहीं रखी जाती, तब तक दावत को अधूरा समझा जाता है। शहर के ऐतिहासिक हिस्सों जैसे चारमीनार, मोगलपुरा और पुरानी हवेली के कई परिवारों में आज भी बैठकों और दीवानखानों की शान बढ़ाने के लिए कलात्मक पानदान रखे जाते हैं।

दक्कनी संस्कृति का प्रतीक है पानदान

ये पानदान केवल खाने-पीने की चीजें रखने का बक्सा भर नहीं हैं, बल्कि यह दक्कनी संस्कृति और घर की प्रतिष्ठा का जीवंत प्रमाण हैं। नागरबेल के बिल्कुल ताजे पत्तों पर करीने से चूना और कत्था लगाने की प्रक्रिया अपने आप में एक कला है। इसके पश्चात इसमें बारीक कटी हुई सुपारी, सौंफ, खुशबूदार गुलकंद, इलायची और इस पूरी रचना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा—ज़फ़रानी किवाम मिलाया जाता है। केसर और चुनिंदा जड़ी-बूटियों के साथ पकाया जाने वाला यह विशेष किवाम पान को एक अलग ही महक और अनूठा स्वाद प्रदान करता है। इसके बाद पान के पत्ते को करीने से तिकोने रूप में मोड़कर एक लौंग के सहारे सुरक्षित कर दिया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में गिल्लौरी या बीड़ा कहा जाता है।

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परंपरा और सुकून का अनूठा संगम

जब परिवार की वरिष्ठ महिलाएं या मेजबान चांदी के नक्काशीदार खासदान में इन तैयार गिल्लौरियों को सजाकर मेहमानों की सेवा में पेश करते हैं, तो वह केवल एक साधारण मीठा पान नहीं होता, बल्कि आदर और प्रेम का संदेश होता है। महानगरों में मशीनी युग की रेडीमेड पान की दुकानें भले ही हर कोने पर खुल गई हों, लेकिन घरों में इत्मीनान से बैठकर पानदान से गिल्लौरी परोसने का जो संतोष और तहज़ीब है, वह आज की युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े हुए है। यह सुंदर रिवायत यह संदेश देती है कि समय चाहे कितनी भी तेजी से क्यों न बदले, हैदराबाद की जुबान और खानपान की शालीनता हमेशा अमर रहेगी।

सवाल-जवाब

हैदराबाद में दावत के बाद क्या खास पेश किया जाता है?
हैदराबाद में दावतों के अंत में चांदी के वर्क से सजी गिल्लौरी या मीठा पान पेश करने की परंपरा है।
पानदान और खासदान का क्या महत्व है?
पानदान और खासदान केवल डिब्बे नहीं हैं, बल्कि यह दक्कनी तहजीब और घर की शान का प्रतीक माने जाते हैं।
गिल्लौरी या बीड़ा तैयार करने में किन मुख्य चीजों का उपयोग होता है?
इसमें नागरबेल के पत्ते, चूना, कत्था, सुपारी, सौंफ, गुलकंद, इलायची और ज़फ़रानी किवाम का इस्तेमाल किया जाता है।
पुराने हैदराबाद के किन इलाकों में पानदान रखने की परंपरा आज भी जिंदा है?
चारमीनार, मोगलपुरा और पुरानी हवेली जैसे पुराने इलाकों में आज भी घरों में पानदान सजाए जाते हैं।
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