वैश्विक तकनीकी बाजार में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स की बढ़ती मांग ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार की दिशा बदल दी है। चीन जैसे विशाल विनिर्माण केंद्र में इस समय आधुनिक तकनीक, हाई-स्पीड कंप्यूटिंग और विशेष मशीनरी की जरूरत तेजी से बढ़ रही है। इस बढ़ते बाजार में दक्षिण कोरिया ने अपनी मजबूत औद्योगिक उपस्थिति दर्ज कराई है। आंकड़ों के अनुसार, अकेले अक्टूबर 2026 के महीने में दक्षिण कोरिया ने चीन को 26.98 अरब डॉलर मूल्य का सामान निर्यात किया, जो सालाना आधार पर 133.6 प्रतिशत की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्शाता है। यह आंकड़ा इस मायने में असाधारण है कि भारत पूरे एक वित्त वर्ष में भी चीन को इतना सामान नहीं भेज पाता जितना दक्षिण कोरिया ने केवल एक महीने के भीतर भेज दिया। भारत ने पिछले पूरे वित्त वर्ष में चीन को केवल 19.47 अरब डॉलर का निर्यात किया था। दक्षिण कोरिया के इस शानदार व्यापारिक प्रदर्शन के केंद्र में सेमीकंडक्टर और AI से जुड़ी मेमोरी चिप्स की भारी खपत रही है।
दक्षिण कोरियाई निर्यात में यह अप्रत्याशित उछाल ऐसे दौर में देखने को मिला है जब दुनिया की दिग्गज तकनीकी कंपनियां AI इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश कर रही हैं। विशाल डेटा केंद्रों, आधुनिक AI सर्वर्स और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग प्रणालियों को सुचारू रूप से चलाने के लिए भारी तादाद में अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर और तेज गति वाली मेमोरी चिप्स की जरूरत पड़ रही है। दक्षिण कोरिया की विनिर्माण इकाइयों ने इस वैश्विक आवश्यकता को समय रहते पहचाना और चीनी बाजार की इस विशाल मांग की आपूर्ति करके बड़ा लाभ हासिल किया। यह लगातार पांचवां ऐसा महीना दर्ज किया गया है जब दक्षिण कोरिया ने चीन को 20 अरब डॉलर से अधिक मूल्य का सामान भेजा है, जिससे दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच का तकनीकी संपर्क और ज्यादा गहरा हुआ है।
सेमीकंडक्टर और आधुनिक चिप्स के सहारे बनी मजबूत पकड़
चीनी बाजार में दक्षिण कोरियाई उत्पादों की मांग बढ़ाने में सबसे बड़ी हिस्सेदारी सेमीकंडक्टर क्षेत्र की रही। केवल अक्टूबर के पहले 25 दिनों के व्यापारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो इस दौरान चीन को सेमीकंडक्टर का निर्यात 331 प्रतिशत की भारी छलांग लगाकर 14.8 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। सेमीकंडक्टर के अलावा वायरलेस संचार उपकरणों और नेटवर्क हार्डवेयर की स्थिर आपूर्ति ने भी दक्षिण कोरिया के कुल निर्यात को मजबूत सहारा प्रदान किया। पूरे अक्टूबर महीने में दक्षिण कोरिया का वैश्विक स्तर पर कुल निर्यात 93.7 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 115.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इसमें से अकेले सेमीकंडक्टर उद्योग की हिस्सेदारी 56.4 अरब डॉलर दर्ज की गई, जो देश के कुल वैश्विक निर्यात के लगभग आधे हिस्से के बराबर बैठती है।
यह व्यापारिक मजबूती केवल तात्कालिक बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे दोनों देशों के उद्योगों के बीच दशकों से विकसित हुई एक मजबूत और परस्पर निर्भर सप्लाई चेन व्यवस्था काम कर रही है। दक्षिण कोरिया दुनिया में आधुनिक मेमोरी चिप्स के निर्माण और डिजाइनिंग में महारत रखता है, जबकि चीन के पास वृहद स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली, अंतिम उपभोक्ता उत्पाद तैयार करने और एक विशाल घरेलू बाजार की संगठित क्षमता मौजूद है। आसान शब्दों में समझें तो दक्षिण कोरिया आवश्यक माइक्रोचिप्स और मुख्य तकनीकी पुर्जे उपलब्ध कराता है, और चीनी कारखाने इन घटकों का उपयोग करके स्मार्टफोन, कंप्यूटर और औद्योगिक उपकरण तैयार करते हैं। चीनी विश्लेषक वांग पेंग के अनुसार, दोनों देशों की विनिर्माण क्षमताएं और उद्योग एक-दूसरे की सप्लाई चेन से अत्यंत गहरे रूप से जुड़े हुए हैं।
भारत और चीन के व्यापार में बढ़ता असंतुलन और रिकॉर्ड घाटा
दूसरी तरफ, भारत और चीन के बीच भी द्विपक्षीय व्यापार का आकार लगातार विस्तृत हो रहा है, लेकिन इसका संतुलन पूरी तरह से चीन के पक्ष में झुका हुआ है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान दोनों देशों के बीच कुल व्यापार 151.10 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। इस अवधि में भारत ने चीन को 19.47 अरब डॉलर मूल्य का सामान निर्यात किया, जबकि इसके विपरीत चीन से भारत का आयात 131.63 अरब डॉलर दर्ज किया गया। इससे पिछले वित्त वर्ष में भारत का चीन को निर्यात 14.25 अरब डॉलर था और चीन से आयात 113.46 अरब डॉलर रहा था। हालांकि एक वर्ष के दौरान भारत के निर्यात में 36.62 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई, लेकिन साथ ही साथ आयात भी 16.03 प्रतिशत बढ़ गया, जिससे व्यापार का अंतर कम होने के बजाय और अधिक चौड़ा हो गया।
भारत अपनी घरेलू और औद्योगिक जरूरतों के लिए चीन से भारी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक्स, भारी मशीनरी, इलेक्ट्रिकल उपकरण, कंप्यूटर पार्ट्स, रसायन और प्लास्टिक के उत्पादों की खरीदारी करता है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारत ने अकेले इलेक्ट्रॉनिक सामान का 49.21 अरब डॉलर का आयात चीन से किया। इसके उलट, भारत की तरफ से चीन को मुख्य रूप से इंजीनियरिंग उत्पाद, चुनिंदा इलेक्ट्रॉनिक सामान, पेट्रोलियम उत्पाद, लौह अयस्क, समुद्री खाद्य उत्पाद और बुनियादी रसायनों का निर्यात किया जाता है। निर्यात में आई तेजी के बावजूद दोनों देशों के बीच का व्यापार घाटा 112.16 अरब डॉलर के विशाल स्तर पर पहुंच गया, जो उससे पिछले साल 99.21 अरब डॉलर था। इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि भारत जितने मूल्य का सामान चीन को बेचता है, उससे करीब 6.8 गुना अधिक मूल्य का सामान उससे खरीदता है।
चीनी बाजार में भारतीय उत्पादों की सीमित पहुंच की चुनौती
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह स्थिति केवल चीन से ज्यादा सामान खरीदने की नहीं है, बल्कि अपने विनिर्मित सामान को चीनी बाजार में उचित स्थान दिलाने की एक बड़ी व्यापारिक बाधा भी है। भारत के वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि चीन भारत के लिए आयात का एक बहुत बड़ा केंद्र बना हुआ है, मगर जब भारत के कुल निर्यात में चीनी बाजार की हिस्सेदारी देखी जाती है तो वह बेहद सीमित नजर आती है। बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास ने भी दोनों देशों के व्यापार संबंधों की समीक्षा में इस बात को रेखांकित किया है कि भारतीय कंपनियों को चीनी बाजार तक खुली और सुगम पहुंच हासिल करने में लगातार कई तरह की दिक्कतों और नियामक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। नतीजतन, उच्च मूल्य वाले उत्पादों के निर्माण और निर्यात में दक्षिण कोरिया जैसी पकड़ बना पाना भारतीय कंपनियों के लिए अभी भी एक जटिल चुनौती बना हुआ है।



















